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जब पुराने जमाने के बॉस की चालाकियाँ उन्हीं पर भारी पड़ी: ऑफिस की एक मज़ेदार कहानी

एक निराश कर्मचारी तनावपूर्ण कार्यालय माहौल में अपने पुराने प्रबंधक का सामना कर रहा है, जो पीढ़ीगत संघर्षों को उजागर करता है।
इस फोटो यथार्थवादी छवि में, एक युवा कर्मचारी अपने पुराने प्रबंधक के सामने खड़ी है, जो पुरानी प्रबंधन शैलियों के कारण उत्पन्न तनाव और निराशा को दर्शाती है। यह क्षण कार्यस्थल में पीढ़ीगत भिन्नताओं को समझने में कई लोगों के सामने आने वाली चुनौतियों को प्रतिबिंबित करता है।

कम्पनी की नौकरी में सबने कभी न कभी ऐसा बॉस देखा होगा जो ‘अपना जमाना’ दिखाने में लगा रहता है। ऐसे बॉस जिनको लगता है कि उनकी हर बात पत्थर की लकीर है, और अगर कोई उनकी हाँ में हाँ न मिलाए, तो आफत आ जाती है! आज की कहानी भी ऐसी ही है—एक कर्मचारी और उसके पुराने खयालों के बॉस की भिड़ंत, जिसमें आखिरकार जीत होती है दिमाग और धैर्य की।

नए बॉस का पुराना अंदाज़: काम के नाम पर तानाशाही

फिल्मों में आपने वो सीन तो देखा ही होगा—पुराना जमाना, एक सख्त बॉस और बेचारा कर्मचारी। यहाँ भी कुछ वैसा ही था। कहानी के नायक ने लगभग दो साल तक कंपनी में ईमानदारी से काम किया था। जब नौकरी छोड़ने का मन बनाया, तभी नए मैनेजर की एंट्री हुई। जनाब उम्र में 50-60 के आसपास, मगर सोच में 80 के जमाने के! उन्होंने कर्मचारी को रोक लिया और उसे रिटेल मैनेजर का प्रमोशन दे दिया—कम घंटे, ज़्यादा तनख्वाह और ऊपर से अनुभव का बोनस। कौन मना करता?

पर असली रंग तो प्रमोशन के बाद सामने आया। बॉस को लगता था कि अगर कर्मचारी डेस्क पर बैठा है तो काम नहीं कर रहा! शिकायत, टाइम टेबल बनाना, प्रपोज़ल तैयार करना—ये सब डेस्क वर्क उनके लिए कोई काम ही नहीं था। उनका मानना, "अगर घूम नहीं रहे हो, तो मेहनत कहाँ?" और तो और, उन्होंने नायक के सिर पर एक और टोपी रख दी—क्वालिटी कंट्रोल चेकिंग की। मतलब एक साथ दो बिल्कुल अलग-अलग जिम्मेदारियाँ!

“कामचोर” की तोहमत और चालाकी से पलटवार

अब आप समझ ही सकते हैं, एक आदमी दो नावों में पैर रखे तो क्या होगा? एक तरफ पेपरवर्क, दूसरी तरफ फील्ड वर्क—ऊपर से बॉस का चिल्लाना। ऐसे में समझदारी से काम लेना था। यहाँ नायक ने भारतीय जुगाड़ लगाया—जो काम डेस्क वर्क का था, उसे ब्रेक टाइम में निपटाया, बाकी वक्त में बॉस को दिखाने के लिए क्वालिटी कंट्रोल का काम किया। हर रिपोर्ट, शेड्यूल और प्रपोज़ल, ईमेल के ज़रिए बॉस को और साथ ही कंपनी के मालिक, डायरेक्टर वगैरह को cc में डालकर भेजा।

यहाँ एक पाठक की टिप्पणी का ज़िक्र जरूरी है—"साफ-साफ कागज़ी सबूत दिखा दिए, बहस करने की भी ज़रूरत नहीं पड़ी। यही है असली समझदारी!" सच में, कई बार चुपचाप सही दस्तावेज़ रखना, बहस से ज़्यादा काम आता है।

जब चाल उलटी पड़ गई: बॉस की भरी सभा में बेइज्जती

एक दिन बॉस ने बड़ा तमाशा करने के लिए मीटिंग बुलाई—मालिक और डायरेक्टर के सामने नायक को “निकम्मा” साबित करने चले थे। बोले—“ये अपना रिटेल मैनेजर का काम नहीं कर रहा, निकाल देना चाहिए!” पर असली चौका तो तब लगा, जब नायक ने सभी के सामने ईमेल्स और रिपोर्ट्स की लंबी लाइन दिखा दी—हर काम समय से किया, सबूत के साथ। मालिक और डायरेक्टर तो हैरान रह गए कि बॉस ने खुद ही कभी ईमेल पढ़ा ही नहीं! नायक ने साफ बताया कि दो उलटे-सीधे काम एक साथ कैसे नहीं हो सकते, और उसने तो हर जिम्मेदारी निभाई है।

यहाँ एक और पाठक ने कमेंट किया—"बॉस खुद कभी डेस्क वर्क नहीं करता था, इसलिए उसे लगता था बाकी सब भी कुछ नहीं कर रहे।" भारतीय दफ्तरों में भी अक्सर ऐसा होता है—कुछ लोग बस दूसरों पर उंगली उठाने में माहिर होते हैं।

आखिरकार न्याय: तानाशाही का अंत

मीटिंग के बाद क्या हुआ? बॉस की नौकरी गई, नायक को इनाम में सैलरी बढ़ गई। हालाँकि कुछ महीनों बाद नायक ने भी बेहतर मौके के लिए कंपनी को अलविदा कह दिया। इस कहानी से एक बड़ा सबक मिलता है—जब अफसरशाही और तानाशाही हद से बढ़ जाए, तो दिमाग और समझदारी से ही जीत होती है, न कि बहस या झगड़े से।

यहाँ एक और मज़ेदार कमेंट का जिक्र जरूरी है—"आजकल तो कोई भी थोड़ा बड़ा हो गया, उसको 'बूमर' बोल देते हैं, असल में ये जनरेशन X के लोग थे!" सही भी है, हमारे यहाँ भी किसी की सोच पुरानी लगे, तो "पुराने जमाने वाला" कहकर निपटा देते हैं, चाहे असल में उम्र कुछ भी हो।

क्या आपके ऑफिस में भी ऐसे “पुराने जमाने” के बॉस हैं?

तो दोस्तों, क्या आपके दफ्तर में भी ऐसा कोई ‘बॉस’ है, जो बस अपनी चलाना जानता है? क्या आपने कभी इस तरह की चालाकी, जुगाड़ या “कागज़ी सबूत” से किसी तानाशाह बॉस को मात दी है? अपने अनुभव कमेंट में ज़रूर साझा करें।

कहानी पढ़कर कैसा लगा? आपको क्या लगता है—इस तरह की स्मार्ट चालें सही हैं या नहीं? ऑफिस की अपनी कहानियाँ भी बताइए, और शेयर करना न भूलें। अगले ब्लॉग में मिलेंगे एक और मज़ेदार कहानी के साथ!


मूल रेडिट पोस्ट: My boomer manager and his boomerish ways of managing backfired on him