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जब फिज़िक्स के छात्रों ने 'सोर्स' बताने की शर्त को बनाया मास्टरस्ट्रोक

भौतिकी कक्षा का कार्टून-3डी चित्र, जहां छात्र तरंग यांत्रिकी के सिद्धांतों पर चर्चा कर रहे हैं।
इस जीवंत कार्टून-3डी दृश्य में, उत्साही भौतिकी के छात्र तरंग यांत्रिकी के बारे में जीवंत चर्चाओं में लिप्त हैं, जो कक्षा में सहयोगी सीखने की भावना को दर्शाते हैं। यह कहानी स्रोतों का उल्लेख करने के महत्व पर प्रकाश डालती है, यह दिखाते हुए कि मौलिक सिद्धांत कैसे गहन शैक्षणिक अनुभवों की ओर ले जा सकते हैं।

किसी भी कॉलेज में पढ़ाई के दौरान ऐसे पल ज़रूर आते हैं जब छात्र और शिक्षक दोनों अपनी-अपनी ज़िद पर अड़ जाते हैं। लेकिन क्या हो अगर पूरा क्लास एकजुट होकर शिक्षक की शर्त को ही उनके खिलाफ घुमा दे? आज की कहानी कुछ ऐसी ही है, जिसमें फिज़िक्स के छात्रों ने अपने प्रोफेसर को MLA फॉर्मेट की ऐसी 'सौगात' दी कि बेचारे का सिर चकरा गया!

सोर्स बताओ, नहीं तो नंबर काटेंगे!

ये किस्सा है एक अमेरिकन यूनिवर्सिटी के Physics II क्लास का। कुल 32 छात्र, दूसरा सेमेस्टर, और टॉपिक – तरंगों की गिनती, ऑप्टिक्स, वगैरह-वगैरह। पहले असाइनमेंट के बाद प्रोफेसर ने बड़े गंभीर स्वर में घोषणा की – "हर किसी फॉर्मूले, नियम या थ्योरी के लिए सोर्स बताओ! बिना सोर्स के कोई चीज़ सही मानी ही नहीं जाएगी। अगली बार हर चीज़ का सोर्स और इस्तेमाल की वजह लिखना अनिवार्य है।"

अब भला बताइए, भारत के कॉलेजों में भी, अगर कोई प्रोफेसर ऐसे फरमान जारी कर दे कि ‘हर सूत्र, हर नियम, हर छोटी-बड़ी बात के लिए किताब का हवाला दो’, तो छात्रों की तो शामत आनी ही है! वहाँ भी छात्रों के चेहरे लटक गए – ये क्या नई मुसीबत है भाई?

छात्रों की एकजुटता – "ठीक है सर, जैसा आप कहें!"

लेकिन जहाँ चाह वहाँ राह! यहाँ एक छात्र (शायद 'डेव', नाम थोड़ा धुंधला है) ने पूरे क्लास को इकट्ठा किया और बोले – "अगर करना है तो दिल खोलकर करेंगे।" बस फिर क्या था, अगले असाइनमेंट में हर छात्र ने हर लाइन, हर फॉर्मूले, हर वाक्य के लिए MLA (Modern Language Association) फॉर्मेट में सोर्स लिखना शुरू कर दिया।

सोचिए, जहाँ पहले 3-5 पन्नों का असाइनमेंट होता था, वहाँ अब 15-15 पन्नों की किताब बन गई! MLA फॉर्मेट वैसे ही मानो किसी सरकारी फाइल जैसा भारी-भरकम, ऊपर से हर जगह कोमा-पूर्णविराम की भरमार। एक टिप्पणीकार ने तो मज़ाक में कहा, "MLA फॉर्मेट तो विज्ञान के लिए सबसे खराब चुनाव है।" (यहाँ जैसे हमारे कॉलेजों में बच्चे अक्सर बोलते हैं – "साहब, ये सब फॉर्मेलिटी की ज़रूरत ही क्या थी!")

