विषय पर बढ़ें

जब पड़ोसी ने दोस्त को 'कचरा' कहा, तो बदले में मिला असली कचरे का स्वाद!

एक बेतरतीब आदमी दोस्तों से मिलने आया है, एक पड़ोसी की न्यायात्मक नजरों का सामना कर रहा है, जो दोस्ती और स्वीकृति की संघर्ष को दर्शाता है।
इस फ़ोटोरियलिस्टिक छवि में, एक दोस्त कठिन समय के बाद बेतरतीब दिखता है, जबकि एक घमंडी पड़ोसी न्यायात्मक दृष्टि डालता है। यह दृश्य दोस्ती, न्याय और संघर्षों की गहराई को दर्शाता है, जो करुणा और समझ की एक दिल को छूने वाली कहानी की पृष्ठभूमि तैयार करता है।

कहते हैं न, "जैसी करनी वैसी भरनी!" आज की कहानी भी कुछ ऐसी ही है—मुहल्ले की तंग गलियों, गर्मी के मौसम और रिश्तों में आई कड़वाहट के बीच छुपी है मज़ेदार छोटी सी बदला-कहानी। सोचिए आपका कोई करीबी दोस्त मुसीबत में फंसा हो, और जब वह आपसे मिलने आए तो कोई पड़ोसी उसे "कचरा" कह दे। गुस्सा आएगा न?

तो साहब, हमारे लेखक के दोस्त के साथ भी ऐसा ही हुआ। कई हफ्तों तक परेशानियों से जूझने के बाद उनका दोस्त उनसे मिलने आया—थोड़ा थका-हारा, बिखरा सा। लेकिन पड़ोस में रहने वाली 'मेमसाब' को यह रास नहीं आया। उन्होंने मुंह बनाकर, ऊँची आवाज़ में उसे "कचरा" कह डाला। अब भले लोग तो चुप रह जाते, लेकिन हमारे भाई साहब ने ठान लिया कि अब बदला तो लेना ही है!

कचरे की बदबू और कंपोस्ट का खेल

अब यहाँ कहानी में आता है ट्विस्ट। दरअसल, घरवालों ने कई बार कहा था कि कंपोस्ट (जैविक खाद) का ढेर बना लो, लेकिन शहर में घर इतने पास-पास कि बदबू का डर था। मगर अब जब पड़ोसन ने दोस्त की बेइज़्ज़ती कर दी, तो मौके पर चौका मारना ही था! सीधा कंपोस्ट का ढेर लग गया—वो भी पड़ोसन की खिड़की के ठीक नीचे, गर्मियों के मौसम में, और खास बात यह कि पड़ोसन के घर में AC नहीं था।

अब कंपोस्ट ढेर में जो जो डाला गया, वो सुनकर आप भी बोलेंगे—"हाय राम!"—मुर्गी, आलू, यहाँ तक कि कुत्ते का मल-मूत्र भी। पड़ोसन बेचैन, बदबू से परेशान होकर पुलिस बुला बैठीं। लेकिन पुलिस भी क्या करती? सबकुछ अपनी जमीन पर था, कानूनन रोक नहीं सकते। यहाँ घरवालों ने AC चला लिया, खिड़कियाँ बंद, और पड़ोसन? उनकी खिड़की खुली, और बदबू सीधी उनके कमरे में! जब पड़ोसन ने शिकायत की, तो जवाब मिला—"आप तो कचरे के बगल में रह रही हैं न, तो क्या उम्मीद थी?"

कंपोस्टिंग—सिर्फ बदला नहीं, जिम्मेदारी भी!

