जब पड़ोसी ने हद पार की: तीन साल की झिकझिक का मजेदार हिसाब-किताब
क्या आपके पड़ोसी कभी आपकी छोटी-छोटी बातों पर टोका-टाकी करते हैं? क्या उनकी शिकायतें कभी खत्म ही नहीं होती? तो जनाब, आज की कहानी आपके दिल को गुदगुदा देगी! एक Reddit यूज़र की कहानी है, जिसने तीन साल तक अपने ‘शिकायतबाज’ पड़ोसी की हरकतें झेली, और आखिरकार उसे उसकी ही चाल में फंसा दिया। यह किस्सा न सिर्फ मजेदार है, बल्कि हमें सिखाता है कि ‘जैसा बोओगे, वैसा काटोगे’ – और कभी-कभी, तो काटना बड़ा ही स्वादिष्ट होता है!
पड़ोसी की "जासूसी" और झूठी शिकायतों का सिलसिला
सोचिए, आप एक शानदार पाँच एकड़ की ज़मीन पर रहते हैं, अपना छोटा-सा परिवार, कुछ पालतू जानवर, और सपनों की जिंदगी। लेकिन तभी पड़ोसी जी – जिनका काम ही है आपकी ज़िंदगी में नाक घुसेड़ना – हर छोटी-छोटी बात पर नगर निगम, पुलिस और न जाने कौन-कौन सी अफसरशाही को फोन मिलाने लगते हैं। कभी आपके कुत्तों के भौंकने की शिकायत, कभी अस्थायी बाड़ बनाने पर ऐतराज, तो कभी लॉन की घास लंबी होने पर बखेड़ा!
तीन साल में बीस बार से ज्यादा शिकायतें! अब बताइए, इतना तो दिल्ली-लखनऊ के ट्रैफिक पुलिस भी चालान नहीं काटते। Reddit यूज़र कहते हैं कि “मुझे तो अब नगर निगम वालों से दोस्ती-सी हो गई थी, नाम तक याद हो गए।”
एक समय ऐसा आया कि खुद अधिकारी बोले, “भाई, अब इस पड़ोसी के खिलाफ उत्पीड़न (harassment) की रिपोर्ट दर्ज कर दो।” पुलिस बुलवाई गई, पड़ोसी ने वादा किया कि अब से फोन नहीं घुमाएंगे… और यूज़र को अपना नंबर भी दे दिया ताकि बात सीधे हो सके। पर जले पर नमक, तीन महीने बाद फिर वही शिकायतों की बारिश – आरवी ट्रेलर, घास, शोर-शराबा… यहां तक कि जब घरवाले सब छुट्टी पर थे, तब भी शोर की झूठी रिपोर्ट!
‘जैसा करोगे, वैसा भरोगे’: असली ‘FAFO’ पल
तीन साल बाद Reddit यूज़र का सब्र टूट गया। अबकी बार बारी थी पड़ोसी के घर की पोल खोलने की। हमारे भारतीय मुहावरे “दूध का दूध, पानी का पानी” और “जैसा करोगे वैसा भरोगे” यहां सटीक बैठते हैं।
यूज़र ने नगर निगम के नियम पढ़े और पता चला कि पड़ोसी साहब तो खुद नियमों की धज्जियाँ उड़ा रहे हैं! उनके घर में 40 से भी ज्यादा गाड़ियाँ बिना रजिस्ट्रेशन और बीमा के खड़ी थीं। तीन-तीन शिपिंग कंटेनर, जिनके लिए परमिट जरूरी था, वो भी बिना इजाजत। ऊपर से उन गाड़ियों को बिना लाइसेंस के फिल्मों में किराए पर देते थे – मानो अपने घर को छोटा-मोटा ‘फिल्म सिटी’ बना लिया हो!
अब पड़ोसी को आदेश मिल गया कि महीने के अंत तक सारी गैरकानूनी गाड़ियाँ और कंटेनर हटा दो, ट्रेलर भी सही जगह लगाओ, वरना भारी चालान और कार्रवाई होगी!
