विषय पर बढ़ें

जब पार्किंग का चालान बना परेशानी, और ग्राहक ने भी कर दी कंपनी की छुट्टी

व्यस्त शहर के पार्किंग लॉट में खड़ी कार, सड़क पर पार्किंग खोजने की चुनौती को दर्शाती है।
एक जीवंत शहर के लॉट में खड़ी कार का यथार्थवादी चित्रण, शहरी पार्किंग की चुनौतियों को बखूबी दर्शाता है। यह छवि उस अनुभव को दर्शाती है जब मैंने एक स्थानीय रेस्तरां में भोजन करते हुए अपनी पार्किंग का समय बढ़ा दिया।

शहरों में पार्किंग ढूंढना वैसे ही सिरदर्द से कम नहीं। ऊपर से अगर ज़रा सा समय ज़्यादा हो जाए तो चालान और जुर्मानों की बाढ़ आ जाती है। सोचिए, महज़ 30 मिनट ज़्यादा खड़े होने पर अगर आपसे 80 डॉलर यानी लगभग 6,500 रुपये ठग लिए जाएँ, तो आपका क्या हाल होगा? आज की कहानी एक ऐसे ही आम आदमी की है, जिसने पार्किंग कंपनी को उसी की चाल में फँसा डाला।

अमेरिका की अजब-गजब पार्किंग कहानी: चालान से उठी चिंगारी

कहानी शुरु होती है एक आम शाम से, जब Reddit यूज़र u/fujoboo अपने दोस्तों के साथ डिनर के लिए शहर गए थे। जैसा कि बड़े शहरों में आम है, वहाँ सड़क पर पार्किंग मिलना किसी लॉटरी लगने से कम नहीं। हारकर उन्होंने पास के एक प्राइवेट पार्किंग लॉट में 2 घंटे के लिए पार्किंग खरीदी, और तकरीबन 30 डॉलर चुका दिए—यानी घंटे का 1,200-1,250 रुपये। लेकिन मस्ती में समय का पता ही नहीं चला, और 30 मिनट ज़्यादा खड़े रह गए।

मामला यहीं खत्म नहीं हुआ, असली ट्विस्ट तो तब आया जब एक हफ्ते बाद उनके घर एक पोस्ट आई—कंपनी ने 30 मिनट ज़्यादा पार्किंग का जुर्माना 80 डॉलर भेज दिया! यानी जितने में भारत में दो महीने की स्कूटर पार्किंग हो जाए, उतना सिर्फ आधे घंटे के लिए!

कंपनी के जाल में फँसा ग्राहक, लेकिन चालाकी में निकला उस्ताद

अब सोचिए, भारत में अगर इतनी भारी-भरकम पेनल्टी आ जाए तो लोग सीधे थाने या पार्षद के पास पहुँच जाते। u/fujoboo ने भी हार मानी नहीं। पहले तो फोन कर के विवाद किया, तो कंपनी ने 20 डॉलर घटा दिए, लेकिन 60 डॉलर (लगभग 5,000 रुपये) अब भी बच गए। अब जनाब ने सोचा—अगर कंपनी परेशान कर रही है, तो क्यों न उन्हें भी थोड़ी परेशानी दी जाए!

उन्होंने अपने बैंक से हर महीने 2-2 डॉलर (लगभग 165 रुपये) के 30 चैक भेजने का ऑटोमैटिक प्लान सेट कर दिया। मतलब, कंपनी को हर महीने एक छोटा-सा चैक प्रोसेस करना पड़ता। देखते ही देखते 10 महीने बीत गए, कंपनी के सब्र का बाँध टूट गया। 11वें महीने का चैक वापिस आ गया, साथ में नोट—"आपका खाता पूरा चुका दिया गया है!" यानी बाकी के 40 डॉलर कंपनी ने माफ कर दिए, बस ये सिरदर्द और नहीं चाहिए था!

जनता की राय: "इतना पैसा? ये तो डाके से कम नहीं!"

Reddit कम्युनिटी में इस कहानी ने भूचाल ला दिया। एक पाठक ने लिखा—"30 मिनट के लिए 80 डॉलर! ये तो पागलपन है।" वहीं, किसी ने सुझाव दिया कि ऐसे प्राइवेट पार्किंग लॉट्स में पेनल्टी के नाम पर दो-तीन गुना ज़्यादा वसूली जाती है, ताकि लोग समय से गाड़ी हटा लें। एक और ने मज़ाक उड़ाया—"भैया, अगली बार बाल्टी भर के सिक्के ले जाना और वहीं जमा करवा देना!"

कुछ लोग तो भारत की तरह सोचने लगे—"भला, क्यों पैसे दिए? कोर्ट में घसीटने दो, खुद ही हार मान लेंगे।" वहीं, u/fujoboo ने खुद जवाब दिया—"मुझे डर था, कहीं मेरा क्रेडिट रिकॉर्ड खराब न हो जाए, इसलिए किस्तों में चुका दिया।" किसी ने चुटकी ली—"अमेरिका में भी बैंक चैक प्रोसेस करने के पैसे खाते हैं, कंपनी ने खुद को ही घाटा करा लिया!"

क्या भारत में भी ऐसा हो सकता है?

अब सोचिए, अगर ये कहानी दिल्ली, मुंबई या बेंगलुरु की होती तो क्या हाल होता? यहाँ तो लोग पार्किंग की पर्ची खो जाने पर बहस कर लेते हैं; प्राइवेट कंपनी अगर 500 रुपये भी ज्यादा माँग ले, तो चार लोग मिलकर जमकर झगड़ पड़ें! और अगर किसी ने ऐसे किस्तों में पैसे देने की तरकीब आज़माई, तो शायद कंपनी वाले खुद ही पीछा छोड़ दें—"भैया, बस जाने दो, अगली बार ध्यान रखना!"

भारत में पार्किंग की समस्या और चालान दोनों ही अलग किस्म के हैं, लेकिन एक बात समान है—जहाँ नियमों का फायदा उठाकर कंपनियाँ पैसे वसूलती हैं, वहीं जनता भी जुगाड़ निकाल ही लेती है। Reddit की इस कहानी ने साबित कर दिया—चाहे अमेरिका हो या भारत, आम आदमी की अक्ल और कंपनियों के लालच की जंग हमेशा दिलचस्प रहती है!

आपकी राय क्या है?

क्या आपके साथ भी कभी पार्किंग या किसी और जुर्माने को लेकर ऐसा कुछ हुआ है? क्या आप भी कभी कंपनी को उनकी ही चाल में फँसा पाए हैं? नीचे कमेंट में अपना अनुभव ज़रूर साझा करें, और अगर कहानी पसंद आई हो तो दोस्तों को भी भेजें—शायद अगली बार कोई पार्किंग कंपनी सोचे, "भैया, इस ग्राहक से पंगा मत लेना!"


मूल रेडिट पोस्ट: Parked for 30 minutes longer than I paid for