अब यहाँ Reddit की जनता ने भी खूब मज़े लिए। एक पाठक ने लिखा, "भाई, कंपोस्टिंग में मांस और पालतू जानवरों का मल डालना ठीक नहीं। इससे चूहे और गंध आएगी, और असली खाद भी नहीं बनती।" भारतीय गाँवों में तो लोग गोबर खाद बनाते हैं, लेकिन शहरी कंपोस्टिंग में मांस मछली डालना बिल्कुल मना है। एक और पाठक ने अपने रिश्तेदार का किस्सा जोड़ा, "मेरे जीजा जी ने भी कंपोस्ट में अपना ही मल डालना शुरू किया था—उसके बाद आँगन में जाना मुश्किल हो गया!"

दरअसल, सही कंपोस्टिंग में सिर्फ फल-सब्ज़ी के छिलके, सूखे पत्ते वगैरह ही डालने चाहिए। अगर सही अनुपात न हो, तो सड़ांध जरूर फैलेगी। एक पाठक ने तो मज़ाक में लिखा, "तुम खाद नहीं बना रहे, बस पड़ोसी को सज़ा दे रहे हो!" यानी बदले की भावना में खुद अपने घर के पास भी गंदगी फैला दी।

बदला या बेवकूफी?—पाठकों की राय से सीख

कुछ पाठकों का कहना था कि "पड़ोसी ने चाहे जितनी बड़ी बात कही हो, लेकिन हर किसी के लिए इतना बड़ा बदला लेना जरूरी नहीं होता।" एक पाठक ने लिखा, "एक कमेंट के बदले सालभर कुत्ते की पॉटी सूंघना थोड़ा ज्यादा हो गया!" वहीं, कुछ और ने बताया, "अगर सही से कंपोस्टिंग की जाए, तो बदबू नहीं आती, और अच्छी खाद भी मिलती है।"

एक पाठक ने यह भी तंज कसा—"अब तुम्हारे पड़ोसन के पास असली बदबूदार कचरा है, लेकिन तुम भी उसी गंध में रह रहे हो।" यानी बदले के चक्कर में खुद भी नुक़सान कर बैठे। और तो और, पुलिस का आना-जाना, पड़ोसियों से फूट—कई पाठकों ने इसे 'खुद की टांग पर कुल्हाड़ी मारना' कहा।

भारतीय संदर्भ में—पड़ोसी और बदला

हमारे यहाँ मोहल्लों में पड़ोसियों का आपसी ताना-बाना बहुत मजबूत होता है। कभी किसी के बर्तन आने-जाने का हिसाब, तो कभी बच्चों की शरारतों पर बहस! लेकिन ऐसे मौकों पर अक्सर कहा जाता है—"मुँह लगाओगे, तो दिनभर सिर दुखेगा!" यानी छोटी बातों को नजरअंदाज करना ही समझदारी है। अगर हर बार बदला लेने निकल पड़े, तो न घर चैन से रहेगा, न पड़ोस।

फिर भी, कहानी में मसालेदार ट्विस्ट तो है ही! आखिरकार, जब 'कचरा' कहने का बदला 'सचमुच कचरे' से मिले, तो ऐसी कहानियाँ ही तो दोस्तों की महफ़िलों में सुनाई जाती हैं—हँसी, मज़ाक और सीख के साथ।

निष्कर्ष—बदले की गर्मी में ना हो जाए घर में गंध

कुल मिलाकर यह कहानी हमें यही सिखाती है कि बदला लेने से पहले दस बार सोचें। पड़ोसी की एक कड़वी बात का जवाब अगर सूझबूझ से दिया जाए, तो रिश्ते भी बन सकते हैं और घर भी साफ रह सकता है। और हाँ, अगर कंपोस्टिंग करनी है, तो सही तरीके से करें—वरना पड़ोसन के साथ-साथ खुद भी 'कचरे' की गंध में जीना पड़ेगा!

आपके मोहल्ले में भी कोई ऐसा किस्सा हुआ हो? कमेंट में जरूर बताइए—और अगर कंपोस्टिंग का शौक है, तो उससे जुड़ी टिप्स भी साझा करें!


मूल रेडिट पोस्ट: Call my friends trash, your going to smell trash day and night