जब बच्चों की चालाकी पड़ जाए भारी: एक प्यारे बच्चे की ‘मासूम’ चाल
बच्चों की मासूमियत के किस्से तो हर घर में चलते हैं, लेकिन कभी-कभी उनकी चालाकी ऐसी होती है कि बड़े भी दंग रह जाएं। कई बार माता-पिता सोचते हैं कि वे बच्चों पर पूरी तरह नियंत्रण रख सकते हैं, लेकिन बच्चों का दिमाग कब किस दिशा में दौड़ जाए, कह नहीं सकते। आज हम आपको एक ऐसी ही मज़ेदार कहानी सुनाने जा रहे हैं, जिसे पढ़कर आप भी कहेंगे – “भई वाह, ये तो कमाल कर दिया!”
जब मासूमियत बनी चालाकी: चीज़-इट्स का किस्सा
कल्पना कीजिए, आप अपने 4-5 साल के बच्चे को देखते हैं कि वो पूरे Cheez-Its (एक तरह के बिस्किट) का डिब्बा लेकर ड्राइंग रूम में चला आया है। मां-बाप तुरंत टोकते हैं – “नहीं बेटा, ये डिब्बा रसोई में ही रहना चाहिए।” अब बच्चा क्या करता है? ज़्यादातर बच्चे शायद डिब्बा वापस रख दें। लेकिन इस कहानी के नायक ने तो गज़ब कर दिया!
उसने चारों तरफ देखा, चुपचाप रसोई गया, एक कटोरी ली, पूरे डिब्बे के बिस्किट उसमें उड़ेल दिए, डिब्बा वहीं छोड़ दिया और कटोरी लेकर विजयी मुद्रा में वापस ड्राइंग रूम में आ गया। जैसे कोई राजा अपने राज्याभिषेक के लिए ताज पहनकर आ रहा हो – या जैसे “सिंबा” को प्राइड रॉक पर उठाया जा रहा हो! माता-पिता ने एक-दूसरे की ओर देखा और दोनों के मुंह से एक साथ निकला – “अब तो गड़बड़ है!”
‘शाब्दिक आज्ञापालन’ – बच्चों का मास्टरस्ट्रोक
यह कहानी सिर्फ एक शरारती बच्चे की नहीं, बल्कि बच्चों की ‘literal’ सोच को भी दिखाती है। माता-पिता ने कहा था – “डिब्बा रसोई में रहना चाहिए।” बच्चे ने डिब्बा तो रसोई में ही छोड़ दिया, लेकिन Cheez-Its को कटोरी में डालकर ले आया। मतलब, उसने बात मानी भी और अपनी मनमानी भी कर ली।
रेडिट पर इस पोस्ट को पढ़ने वाले बहुत से लोगों ने अपने अनुभव भी साझा किए। एक पाठक ने मज़ाकिया अंदाज़ में पूछा, “क्या अब वो वकील बन गया है?” तो दूसरे ने लिखा, “ये बच्चा तो बड़ा होकर ज़रूर कानून की पढ़ाई करेगा!” भारतीय घरों में भी ऐसा अक्सर देखने को मिलता है – जब मम्मी कहती हैं, “किचन में खाना खाना है”, बच्चे प्लेट उठाकर किचन के दरवाजे पर बैठ जाते हैं और टीवी देखते हुए खाना खाते हैं।
कमेंट्स में छुपी हमारी ही कहानियाँ
रेडिट के कमेंट्स पढ़कर लगा कि दुनिया भर के माता-पिता एक जैसी परेशानियों से जूझ रहे हैं। एक पाठक ने लिखा, “मैंने अपने बच्चों से कहा, ‘जाओ बिस्तर पर कूदो’, और उन्होंने सच में बिस्तर पर trampoline की तरह कूदना शुरू कर दिया!” एक और ने बताया कि उनकी बेटी को कहा गया, 'जब घड़ी में 9 बजे हों, लाइट बंद कर देना'। बच्ची ने क्या किया? घड़ी की सुइयाँ घुमा दीं, 9 बजा दिए और फटाफट लाइट बंद कर दी!
क्या आपको अपने बचपन की यादें नहीं आ गईं? जब दादी कहती थीं, 'फोन पकड़ना', और आपने सच में टेलीफोन उठाकर पकड़ लिया और खेलने लग गए! एक पाठक ने तो अपनी भांजी की कहानी सुनाई, जिसमें लड़की को कमरे से बाहर जाने के लिए अंडरवियर पहनने का नियम था – तो वो सिर पर अंडरवियर पहनकर निकल आई!
भाषा की ताकत और बच्चों की तर्कशक्ति
इस कहानी से हमें ये भी सीख मिलती है कि बच्चों के साथ संवाद करते समय हमें कितनी सावधानी बरतनी चाहिए। शब्दों का चयन बहुत मायने रखता है। जैसे कि एक कमेंट में किसी ने लिखा, “नियम समझा दो, खेलना मुझे आता है!” और सच भी है – बच्चे नियमों की बारीकी पकड़ लेते हैं और वहीं से अपने खेल शुरू कर देते हैं। एक और उदाहरण में एक बच्चा बोला, “अगर आप मुझे फोन दे दें तो मैं पूछना बंद कर दूंगा।” यानी तर्कशक्ति में भी कम नहीं!
यही नहीं, कुछ बच्चे तो इतने चतुर होते हैं कि आपको उनकी चालाकी पर हंसी भी आए और चिंता भी हो। एक पाठक ने लिखा, “मेरी नातिन ने जब मैंने कहा कि ‘एक ही चीज़ लो’, तो उसने सारी मिठाइयाँ उठाकर मुँह में ठूंस लीं, और जब एक टुकड़ा गिर गया, तो मुझे घूरते हुए उठाया और फिर खा लिया!”
निष्कर्ष: बच्चों की मासूमियत – एक मीठा सिरदर्द
इन सारी कहानियों से एक बात तो साफ है – बच्चों की मासूमियत में छुपी चालाकी कभी-कभी बड़ों को भी मात दे देती है। उनकी ‘literal’ सोच और तर्कशक्ति हमें यह सिखाती है कि संवाद करते समय साफ और सटीक भाषा का उपयोग कितना जरूरी है। और सबसे अहम – बच्चों को हमेशा नया सोचने और समझने का मौका देना चाहिए, भले ही वो Cheez-Its की कटोरी ही क्यों न हो!
क्या आपके साथ भी ऐसा कोई मजेदार किस्सा हुआ है? नीचे कमेंट में जरूर शेयर करें! आपके बचपन या आपके बच्चों की ‘मासूम चालाकी’ से जुड़ी कहानियां पढ़ने का हमें बेसब्री से इंतजार रहेगा।
बोलो तो – बच्चों की बातें, हैं ना सबसे निराली!
मूल रेडिट पोस्ट: When we knew we were in trouble