जब प्रिंसिपल ने दिया मुफ्त में मेहनत का वादा, और छात्र ने रंग दी ऑफिस की दीवारें पिंक!
स्कूल की यादें और मस्ती – दोनों साथ-साथ चलती हैं। लेकिन अगर आपको कभी लगा कि आपके स्कूल वाले आपसे मुफ्त में काम करवाते थे, तो जनाब, पढ़िए ये कहानी! इसमें है एक हाईस्कूल के आर्ट क्लब अध्यक्ष की ऐसी चतुराई, जिसे जानकर आप भी कहेंगे – “वाह भई, क्या बदला लिया है!”
जब मुफ्त लंच का वादा बना झांसा
हमारे कहानी के हीरो (या यूँ कहें ‘कलानायक’!), एक हाईस्कूल के आर्ट क्लब के अध्यक्ष हैं। आर्ट में उनका हाथ अच्छा है, इसलिए प्रिंसिपल और आर्ट टीचर ने कहा – “बेटा, स्कूल की पुरानी, उखड़ी दीवारों को जैसे चाहे, पेंट कर दो। बदले में मिलेगा – फ्री लंच!” सोचिए, स्कूल में केमिस्ट्री और मैथ्स की क्लास से छुट्टी, ऊपर से मुफ़्त खाना! भला कौन मना करेगा?
लेकिन यहाँ ज़रा ट्विस्ट है – स्कूल में कैफेटेरिया नहीं, बस एक छोटा सा कैंटीन है, जहाँ वही बासी-बासी समोसे और पैकेट वाला खाना मिलता है। पर हीरो सोचता है, “चलो, मैथ्स-केमिस्ट्री से तो बेहतर ही है!” और शुरू हो जाता है दीवारों और दरवाज़ों पर रंग-रोगन। वह केमिस्ट्री लैब का दरवाज़ा भी पेंट करता है। लेकिन जैसे ही एक काम पूरा, स्कूल वाले अगला काम थमा देते – “बेंच पेंट कर दो, दरवाजे पर डिजाइन बना दो!” मेहनत पर मेहनत, लेकिन मज़ा भी आ रहा है।
प्रिंसिपल अंकल और उनका पिंक दरवाज़ा
अब कहानी में असली मज़ा तब आया, जब हीरो ने प्रिंसिपल से फ्री लंच माँगा। जवाब मिला – “बेटा, अब नहीं दे सकते!” यानी मुफ्त में मेहनत करा ली, अब खाना भी नहीं! अब तो मुँह का स्वाद बिगड़ना ही था। तभी आदेश आया – “प्रिंसिपल ऑफिस का दरवाज़ा भी पेंट कर दो, बहुत पुराना हो गया है।”
अब हीरो का दिमाग चल पड़ा – “जब वे बताते ही नहीं कि किस रंग में पेंट करना है, तो क्यों न कुछ तगड़ा किया जाए?” और जनाब, पूरा दरवाज़ा हो गया ब्राइट पिंक! सोचिए, एक अनुशासित, नामी स्कूल के प्रिंसिपल के ऑफिस का दरवाज़ा – वो भी झकास पिंक!
इंस्पेक्टर हुए हैरान, स्कूल में मच गया बवाल!
कहानी यहीं खत्म नहीं होती। असली मसाला तो तब आया, जब स्कूल में निरीक्षण (इंस्पेक्शन) के लिए, इंस्पेक्टर साहब अपने तीन सचिवों के साथ आए। दीवारों की कलाकारी देख, वे तारीफ करते रहे। लेकिन जैसे ही प्रिंसिपल के ऑफिस पहुँचे – वहाँ चमकता पिंक दरवाज़ा देखकर, इंस्पेक्टर साहब के होश उड़ गए! वे फटाफट निकल लिए, और स्कूल में तुरंत मेंटेनेंस टीम भेज दी गई।
यहाँ एक कमेंट करने वाले ने मज़ेदार बात कही – “तुमने तो प्रिंसिपल को ऐसे कोने में लाकर खड़ा कर दिया, जहाँ से निकलना मुश्किल!” (यानी जैसे किसी को ‘पेंट कर के कोने में खड़ा कर देना’)। खुद हीरो भी कमेंट करता है – “हां, सच में ऐसा ही हुआ!”
मुफ्त में काम, और सबक भी मुफ्त में!
कई कमेंटर्स ने लिखा – “ये स्कूल वाले बच्चों से मुफ्त में काम करवाते हैं, वो भी पढ़ाई के समय में? ये तो शोषण है!” एक सदस्य ने कहा, “ऐसा सबक तो पहली नौकरी में ही मिल जाता है कि हर वादा लिखित में लो, वरना धोखा हो सकता है।”
हीरो ने भी सीखा – “अब अगली बार कुछ भी फ्री में पेंट करने से पहले, सब लिखवा लूँगा!” और हाँ, मज़ेदार बात – पिंक रंग हटाने में स्कूल वालों को बहुत पसीना आया, क्योंकि हीरो ने सस्ता पेंट इस्तेमाल किया था। उन्होंने बाद में दरवाज़ा काले रंग से पेंट करवा दिया।
एक और कमेंट में किसी ने पूछा – “पिंक रंग में दिक्कत क्या थी?” हीरो ने जवाब दिया – “हमारे देश में लोग बहुत पारंपरिक हैं, और पुराने लोग पिंक रंग को मर्दों के लिए अच्छा नहीं मानते। ऊपर से 60 साल के इंस्पेक्टर और प्रिंसिपल के ऑफिस का पिंक दरवाज़ा – सोच लो कैसा लग रहा होगा!”
क्या सीख मिली? – “मुफ्त की मेहनत, कभी न करो!”
इस कहानी से हमें एक बड़ी सीख मिलती है – चाहे स्कूल हो या दफ्तर, कभी भी अपने हुनर की कीमत जानें। मुफ्त में काम करना, और ऊपर से वादा तोड़ना – ये सही नहीं। जैसा एक कमेंट में कहा गया – “अपने काम की कीमत कम मत आँको, तुम्हारा समय कई चिकन नगेट्स के बराबर है!”
और हाँ, अगली बार अगर कोई आपसे कहे – “बस थोड़ा सा काम कर दो, बदले में समोसा खिला देंगे” – तो ज़रा सोचिएगा, कहीं आपका हुनर भी पिंक दरवाज़ा न बन जाए!
अंत में – आपकी राय?
क्या आपके साथ भी ऐसा हुआ है, जब मेहनत का सही मोल नहीं मिला? या स्कूल में कुछ ऐसा किस्सा हुआ हो, जिसे आज भी याद करके हँसी आती है? नीचे कमेंट में जरूर बताइएगा! और अगर आपको कहानी पसंद आई हो, तो दोस्तों के साथ शेयर करें – ताकि अगली बार कोई भी अपने आर्टिस्ट दोस्त से मुफ्त में पेंटिंग न करवाए!
मूल रेडिट पोस्ट: Make me do labor for free? Explain to the Inspector why your office door is bright pink.