जब बॉस की बद्तमीजी का मिला अनोखा जवाब – ‘पी बकेट’ में छोड़ा नोट!
ऑफिस की राजनीति और बॉस की मनमानी कौन नहीं जानता? भारत में तो अक्सर सुनने को मिलता है – “बॉस हमेशा सही होता है।” लेकिन क्या हो जब बॉस ही सारी हदें पार कर जाए? आज की कहानी है एक ऐसी महिला की, जिसने अपने पुराने कॉलेज में कोच बनकर वापसी की और अपने गुरु जैसे बॉस से उम्मीद से ज़्यादा कुछ सीख लिया – पर तरीका थोड़ा अनोखा था!
गुरु का असली चेहरा – उम्मीदें टूटीं, भरोसा भी गया
हम सबने कभी न कभी अपने टीचर या सीनियर को आदर्श मानकर उनसे सीखने की चाहत रखी होती है। लेकिन जब वही आदर्श व्यक्ति अपने पद और ताकत का गलत इस्तेमाल करे, तो दिल पर जो चोट लगती है, वो समझना मुश्किल नहीं। इस कहानी में हमारी हीरोइन (मान लीजिए नाम ‘सुमन’), अपने पुराने जूनियर कॉलेज में कोच बनने लौटीं। उनका बॉस यानी वही पुराने गुरुजी, अब सीनियर कोच बन चुके थे।
शुरुआत में सब कुछ सामान्य था, लेकिन धीरे-धीरे गुरुजी ने सुमन से अपनी सारी जिम्मेदारियां करवानी शुरू कर दीं – टीम की कोचिंग से लेकर क्लास पढ़ाने तक। वो खुद घर बैठकर मोटी तनख्वाह लेते रहे। बोले, “सीजन पूरा होने के बाद कुछ हिस्सा कैश में दे दूंगा।” अब डर और सम्मान के बीच सुमन ने न तो लिखित में कुछ लिया, न ही सवाल पूछे। जब पैसे मांगने की बारी आई, तो गुरुजी ने ऐसे देखा जैसे सुमन कोई एलियन हो।
ऑफिस की राजनीति – ‘गैसलाइटिंग’ का खेल
पैसे की बात पर मीटिंग बुलाई गई, लेकिन वहां पहले से ही एक और कोच (गुरुजी का खास दोस्त) बैठा था। दोनों ने मिलकर सुमन को ऐसा महसूस कराया जैसे वही गलत हैं – इसको अंग्रेज़ी में ‘गैसलाइटिंग’ कहते हैं, जो हमारे ऑफिसों में भी खूब होता है। आखिरकार, जब सुमन ने इस्तीफा दिया तो उल्टा यही बोल दिया – “अच्छा है, बढ़िया फैसला है!” और सुमन रोती हुई वहां से निकल गईं।
कई भारतीय पाठकों को यह कहानी अपने ऑफिस की ‘चुगली’ या ‘राजनीति’ जैसी लगेगी, जहां सीनियर लोग अपने दोस्तों की टोली बनाकर जूनियर्स को दबाते हैं। एक कमेंट में किसी ने बढ़िया कहा – “कभी-कभी छोटी-छोटी बातें ही सबसे ज्यादा चुभती हैं।” यानी बदला हमेशा बड़ा होना जरूरी नहीं।
बदला – ‘पी बकेट’ में छुपा संदेश
कहानी में असली ट्विस्ट तब आया जब सुमन ने एक दिन इक्विपमेंट रूम में एक प्लास्टिक की बाल्टी देखी, जिसमें से तेज़ बदबू आ रही थी। पता चला, ये बाल्टी गुरुजी की ‘खास’ चीज़ थी – वो वहीं पेशाब करते थे, और सफाई की कोई फिक्र नहीं। यह सुनकर शायद कई भारतीय पाठकों को वो सरकारी दफ्तर याद आ जाएं, जहां सफाई का हाल बेहाल रहता है!
अब सुमन को गुस्सा आया – इतनी बेशर्मी! लॉकर रूम तो बस 50 फीट दूर था! जब गुरुजी टीम के साथ शहर से बाहर गए, सुमन ने उस बाल्टी में एक नोट रख दिया – “सब जानते हैं ये आपकी पी बकेट है। क्या आप वाकई इतने आलसी हैं?” गुरुजी लौटे, बाल्टी गायब हो गई! किसी ने सही लिखा – “उस आदमी को कम से कम मालूम तो चला कि कोई उसकी हरकतों पर नजर रख रहा है।”
बदले की बहस – क्या सिर्फ शर्मिंदा करना काफी था?
कई लोगों ने कहा, “ये बदला नहीं हुआ, बस एक नोट छोड़ दिया।” लेकिन कईयों को लगा कि ये छोटी-छोटी हरकतें ही असली ‘संतोष’ देती हैं। एक कमेंट था – “शर्म और अपमान भी एक सज़ा है।” भारत में भी हम कहते हैं, “ब्याज सहित लौटाऊंगा।” यानी कभी-कभी किसी का असली चेहरा उजागर कर देना, सबसे बड़ा जवाब होता है।
कुछ ने सलाह दी, “अगर वाकई सबूत था, तो एजुकेशन बोर्ड तक मामला ले जाना चाहिए था।” लेकिन सुमन ने जवाब दिया – “HR का काम कंपनी को बचाना है, कर्मचारी को नहीं।” यह बात भारतीय ऑफिसों में भी सच लगती है, जहां अक्सर शिकायतें दबा दी जाती हैं।
हमारी सीख – छोटी जीत ही सही, पर मन को सुकून
चाहे कॉलेज अमेरिका का हो या भारत का, राजनीति और चापलूसी हर जगह है। कभी-कभी इंसान को बदला लेने के लिए बड़ी साजिश नहीं, बस छोटी-सी चुभन ही काफी होती है। इस कहानी की असली जीत थी – जब सुमन ने अपने बॉस को ये एहसास दिला दिया कि उसकी गंदी हरकतें छुपी नहीं हैं। आखिर में, कभी-कभी ‘पी बकेट’ में लिखा नोट ही सबसे बड़ा हथियार बन जाता है!
पाठकों से सवाल
क्या आपके साथ भी कभी ऐसा हुआ है, जब किसी वरिष्ठ ने आपको अपमानित किया हो? क्या आपने कभी ऐसा कोई ‘छोटा लेकिन तगड़ा’ बदला लिया है? अपने अनुभव कमेंट में जरूर साझा करें!
मूल रेडिट पोस्ट: Treat me terribly at work? I’ll leave a note in your pee bucket