जब बोर्ड ने पैसे बचाने की सोची, मैनेजर ने कर दी असली चालाकी
क्या आपने कभी ऑफिस की राजनीति के चक्कर में खुद को फंसते देखा है? या फिर वो दिन याद हैं जब आपके मेहनत का सारा श्रेय किसी और को मिल जाता था, और बॉस के चमचे आराम से कुर्सी पर विराजमान रहते थे? तो जनाब, आज की कहानी आपके दिल को छू भी सकती है और गुदगुदा भी सकती है!
यह किस्सा है एक छोटे से क्रिश्चियन चैरिटी संगठन का, जहाँ कोरोना के दौरान पैसों की तंगी आ गई थी। बोर्ड वालों ने सोचा – चलो, खर्चा कम किया जाए, और सीधा-सीधा दो मेहनती कर्मचारियों को निकाल दिया। अब सोचिए, जिनका असल में सारा काम चल रहा था, वही बाहर! और अंदर कौन बचा? पादरी की पत्नी (जो खुद ट्रस्टी बोर्ड की चेयर), चर्च के पुराने सदस्य, और एक सज्जन जिनके बच्चे थे – जिन्हें "नहीं निकाल सकते" का टैग लग गया था। अब असली खेल शुरू हुआ...
जब ऑफिस की राजनीति ने मारी पलटी
हमारे मुख्य किरदार हैं – ऐलन (नाम बदला गया है), जो इस चैरिटी के मैनेजर थे। ऐलन वैसे बॉस नहीं थे जिनसे सब डरें, बल्कि वो वो इंसान थे जो अपने कर्मचारियों के लिए दिल से खड़े रहते थे। असल में बोर्ड तो सिर्फ ऊपर-ऊपर से फैसले लेता था, लेकिन ऐलन ही थे जिनके पास सारा फाइनेंस और दिल था। इतना ही नहीं, ऐलन ने खुद की जेब से पैसे लगाकर संस्था को जिंदा रखा था!
बोर्ड ने सोचा - दो लोग निकालेंगे, पैसे बचेंगे। लेकिन ऐलन ने अपनी चुप्पी में ऐसा दांव चला कि बोर्ड के होश उड़ गए। उन्होंने दोनों निकाले गए कर्मचारियों को पूरी-पूरी सेवरेंस दिलवाई – एक को 6,000 पाउंड और दूसरे को 4,000 पाउंड। बोर्ड के लिए ये किसी बम से कम नहीं था! गुस्से में उन्होंने दोनों से बात तक करना बंद कर दिया। लेकिन असली मज़ा तो तब आया जब निकाले गए कर्मचारी (खासकर कहानी के लेखक) ऑफिस आकर मुस्कुराते हुए काम करते रहे – बिना किसी हंगामे के, बिना किसी दिखावे के।
"धर्म के नाम पर राजनीति": भारतीय दफ्तरों में भी ये कहानी जानी-पहचानी!
अगर आप सोच रहे हैं, "ये तो बस विदेश की बात है", तो ज़रा अपने आसपास देखिए। कई बार सरकारी दफ्तरों या सोसाइटी में भी यही होता है – काम करने वाले को कोई पूछता नहीं, और जो 'अपनों' में है, वही मलाई काटता है। यहाँ भी वही हुआ – बोर्ड के सदस्य कभी-कभार चाय पीने चले आते थे, लेकिन असल सेवा में उनकी रुचि नहीं थी। एक कमेंट में तो किसी ने बिल्कुल ठीक लिखा – "अक्सर जिन्हें बचाने के लिए निकाला जाता है, असली समस्या वो लोग नहीं होते।"
धर्मनिरपेक्षता की छुपी हुई क्रांति
लेखक ने एक और कमाल दिखाया – निकाले जाने के बाद भी वो ऑफिस में "खुलकर गैर-धार्मिक" रहते। आप सोचेंगे, इसमें क्या बड़ी बात है? लेकिन उस माहौल में जहाँ हर काम की शुरुआत प्रार्थना से होती थी, वहाँ सिर झुकाकर चुपचाप बैठना, 'आमीन' ना कहना, धार्मिक भाषा से बचना, और खुले तौर पर प्राइड पिन पहनना – वो भी ऐसे चर्च में जहाँ समलैंगिक विवाह की इजाजत नहीं थी – ये अपने आप में एक मूक विद्रोह था। जैसे हमारे यहाँ कोई अपने बॉस के मुंह पर कह दे – "भाई, मैं चमचागिरी नहीं करूंगा", वैसे ही!
एक कमेंट में किसी ने बड़ा ही मज़ेदार अंदाज में लिखा – "धार्मिक संस्थाएँ अक्सर अपने 'मूल्यों' की बड़ी-बड़ी बातें करती हैं, लेकिन असल में वहाँ की राजनीति और पक्षपात आम दफ्तरों से कहीं ज़्यादा होती है।" और सच मानिए, ऐसी बातें भारत में भी खूब देखने को मिलती हैं – चाहे वो स्कूल में हो, एनजीओ में, या किसी भी संस्था में जहाँ 'अपनों' का बोलबाला हो।
बोर्ड की हार, ऐलन की जीत
इस कहानी का सबसे मजेदार मोड़ तब आया जब संस्था, जो खुद को 'बचाने' के लिए फैसले ले रही थी, ऐलन के इस्तीफा देने के बाद ताश के पत्तों की तरह ढह गई। एक-डेढ़ साल में बंद, फिर दो साल बाद दोबारा खोलने की कोशिश, और फिर छः महीने में फिर से बंद। आखिर में समझ में आया – असली ताकत उन्हीं लोगों में थी जिन्हें निकाला गया था, ना कि उन 'खास' लोगों में जिन्हें बचाया गया।
कई कमेंट्स में लोगों ने ऐलन को हीरो बताया – और वाकई, हर ऑफिस में एक ऐलन जैसे बॉस की जरूरत होती है, जो ना सिर्फ नियमों का पालन करे, बल्कि दिल लगाकर अपने कर्मचारियों के लिए खड़ा रहे। एक और कमेंट में किसी ने बड़ा ही दिलचस्प लिखा – "ऊपर के लोग अक्सर पेड़ की छाँव में बैठकर सोचते हैं, लेकिन असली मेहनत जड़ में लगी होती है।"
निष्कर्ष: क्या हमने कुछ सीखा?
इस कहानी में हास्य भी है, कटाक्ष भी, और सच्चाई की चुभन भी। चाहे वो चर्च की राजनीति हो या हमारे अपने ऑफिस की, असली बदलाव लाने वाले अक्सर वही होते हैं जिन्हें सबसे कमजोर समझ लिया जाता है।
तो अगली बार जब ऑफिस में किसी की 'काटो-फिटाओ' वाली मीटिंग हो, तो याद रखिए – 'अपनों' को बचाना और मेहनती को निकालना, संगठन की जड़ें कमजोर कर देता है। और हाँ, ऐसे किसी ऐलन को अपने ऑफिस में पहचानना ना भूलिए – क्योंकि असली हीरो वही हैं!
आप इसके बारे में क्या सोचते हैं? क्या आपके साथ या आपके किसी जानने वाले के साथ ऐसा कुछ हुआ है? अपने अनुभव कमेंट में जरूर साझा करें – चर्चा में जुड़कर मज़ा दोगुना हो जाएगा!
मूल रेडिट पोस्ट: Board tried to cut costs. Manager cut the cord.