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जब फैक्ट्री में 'केविन' आया, सबकी ज़िंदगी उलट-पुलट हो गई!

फैक्ट्री में दो वेल्डरों की एनिमे-शैली की चित्रण, जो उनके अजीब कार्य संबंध को दर्शाता है।
इस जीवंत एनिमे दृश्य में, हम दो वेल्डरों को उनके अनोखे कार्यस्थल गतिशीलता के उतार-चढ़ाव से गुजरते हुए देखते हैं। केविन के साथ काम करने का यह सफर बिल्कुल भी सामान्य नहीं है!

अगर आपने कभी अपने ऑफिस या फैक्ट्री में ऐसा कोई इंसान देखा है जिसकी हरकतें आपको दिमागी कसरत करा दें, तो यकीन मानिए, आप अकेले नहीं हैं! आज मैं आपको एक ऐसे 'केविन' की कहानी सुनाने जा रहा हूँ, जिसने अपने अजीब सवालों, गज़ब की हरकतों और तर्कहीन सोच से पूरी फैक्ट्री का जीना हराम कर दिया है। इस कहानी को पढ़कर हो सकता है आपको भी अपने ऑफिस का कोई 'केविन' याद आ जाए!

फैक्ट्री का 'केविन': एक चलता-फिरता रहस्य

हमारी कहानी शुरू होती है एक साधारण सी फैक्ट्री से, जहाँ मैं और केविन दोनों वेल्डर हैं। केविन मुझसे एक साल सीनियर है, लेकिन उसके काम और हरकतें देखकर लगता है जैसे वो किसी और ही ग्रह से आया हो। पहली बार जब उसने मुझसे पूछा—"भाई, ये 'फरी' (Furry) क्या होता है?"—तो मैं खुद कंफ्यूज हो गया। थिएटर पढ़ने का वेल्डिंग से क्या मतलब, और वहाँ से फरी पर पहुँच जाना? भारतीय संदर्भ में सोचिए, जैसे कोई पूछे—"भाई, थिएटर वाले लोग क्या जादू-टोना भी करते हैं?"

केविन की सोच: तर्क-वितर्क और तर्कहीनता

केविन की बातें कई बार इतनी अजीब होती हैं कि दिमाग ठनक जाता है। एक बार मैंने उसे अपने थिएटर के किरदार के बारे में बताया—'शैतानी पंडित' जो एकदम टीवी के प्रचारक पादरी जैसा दिखता था। केविन तो ऐसे डर गया जैसे मैंने उसे सच में भूत दिखा दिया हो! वो बार-बार कहता—"ऐसे लोगों के साथ मत घूमना, नहीं तो शैतान बहका देगा।" दफ्तर के बाकी लोग समझाते-समझाते थक गए कि भाई, ये सब एक्टिंग है। लेकिन नहीं, केविन तो मानो अपने ही तर्कों में उलझा हुआ था।

रोज़ के झमेले: लेट-लतीफी, गुमशुदगी और 'बड़े सवाल'

अब ऑफिस में समय पर पहुँचना तो किसी भी नौकरी की पहली शर्त होती है। लेकिन केविन, जो फैक्ट्री से सिर्फ दस मिनट दूर रहता है, हर रोज़ ऐसे भागता-भागता आता है जैसे कोई स्कूल का लेट हो गया छात्र हो। मजेदार बात ये कि टाइम पर punch-in करके वो फिर गायब! कभी कार में बैठा मिलता है, कभी दस मिनट बाद आराम से अपने वेल्डिंग बूथ में। कोई पूछे तो आवाज़ इतनी धीमी कि चार बार पूछना पड़ता है—"क्या बोले केविन?" एक पाठक ने कमेंट किया—"भाई, उससे पूछना बेकार है, सुनाई ही नहीं देता!"

ऑफिस की राजनीति और केविन का अजीब न्याय

हमारे बॉस वैसे तो बड़े कूल हैं—कहते हैं, "यहाँ से निकाले जाने के लिए तो कत्ल करना पड़ेगा!" शायद इसी वजह से केविन की नौकरी बची हुई है, वरना उसके लेट आने, गलत मटेरियल इस्तेमाल करने, और काम लेट करने जैसी हरकतों पर कोई दूसरा कब का बाहर हो चुका होता। लेकिन स्टाफ की कमी है, और केविन... बस, जैसे-तैसे टिका हुआ है!

सामाजिक ज्ञान और केविन की दुनिया

जहाँ एक तरफ़ केविन ऑफिस के काम में लापरवाह है, वहीं उसकी सामाजिक सोच तो बिल्कुल उल्टी-पुल्टी है। ब्लैकफेस के बारे में उसे समझाना, या बाइसेक्शुअलिटी के बारे में बताना—उसके लिए सब बेकार है। वो कहता है, "भाई, अगर तुम बाय हो तो मतलब तुम...!" और फिर बिना रुके तर्क देता है जैसे स्कूल का प्रिंसिपल हो। किसी ने लिखा—"इतनी बेवकूफी देखी नहीं, और ऊपर से बहस भी करता है!"

एक बार मैंने प्राइड फ्लैग वाली टोपी पहन ली। मैंने मज़ाक में कह दिया—"ये टोपी भी गे है!" तो केविन पूरी गंभीरता से पूछ बैठा—"टोपी को कैसे पता चला कि वो गे है? क्या चीज़ों की भी लैंगिकता होती है?" यहाँ तो मैं खुद हँसी रोक नहीं पाया।

'केविन' हर ब्रांच में, हर दफ्तर में!

कमेंट्स में कई लोगों ने अपने-अपने 'केविन' के अनुभव साझा किए। कोई बोला—"भाई, मुर्गी के साइज का भालू अच्छा रहेगा, वरना भालू के साइज की मुर्गी तो पूरा गाँव खा जाएगी!" एक पाठक ने सलाह दी—"देखो, केविन को मारना मत, वरना नौकरी जाएगी!"

सबसे दुखद हिस्सा तब आया जब मैंने COVID के समय अपनी एक प्रिय बुज़ुर्ग मित्र की मौत का ज़िक्र किया। केविन ने तो सारी हदें पार करते हुए बोल दिया—"वैक्सीन से मरे होंगे, COVID कुछ नहीं!" उस वक्त मेरा खून खौल गया। कई पाठकों ने इस पर सहानुभूति जताई और कहा—"ऐसे लोगों से बहस करना ही बेकार है!"

निष्कर्ष: आपके ऑफिस में भी 'केविन' है क्या?

कहानी पढ़कर आपको अपने ऑफिस या मोहल्ले का कोई 'केविन' याद आया? सच कहूँ तो, हर दफ्तर में, हर ग्रुप में एक ऐसा इंसान मिल ही जाता है, जो अपनी हरकतों से हँसा भी देता है और परेशान भी।

अगर आपके पास भी ऐसी कोई मज़ेदार या हैरान कर देने वाली 'केविन' स्टोरी है, तो कमेंट में ज़रूर बताएं। कौन जाने, अगली कहानी आपकी हो!


मूल रेडिट पोस्ट: I Work With A Kevin