जब बॉस के आदेश ने कराई रिपोर्टिंग की हद, कर्मचारी ने दिखाया जुगाड़
भला ऑफिस में कौन ऐसा बॉस नहीं चाहता, जो अपने कर्मचारियों को समझे और सहयोग दे? लेकिन अगर बॉस ही ऐसा हो कि कर्मचारी की सांस फूल जाए, तो क्या हो? आज हम आपको एक ऐसी ही अनोखी कहानी सुनाने जा रहे हैं, जिसमें एक कर्मचारी ने अपने तानाशाह मैनेजर के अजीब आदेश का ऐसा जवाब दिया कि पूरी कंपनी में चर्चा छिड़ गई।
जब सपनों की नौकरी बनी सिरदर्द
ये कहानी एक ऐसे व्यक्ति की है, जिसने दस साल ‘ब्लू कॉलर’ यानी मजदूरी या फील्ड वर्क में पसीना बहाया। उसने अपने सपनों की ‘व्हाइट कॉलर’ यानी ऑफिस वाली नौकरी पाने के लिए जी-जान लगा दी। पढ़ाई खुद के दम पर पूरी की, पीठ में चोट खाई, लेकिन हार नहीं मानी। आखिरकार एक एयर कंडीशनर वाले ऑफिस में HR इंटर्न की नौकरी मिल गई। सोचा था अब ज़िंदगी सेट है, लेकिन किस्मत ने कुछ और ही सोच रखा था।
ऑफिस में पहली ही सुबह पता चल गया कि मैनेजर साहिबा तो खुद को ऑफिस की महारानी समझती हैं। हर छोटी-बड़ी गलती पर डांटना, कपड़ों के रंग पर लेक्चर देना—यहाँ तक कि अगर आपने सफेद शर्ट की जगह नीली पहन ली, तो एक घंटे का ‘प्रोफेशनलिज़्म’ का प्रवचन सुनना पड़ता था। जाड़े में स्वेटर पहनना तो जैसे अपराध हो गया! कर्मचारी बताते हैं, "हर दिन ऐसा लगता था जैसे काँच के टुकड़े निगल रहे हों।"
आदेश का अक्षरशः पालन, लेकिन देसी अंदाज में
एक दिन मैनेजर ने आदेश दिया—"ऑफिस में सूरज उगने से लेकर डूबने तक, हर फ़ाइल पर जो भी होता है, सबकी डेली रिपोर्ट दो। एक भी शब्द इधर-उधर हुआ, तो नौकरी खतरे में!" अब उन्हें पता था कि कर्मचारी को याददाश्त से जुड़ी समस्या है। लेकिन बॉस तो बॉस हैं, इंसानियत की जगह अहंकार ज्यादा था।
तो साहब, कर्मचारी ने भी ठान लिया—अब बॉस के आदेश का पालन तो होगा, लेकिन पूरी ईमानदारी और देसी जुगाड़ के साथ। उसी रात Excel खोलकर हर छोटी से छोटी बात लिखने लगा। अगली सुबह बोला—"कार से उतरा, दाहिने हाथ से ऑफिस का दरवाजा खोला, रिसेप्शनिस्ट को नमस्ते किया, 25 सेकंड तक कॉफी बनाई, कुर्सी एडजस्ट की, कंप्यूटर चालू किया, Excel खोला..." ऐसे एक-एक मिनट की रिपोर्ट सुनाता रहा।
बॉस बीच में टोकना चाहती थी, लेकिन कर्मचारी ने बड़ी मासूमियत से कहा—"आपने ही तो कहा था, हर बात रिपोर्ट करो!" पूरी घंटे की रिपोर्ट के बाद बॉस की बोलती बंद।
कम्युनिटी के विचार: समस्या कहाँ है—कर्मचारी में या बॉस में?
रेडिट पर इस किस्से को पढ़कर कई लोगों ने अपने अनुभव साझा किए। एक यूज़र ने लिखा, "कंपनियाँ बार-बार नए कर्मचारियों को निकाल देती हैं, लेकिन असली समस्या वाले बॉस को बचाती रहती हैं।" ये बात हमारे यहाँ भी खूब लागू होती है—‘अरे, नया लड़का है, एडजस्ट नहीं कर पा रहा’, कहकर असली दोषी को बचा लिया जाता है।
दूसरे कमेंट में कहा गया—"85% लोग नौकरी नहीं, बल्कि बॉस या माहौल के कारण छोड़ते हैं।" सोचिए, अगर एक टीम में हर साल नई भर्ती हो रही है, तो खोट कहाँ है? कर्मचारियों में या उस ‘तानाशाह’ बॉस में?
कुछ ने मज़ाकिया अंदाज में लिखा, "तीन मिनट बाद नौकरी गई! (असल में तीन महीने बाद)" तो किसी ने कहा, "कंपनियों में अक्सर वही लोग ऊपर पहुँच जाते हैं, जिनमें सबसे ज्यादा कमी होती है—जैसे हमारे यहाँ ‘ऊपर का पानी साफ नहीं’ वाली कहावत।"
सबक: बॉस बने, लेकिन इंसान रहना न भूलें
इस कहानी से हमें क्या सीख मिलती है? ऑफिस का माहौल अगर जहरीला हो जाए, तो न तो कंपनी को फायदा होता है, न कर्मचारियों को। अगर बॉस ही हर बात पर शक करें, छोटी-छोटी गलतियों पर चिल्लाएँ, तो अच्छे से अच्छा कर्मचारी भी टूट जाता है।
हमारे हिंदी समाज में भी अक्सर यही होता है—"बॉस है, जो बोलेगा वही करो" की मानसिकता हावी रहती है। लेकिन कभी-कभी, कर्मचारी भी अपनी सूझ-बूझ और ‘जुगाड़’ से सिस्टम को आईना दिखा सकता है।
आपकी राय?
क्या आपके साथ भी कभी ऐसा बॉस रहा है, जिसने तानाशाही या बेवजह के आदेश दिए हों? या आपने कभी ऐसे हालात में कोई देसी जुगाड़ अपनाया हो? अपनी राय और मजेदार किस्से कमेंट में जरूर बताएं। आखिर, ऑफिस की दुनिया में हर किसी के पास कोई न कोई चटपटा अनुभव जरूर होता है!
मूल रेडिट पोस्ट: Report everything that happens on these files - or else. Okay then..I will