प्रोफेसर का सिर पकड़ना – "बस कर बेटा, बहुत हो गया!"

अब बेचारे प्रोफेसर की हालत सोचिए – ना तो कोई टीए (Teaching Assistant) मदद के लिए, ऊपर से इतनी मोटी-मोटी असाइनमेंट की फाइलें! तीसरे ही असाइनमेंट पर जब फिर वही 'एन्साइक्लोपीडिया' जैसा बंडल उठा तो प्रोफेसर ने सिर पकड़ लिया। आखिरकार कहना पड़ा – "अब से बस आखिरी में एक पैराग्राफ में लिख दो, कहां से क्या लिया। MLA की पूरी बारात लाने की ज़रूरत नहीं।"

यहां छात्रों की 'मालिशियस कंप्लायंस' – यानी नियम का पालन कर के ही उसमें मस्ती करना – देखने लायक थी। एक छात्र ने कमेंट किया, "सोर्स बताने की बात को पकड़ कर हम सबने ऐसा कुछ किया कि प्रोफेसर खुद हार मान गए।" (जैसे अपने यहां बच्चे कहते हैं – "सर, आपने ही तो कहा था!")

हास्य और सीख – पश्चिमी शिक्षा में भी 'जुगाड़' चलता है!

सबसे मज़ेदार बात तो ये रही कि विज्ञान के असाइनमेंट में MLA फॉर्मेट का इस्तेमाल वैसे ही है जैसे भिंडी की सब्जी में गुलाब जामुन डाल देना! कई कमेंट्स में लोगों ने कहा – "विज्ञान के लिए तो APA या IEEE फॉर्मेट चलता है, MLA तो हद ही हो गई।" कुछ ने तो मज़ाक में कहा – "अगली बार 'चिकागो' फॉर्मेट में दे देना, देख लें कितना धैर्य है!"

एक और पाठक ने अपनी आपबीती सुनाई – "हमारे कंप्यूटर साइंस में भी प्रोफेसर ने APA7 फॉर्मेट मांग लिया। मैंने भी हर लाइन का रेफरेंस डालकर चार-पांच पन्नों का रेफरेंस सेक्शन बना दिया। Turnitin सॉफ्टवेयर ने तो फिर भी चोरी बता दी!" (यानी जहां देखो, सिस्टम की अपनी ही मस्ती!)

OP ने बड़ी सच्चाई से लिखा – "STEM (विज्ञान, गणित) में ज्यादातर नियम इतने स्थापित हैं कि हर बार 'न्यूटन' या 'श्रोडिंगर' का हवाला देने की ज़रूरत नहीं। वैसे भी, फॉर्मूले के नाम में ही उसका आविष्कारक छुपा होता है।"

निष्कर्ष: नियमों का पालन, लेकिन थोड़ा 'मजाकिया' अंदाज में!

इस पूरे किस्से से एक बात साफ है – जब छात्र एकजुट होकर किसी अजीब नियम को ही हथियार बना लें, तो प्रोफेसर भी सोचने पर मजबूर हो जाते हैं। भारतीय संदर्भ में कहें तो – "गुरु जी, जैसा बोला था, हमने तो पूरा निभाया, अब आप ही बोलिए आगे क्या करें!"

तो अगली बार जब आपके कॉलेज या ऑफिस में कोई बेवजह की फॉर्मेलिटी थोपे, तो इस किस्से को याद कीजिए। कभी-कभी नियमों का पालन कर के ही सबसे शानदार मजाक किया जा सकता है – बस, थोड़ा सा जुगाड़ और टीमवर्क चाहिए!

आपको क्या लगता है – क्या आपके साथ भी कभी ऐसा कोई 'मालिशियस कंप्लायंस' हुआ है? या आपका कोई दोस्त टीचर की बात को उसी पर पलट चुका है? अपने अनुभव नीचे कमेंट में ज़रूर शेयर करें!


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