जैसे हमारे यहाँ कहते हैं – “कांच के घर में रहकर दूसरों पर पत्थर नहीं फेंकते।” Reddit पर एक यूज़र ने मजाक में कहा, “भाई, ये तो ऐसा कांच का घर था, जो असली नहीं, फिल्मों में सिर पर फोड़ने वाला नकली कांच था!” एक और ने जोड़ा, “ऐसे लोग कपड़े भी बेसमेंट में बदलें तो अच्छा है!” यानी खुद की पोल खुलने का डर हमेशा बना रहे।
कम्युनिटी की राय: असली ‘पेटी रिवेंज’ या न्याय?
Reddit कम्युनिटी ने भी इस किस्से पर खूब चटकारे लिए। किसी ने लिखा, “तीन साल तक सब्र! मैं तो दूसरी शिकायत के बाद ही खोजबीन शुरू कर देता।” एक और ने अपने अनुभव साझा किए कि कैसे ऐसे ‘पड़ोसी पुलिस’ हर मोहल्ले में मिल जाते हैं – छोटे-छोटे मामलों में कोर्ट-कचहरी तक खिंचवाते हैं, लेकिन जब न्यायाधीश खुद पूछ बैठें, “इतनी बार क्यों बुला लिया?”, तो समझ आ जाता है कि असली परेशानी कहाँ है।
कुछ लोगों ने सलाह दी, “अगर पड़ोसी फिर भी बाज न आए, तो टैक्स ऑफिस में रिपोर्ट कर दो, फिल्मों में गाड़ियों का धंधा बिना लाइसेंस और टैक्स के!” खुद पोस्ट लिखने वाले ने भी कहा, “ये मेरा ‘आखिरी तुरुप का इक्का’ है, समय आने पर खेलूँगा।”
यहाँ तक कि कई लोगों ने यह भी कहा – “अगर पड़ोसी जलन में तुम्हारे खिलाफ है, तो दोस्ती क्यों नहीं कर लेते? मिल-बैठकर चाय-नाश्ता करते, porch पर गपशप जमती!” हमारे देश में भी अक्सर यही देखा जाता है – कुछ लोग पड़ोसी की खुशहाली देखकर जलते हैं, पर दोस्ती का हाथ बढ़ाना भूल जाते हैं।
सीख: ‘कर्मा’ और ‘मूर्खता’ की गूढ़ कथा
इस कहानी में साफ दिखाई देता है कि “कर्मा कभी किसी का पीछा नहीं छोड़ता।” जैसा करेंगे, वैसा ही मिलेगा – और कभी-कभी बदला इतना मजेदार होता है कि पड़ोसी की सारी चालें उल्टी पड़ जाती हैं। Reddit पर किसी ने लिखा, “मूर्खता का इलाज तो नहीं, लेकिन सजा जरूर दी जा सकती है।”
हमारे देशी मोहल्लों में भी ऐसे किस्से आम हैं – कभी बाउंड्रीवाल को लेकर, कभी पानी की मोटर, कभी बच्चों के शोर पर। लेकिन जब कोई हद से गुजर जाए, तो कानून का सहारा लेना सही रहता है। और ये भी याद रखिए, “दूसरे के घर झाँकने से पहले, अपनी छत पर झाड़ू लगा लो।”
निष्कर्ष: आपके मोहल्ले में भी ‘कांच का घर’?
दोस्तों, ऐसे पड़ोसी हर गली-मोहल्ले में मिल जाते हैं। कभी-कभी सब्र से काम लें, तो अच्छा है, लेकिन जब हद हो जाए तो नियम-कानून का डंडा चलाना ही सही है। और हाँ, पड़ोसी से जलन करने की बजाय, कभी हँसी-ठिठोली, चाय-समोसे से रिश्ता मजबूत करना ज्यादा फायदेमंद है!
क्या आपके पास भी कोई ऐसा ‘पेटी रिवेंज’ या पड़ोसी से जुड़ा मजेदार किस्सा है? कमेंट में जरूर साझा करें! चलिए, मोहल्ले में शांति और हँसी-ठहाके साथ फैलाएँ – और याद रखें, “कांच के घर में पत्थर फेंकने से पहले अपने घर की खिड़की देख लें!”
मूल रेडिट पोस्ट: Neighbor pushed too far