जब फ़ोन नंबर की गड़बड़ी ने एक फ़ार्मेसीवाले को बना दिया ट्रकिंग कंपनी का 'बॉस
क्या आपने कभी सोचा है कि एक फ़ोन नंबर की छोटी सी गलती किसी की ज़िंदगी को कितना उलझा सकती है? हमारे देश में तो अक्सर सरकारी दफ़्तरों, अस्पतालों या दुकानों के नंबर उलट-पुलट छप जाते हैं, और फिर बेचारों की शामत आ जाती है! आज एक ऐसी ही सच्ची और मज़ेदार कहानी पढ़िए, जिसमें एक फ़ार्मेसीवाले अंकल ने, ट्रकिंग कंपनी के मालिक को सबक सिखाने के लिए, ऐसा petty बदला लिया कि सालों बाद भी लोग हँसते-हँसते लोटपोट हो जाएं।
फ़ोन नंबर की माया: किसका नंबर, किसका काम?
ये घटना उन्नीस सौ सत्तर के दशक की है, जब टेलीफोन ऑपरेटर सिस्टम धीरे-धीरे आउटडेटेड हो रहा था और ऑटोमेटेड डायलिंग शुरू हो रही थी। हमारे कहानी के हीरो, एक युवा फ़ार्मेसिस्ट, अपनी दुकान चला रहे थे, जब अचानक उनके नंबर पर रोज़ ट्रक वालों के फोन आने लगे। वजह? टेलीफोन कंपनी ने नए सिस्टम में एरिया कोड जोड़ दिए, लेकिन जिसने भी सिर्फ़ 7 अंकों का नंबर डायल किया, उसकी कॉल सीधे फ़ार्मेसी पर पहुँचती थी—कनाडा के टोरंटो में फ़ार्मेसी, और ओटावा में ट्रकिंग कंपनी, दोनों के नंबर एक जैसे!
अब आप सोचिए, रोज़ 20-25 बार कोई "भैया, ट्रक कहाँ पहुँचाना है?" पूछे, तो आपके धैर्य का बाँध भी टूट ही जाएगा। अंकल ने तो पहले हफ्ते भर बड़प्पन दिखाया—हर फोन करने वाले को सही नंबर समझाते रहे। लेकिन जब ट्रकिंग कंपनी के मालिक ने बात तक करने से मना कर दिया—"मुझे क्या, तुम देखो!"—तो अंकल की भी 'तेली का तेल, और बावर्ची की खुदाई' वाली भावना जाग गई।
बदला शुरू: "अब देखना, तुम्हारा धंधा कैसे ठप होता है!"
जब मालिक ने सुनना नहीं चाहा, तो अंकल ने भी सोचा, "अब मैं भी देखता हूँ, इनका क्या हाल करता हूँ!" इसके बाद, जो भी ट्रकिंग कंपनी के लिए फोन आता—कभी किसी ट्रांसपोर्टर को बोल देते, "तुम्हारी डिलीवरी कैंसिल हो गई, खाली ट्रक वापस ले आओ"; किसी और को बता देते, "अगर टायर पंचर है तो सामान छोड़ने की ज़रूरत नहीं, सीधे वापस आ जाओ।"
ये बदला भी बड़ा देसी अंदाज़ में था—'तुम्हारी बला से, अब भुगतो!' और क्या, एक हफ्ते में ही ट्रकिंग कंपनी का धंधा ऐसा चरमराया कि बड़े-बड़े अफसरों तक बात पहुँच गई। मेयर ऑफिस से फोन आया, "भैया, हमारी शिपमेंट का क्या हुआ?" अंकल ने भी गुस्से में आकर ऐसी झाड़ लगाई कि अगले ही दिन से सारे गलत फोन आने बंद!
ऐसा सिर्फ़ आपके साथ नहीं होता!
आप सोच रहे होंगे, "ऐसी गड़बड़ी तो हमारे यहाँ भी होती रहती है!" बिल्कुल सही! Reddit की इसी कहानी पर कई लोगों ने अपनी-अपनी मजेदार बातें लिखीं। जैसे, एक महिला के पास American Airlines का नंबर आ गया था, तो हर दूसरे दिन लोग टिकट पूछने लगते। लेकिन वह तो इतनी दयालु थीं कि सही नंबर बताने के साथ, खुद कंप्यूटर खोलकर उनकी फ्लाइट्स भी ट्रैक कर देती थीं—यहाँ तक कि 9/11 के दिन घंटों लोगों को उनके घरवालों की जानकारी देती रहीं। कमेंट्स में किसी ने लिखा, "आपकी माँ को मदर्स डे पर खास तोहफा मिलना चाहिए!"
कुछ और लोगों ने भी अपने अनुभव शेयर किए—कोई होटल के गलत नंबर पर कॉल्स लेता था, तो मस्ती में सबको 'सस्ते रेट' पर बुकिंग दे देता, कोई पिज़्ज़ा ऑर्डर लेता था और कहता, "30 मिनट में नहीं आया तो फ्री!" क्या मज़ाकिया लोग हैं! एक साहब तो हर कॉलर को सोमवार सुबह 8 बजे हेयरकट का टाइम दे देते, जिससे सैलून में भीड़ लग गई।
देसी नज़रिया: 'बोले तो, एक आम आदमी की जुबान'
हमारे यहाँ भी, गाँव-कस्बों में, कभी बिजली ऑफिस, कभी राशन दुकान या स्कूल के नंबर में एक-दो अंक बदल जाते हैं, और फिर पूरा मोहल्ला किसी अनजान के घर फोन घनघनाता रहता है। कुछ लोग तो बड़ा संयम रखते हैं, सही नंबर बताते हैं, तो कुछ लोग अंकल की तरह "अब भुगतो!" मोड में आ जाते हैं। Reddit के कमेंट्स में भी यही नज़रिया दिखा—"समझाओ, जब तक सामने वाला सुधरता नहीं, तब तक मज़ा चखाओ!"
एक कमेंट में लिखा, "लोग तो सुनते ही नहीं, चाहे आप कितनी बार कहो—'ये पुलिस थाना नहीं, रेलवे का सिग्नल बॉक्स है!'" तो कोई कहता, "हमने भी बैंक के लिए कॉल आई, तो बोल दिया—'आपका खाता ओवरड्राफ्ट में है, जल्दी आइए!'"
निष्कर्ष: आपकी बारी—क्या आप भी कभी ऐसी स्थिति में फँसे हैं?
तो दोस्तों, ये थी एक छोटे से फ़ोन नंबर की गड़बड़ी से निकला बड़ा मजेदार किस्सा। कभी-कभी छोटी-छोटी चिढ़ और गुस्से से भी ऐसी हास्यपूर्ण कहानियाँ बन जाती हैं, जो सबको गुदगुदा देती हैं। क्या आपके साथ भी कभी ऐसा हुआ है, जब किसी और के लिए आपके पास फोन आए हों? आपने क्या किया—सही नंबर बताया, या अंकल की तरह थोड़ा बदला ले लिया?
नीचे कमेंट में ज़रूर लिखिए, आपके अनुभव, आपकी मस्तियाँ—आखिर, ज़िंदगी का असली स्वाद तो इन्हीं छोटी-छोटी बातों में छुपा है!
मूल रेडिट पोस्ट: My dad's revenge on a trucking company.