जब बॉस की एक जिद ने पूरे ऑफिस को सबक सिखा दिया: ऑफिस टाइमिंग्स की असली कहानी
ऑफिस के नियम और टाइमिंग्स – भाईसाहब, जितने ऑफिस उतनी कहानियाँ! कभी लगता है कि ये टाइमिंग का चक्कर सिर्फ हाजरी के लिए है, लेकिन कई बार एक छोटी-सी जिद पूरे सिस्टम को हिला देती है। आज की कहानी भी कुछ ऐसी ही है, जिसमें एक नेटवर्क सपोर्ट इंजीनियर की ड्यूटी और एक मैनेजर की ‘मैं ही सही’ वाली सोच ने पूरी कंपनी को हिला के रख दिया।
सुबह का सूरमा और शाम की छुट्टी: असली काम की पहचान
हमारे नायक (Reddit यूज़र u/Watching20) एक कंपनी में नेटवर्क सपोर्ट का काम करते थे। ये कंपनी एक शहर में थी, लेकिन उनकी जिम्मेदारी थी दूसरे राज्य की एक मैन्युफैक्चरिंग प्लांट की—जहाँ हर सुबह 7 बजे से काम शुरू हो जाता था। अब सोचिए, उस प्लांट की सॉफ्टवेयर और नेटवर्किंग अगर 7 बजे तक चालू ना हो, तो सारा काम ठप्प! तो जनाब हर रोज़ 7 बजे ऑफिस पहुँचते, सब सेट करते, और फिर 4 बजे अपनी छुट्टी कर लेते।
लेकिन जैसा कि हर भारतीय ऑफिस में होता है—किसी एक को तकलीफ हुई, तो सबका सिस्टम बदल दो! एक दिन 4:30 बजे किसी ने अपने कंप्यूटर का झंझट लेकर मैनेजर से शिकायत कर दी, और अगले ही दिन हमारे हीरो को तलब कर लिया गया—"तुम्हें 5 बजे तक रुकना ही पड़ेगा!" न तर्क, न बहस—बस आदेश।
बॉस की ‘मैं ही सही’ नीति और उसका मजा
अब हमारे इंजीनियर साहब ने समझाया कि "मैडम, मैं तो सुबह 7 बजे से जूझ रहा हूँ, इसलिए जल्दी जाता हूँ।" लेकिन बॉस को तो बस अपनी दोस्त की समस्या दिख रही थी, बाकी सब गौण! यहाँ एक कमेंट करने वाले (u/christianmoral) ने क्या शानदार बात कही—"मेरे दोस्त के साथ भी यही हुआ था। कंपनी का CEO सुबह 6 बजे से काम शुरू करता था, तो वो भी जल्दी आता था, लेकिन नया आईटी मैनेजर आया और उसने जबरन 8:30 बजे से शिफ्ट करा दी। फिर CEO को सुबह 6 बजे प्रिंट नहीं मिला, तो सारा गुस्सा आईटी वाले पर निकाल दिया। HR तक मामला पहुँचा, और सबकी पोल खुल गई!"
यहाँ से सीख मिलती है—ऑफिस में कभी भी CYA (Cover Your Ass) भूलना नहीं चाहिए। हर बात, हर आदेश, सब कुछ ईमेल पर रखो। जैसे एक और कमेंट में (u/Chaosmusic) कहा गया: "अगर कोई कहे—'इसे लिखित में भेजो', तो समझ जाओ, मामला गंभीर है।"
जब ‘मालिक’ की मर्ज़ी भारी पड़ गई
अब हुआ ये कि हमारे नेटवर्क इंजीनियर ने भी "ठीक है मैडम, जैसा आप कहें" सोचकर 8 से 5 की शिफ्ट पकड़ ली। एक-दो हफ्ते बीते ही थे कि सुबह 7 बजे प्लांट का नेटवर्क बैठ गया। सिर पर हाथ रखकर सब इधर-उधर भागे, लेकिन साहब तो सो रहे थे! फोन आया, तो सीधा जवाब—"भाई, अभी तो बिस्तर से उठा हूँ, एक घंटे में आऊँगा।" उस दिन प्लांट का लाखों का नुकसान तो हुआ, लेकिन किसी ने मुँह खोलकर नहीं कहा कि "अब 4 बजे चले जाना।" सबकी बोलती बंद!
यह घटना किसी भी भारतीय ऑफिस की याद दिलाती है, जहाँ कभी-कभी नियमों की बजाय ‘इगो’ और ‘जुगाड़’ चलती है। एक पाठक (u/FakeRussianAccent) ने बड़े मज़ेदार अंदाज में कहा—"बॉस के पास तीन विकल्प हैं: या तो मुझे 7-4 पर रखें, या 8-5 पर और परेशानी झेलें, या फिर ओवरटाइम का पैसा दें!"
तकनीकी टीम की अनकही मेहनत: दिन-रात का फर्क
आईटी और नेटवर्किंग जैसी टीमों का काम अक्सर सबकी नज़रों से दूर होता है, लेकिन जब सिस्टम गड़बड़ाए तो सबकी नींद उड़ जाती है। एक और कमेंट (u/Cendax) में बड़ी गहरी बात कही गई—"डे शिफ्ट वालों को समझ नहीं आता कि कोई क्यों लेट आता है, लेकिन नाइट शिफ्ट वाले तुरंत समझ जाते हैं—क्योंकि उन्हें पता है, असली काम कब होता है!"
भारत में भी अक्सर देखा गया है कि लोग आईटी टीम को बस कंप्यूटर ‘फिक्स’ करने वाला मान लेते हैं, लेकिन असल में ये लोग ऑफिस की रीढ़ की हड्डी हैं। रात-दिन काम करके भी जब वक्त पर छुट्टी माँगें तो सवाल उठ जाता है, "इतनी जल्दी क्यों जा रहे हो?" लेकिन जब सिस्टम ठप हो जाए, तब याद आती है—"अरे, आईटी वाला कहाँ है?"
निष्कर्ष: ऑफिस की राजनीति और असली समझदारी
इस कहानी से दो बड़ी सीखें मिलती हैं—पहली, हर किसी की ड्यूटी और जिम्मेदारी का सम्मान करो। दूसरी, ऑफिस में अपनी बात लिखित में रखो, ताकि बाद में कोई आपको दोष न दे सके। और सबसे ज़रूरी—बॉस की एक जिद पूरी कंपनी की नींव हिला सकती है!
दोस्तों, आपके ऑफिस में भी ऐसा कुछ हुआ है? कोई ऐसी मजेदार या सिखाने वाली घटना? कमेंट में ज़रूर शेयर करें! और हाँ, अगली बार अगर बॉस बोले "रुको, नियम बदले हैं", तो जरा मुस्कुरा कर कह देना—"ठीक है, जैसा आप चाहें!"
मूल रेडिट पोस्ट: working hours