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जब फ्लॉपी डिस्क पर ठोका स्टेपलर, और आईटी वाले के उड़ गए होश!

90 के दशक में आईटी समर्थन का कार्टून-शैली चित्र, जिसमें एक दूरस्थ कार्यालय और फ्लॉपी डिस्क जैसे पुरानी तकनीक के सामान हैं।
90 के दशक के आईटी समर्थन की यादों में डूबिए इस जीवंत कार्टून-3डी चित्र के साथ, जो दूरस्थ कार्यालय से तकनीकी समस्या समाधान के आकर्षण और चुनौतियों को दर्शाता है!

आईटी सेक्टर की कहानियों में जितना रोमांच है, उतना शायद ही किसी और में हो। पुराने जमाने की तकनीक, भोले-भाले कर्मचारी और उनकी मासूम गलतियाँ—ये सब मिलकर बन जाती हैं ऐसी कहानियाँ जिन्हें सुनकर हँसी भी आती है और सिर भी पकड़ना पड़ता है। आज हम आपको सुनाने जा रहे हैं 90 के दशक की एक ऐसी ही गुदगुदाने वाली घटना, जब एक छोटी सी गलती ने कंपनी के आईटी विशेषज्ञ को 400 पाउंड का चूना लगा दिया!

पुरानी तकनीक और नए झमेले

सोचिए, वो समय जब न स्मार्टफोन थे, न क्लाउड स्टोरेज। ऑफिस का काम फ्लॉपी डिस्क पर होता था। अब ये फ्लॉपी डिस्क कोई आज की पेन ड्राइव जैसी मजबूत चीज नहीं थी—बल्कि एक पतला, काला, और बहुत ही नाज़ुक सा चपटा डिस्क, जिसमें चुम्बकीय पट्टी पर डाटा रिकॉर्ड होता था। ज़रा सी लापरवाही से यह डिस्क खराब हो जाती थी।

कहानी है ग्लासगो के एक ऑफिस की, जो मुख्य दफ्तर से करीब 200 मील दूर था। वहाँ दो कर्मचारी पास-पास बैठते थे। पहले सज्जन एक्सेल शीट जैसी कोई स्प्रेडशीट में डाटा डालते, उसे 5 1/4 इंच की फ्लॉपी डिस्क में सेव करते, फिर डिस्क अगले कर्मचारी को भेज देते—जैसे अपने यहाँ फाइल पास की जाती है।

अजीब समस्या और आईटी वाले की यात्रा

मामला ये था कि, जैसे ही दूसरा कर्मचारी डिस्क से फाइल खोलता, फाइल खुलती ही नहीं थी! दफ्तर में यह सिलसिला हफ्तों चला—नई-नई फ्लॉपी भेजी गईं, लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात। आखिरकार, आईटी सपोर्ट के महारथी को 400 पाउंड खर्च कर वहाँ भेजा गया।

मजेदार बात ये कि, वहाँ पहुंचते ही उन्होंने सारा मामला चुटकियों में सुलझा लिया। हुआ ये था कि पहला कर्मचारी डेटा सेव करने के बाद, दूसरे को संदेश देने के लिए फ्लॉपी पर पोस्ट-इट नोट लगाता, और उसकी चिंता में स्टेपलर से उसे फ्लॉपी में ठोंक देता! यानी, फ्लॉपी डिस्क को ऐसे देखा जैसे कोई जरूरी कागज़ हो। दूसरा कर्मचारी पोस्ट-इट निकालकर डिस्क चला देता—और हर बार डिस्क खराब निकलती!

"फ्लॉपी" के साथ क्या-क्या हुआ…

अब आप सोचेंगे, ऐसा कैसे हो सकता है? लेकिन यकीन मानिए, तकनीक से अनजान लोगों के साथ ये आम बात थी। एक कमेंट करने वाले ने बताया कि उनके दफ्तर में बॉस ने फ्लॉपी को कंप्यूटर के टावर पर चुम्बक से चिपका दिया था! जब बार-बार डाटा गायब हुआ, तब जाकर किसी ने बताया कि चुम्बक फ्लॉपी के लिए जहर है। लेकिन बॉस को लगा कि शायद चुम्बक कमजोर है, इसलिए फ्लॉपी फट गई!

एक और मजेदार किस्सा—किसी ने अपनी क्रेडिट कार्ड की पट्टी बार-बार लैपटॉप के स्पीकर के पास रख दी, और फिर परेशान कि कार्ड बार-बार खराब क्यों हो रहा है। किसी और ने तो यहाँ तक कह दिया कि वो होटल की चाबी और फोन को एक ही जेब में रखते थे, और चाबी हमेशा खराब हो जाती थी।

तकनीक और इंसानी मासूमियत: एक भारतीय नजरिया

हमारे देश में भी ऐसे किस्से कम नहीं हैं। गाँवों में आज भी लोग मोबाइल में आने वाले "वीडियो कॉल" को "टीवी" समझ बैठते हैं। बड़े शहरों में भी कई बार लोग प्रिंटर की खराबी में कागज उल्टा डाल देते हैं या सीडी में छेद कर देते हैं, और फिर आईटी वाले को बुला लेते हैं!

रेडिट पर एक कमेंट में लिखा था—"लोगों को लगता है फ्लॉपी डिस्क भी कागज की तरह है, उसमें छेद कर दो, चिपका दो, सब चलेगा।" यह बिलकुल वैसा ही है जैसे गाँव में कोई सरकारी कागज को मोड़कर जेब में रख ले, और फिर तहसीलदार से डांट खाए।

सीख और मुस्कान

इस कहानी से एक बात तो साफ है—तकनीक चाहे जितनी भी आगे चली जाए, इंसानी मासूमियत और जुगाड़ू दिमाग कभी पीछे नहीं छूटता। कभी-कभी छोटी सी गलती बड़ी मुसीबत बन जाती है, लेकिन यही तो ज़िंदगी का स्वाद है! और हाँ, अगली बार जब आप कोई पेन ड्राइव किसी को दें, तो उस पर स्टेपलर मत ठोकिएगा!

आपके ऑफिस में भी ऐसी कोई मजेदार तकनीकी गलती हुई है? या किसी सहयोगी ने कुछ ऐसा किया हो कि आईटी वाले भी हैरान रह गए हों? नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर बताइए—शायद आपकी कहानी हमारे अगले ब्लॉग में आ जाए!


मूल रेडिट पोस्ट: From a long time ago....