जब बॉस की जिद ने खुद की जेब खाली कर दी – एक ऑफिस की मजेदार सीख
ऑफिस की दुनिया में बॉस और उनकी मीटिंग्स का क्या कहना! कहीं हर सुबह खड़े-खड़े फटाफट चर्चा होती है, तो कहीं बैठकी लग जाती है और आधा घंटा यूं ही बीत जाता है। लेकिन आज हम आपको एक ऐसी मजेदार कहानी सुनाने जा रहे हैं, जिसमें एक मैनेजर की अजीब जिद और मैथमेटिक्स की अनोखी थ्योरी ने सबको हैरान कर दिया। और सबसे दिलचस्प बात – आखिर में खुद उसी मैनेजर की जेब से बोनस फिसल गया!
मीटिंग का नया नियम: "सिर्फ एक बार, लेकिन घंटों तक!"
कहानी है एक युवा इंटर्न की, जो बुजुर्गों की देखभाल से जुड़े क्षेत्र में एम.एस. कर रहा था। हर दिन सुबह 'स्टैंड-अप' मीटिंग होती थी – यानी सब मैनेजर आपस में हालचाल ले लेते, काम की बातें हो जातीं और 10-15 मिनट में सब अपने-अपने काम पर लौट जाते। लेकिन इंटर्नशिप वाली बिल्डिंग में डायरेक्टर साहिबा ने नया फरमान सुना दिया – "अब से मीटिंग हफ्ते में बस एक बार होगी, लेकिन पूरे सुबह चलेगी!"
सोंचिए, तीन-तीन घंटे सारे मैनेजर एक कमरे में बैठकर क्या करें? आधा घंटा तो ठीक, फिर शुरू हो जाता डायरेक्टर का लंच, ब्रेकफास्ट और ट्रैफिक पर भाषण! बाकी सब तो जैसे-तैसे झेलते, बेचारा इंटर्न भी उम्मीद लेकर बैठता कि अपनी बातें साझा करेगा, लेकिन...
"अगर सबके लिए जरूरी नहीं, तो बात मत करो!"
एक दिन इंटर्न ने दो-तीन मुद्दे अच्छे से तैयार कर लिए थे कि कैसे यहां की व्यवस्थाएं बेहतर हो सकती हैं। बस, बोलना शुरू ही किया था कि डायरेक्टर ने बीच में टोक दिया, "अगर तुम्हारी बात सबके लिए जरूरी नहीं है, तो इसे उठाने की जरूरत नहीं।"
अब बाकी सब तो अपनी-अपनी समस्याएं बेहिचक उठाते थे, लेकिन इंटर्न के हिस्से में ये रूल आ गया। अब हर हफ्ते जब उसकी बारी आती, वो बस इतना कह देता – "मेरी बात सबके लिए जरूरी नहीं है।"
इस तरह उसके सारे अच्छे सुझाव, जो उसकी असिस्टेंट मैनेजर की पोस्ट से आते थे, डायरेक्टर तक पहुंचे ही नहीं। कमेंट सेक्शन में एक पाठक ने चुटकी ली – "अरे, ऊपर बैठा बॉस खुद ही अपना नुकसान करा ले, इससे बड़ी सजा क्या होगी!"
गणित की गड़बड़ी और बोनस की कहानी
अब आता है असली मज़ा – डायरेक्टर साहिबा ने इंटर्न को अपना कुछ काम सौंपा, जिसमें कमरे भरने की प्रतिशत गणना करनी थी। 55 में से 52 कमरे भरे थे, यानि 94.54% रिजिडेंसी। इंटर्न ने नियम के हिसाब से 95% लिखा, लेकिन मैडम बोलीं, "नहीं-नहीं, .6 से कम हो तो राउंड अप नहीं करते!"
इंटर्न ने समझाया कि .5 पर ही राउंडिंग होती है, लेकिन साहिबा ने उसका मजाक बना डाला – "तेरे गणित के मास्टर पे मुझे तरस आता है!"
बाद में पता चला, डायरेक्टर खुद ही ये प्रतिशत कम दिखा रही थीं – 94%। अब ऑफिस की पॉलिसी ये थी कि 95% या उससे ज्यादा रिजिडेंसी पर ही बोनस मिलता है। एक पाठक ने सही तंज कसा – "बॉस ने खुद ही अपनी जेब काट ली!"
और तो और, OP (मूल लेखक) ने बाद में बताया कि उनकी बिल्डिंग में मार्केटिंग डायरेक्टर नहीं था, तो बोनस डायरेक्टर को ही मिलता। यानी अपनी ही जिद और गलत गणना की वजह से डायरेक्टर ने खुद को बोनस से वंचित कर दिया।
पाठकों की राय: “ऐसे बॉस से क्या उम्मीद?”
रेडिट के कमेंट्स में एक ने लिखा – “ये तो क्लासिक मिसमैनेजमेंट है, ऐसे बॉस से सबक यही मिलता है कि कैसे नहीं बनना चाहिए।”
एक और पाठक ने मजेदार तंज कसा – “लगता है मैडम गणित के पीरियड में सोती थीं, वरना .5 पर राउंड अप तो हर बच्चा जानता है!”
कुछ ने तो अपने-अपने अनुभव भी शेयर किए – जैसे एक ने बताया कि उनके ऑफिस में भी रोज़-रोज़ मीटिंग्स का यही हाल है, कभी हफ्ते में ‘डेली’ होती है, कभी हफ्ते में तीन बार।
और एक अन्य पाठक ने बड़ा प्यारा सूत्र दिया – “जब तक ‘बैंकर्स राउंडिंग’ समझ में न आए, Microsoft Excel की शरण में जाना ही बेहतर है!”
आखिर में: सबक क्या मिला?
हमारे इंटर्न ने आखिरकार अपने फाइनल पेपर में यही लिखा कि “कभी-कभी गलत मैनेजमेंट से भी बहुत कुछ सीखने को मिलता है, कम से कम ये तो पता चलता है कि क्या नहीं करना चाहिए!”
तो दोस्तों, अगली बार जब आपका बॉस मीटिंग में कुछ अजीब नियम थोपे या गणित की गड़बड़ी कर बैठे, तो मुस्कुरा के याद करिए – "अपनी करनी, अपने गले!"
क्या आपके ऑफिस में भी ऐसे किस्से हुए हैं? नीचे कमेंट में जरूर बताएं – शायद अगली कहानी आपकी ही हो!
मूल रेडिट पोस्ट: Morning Meeting Compliance (plus a bonus)