जब पड़ोसी ने कूड़ेदान पर कब्जा किया: एक छोटी सी बदला लेने की बड़ी कहानी
कई बार लोग छोटी-छोटी बातों पर भी अपनी हेकड़ी दिखाने से बाज़ नहीं आते। खासकर जब बात पड़ोसियों की हो, तो "मेरा-तेरा" का खेल और भी दिलचस्प हो जाता है। आज की कहानी भी कुछ ऐसी ही है – कूड़ेदान के बहाने शुरू हुआ पड़ोसियों का शह और मात का खेल, जिसमें एक ने अपनी छोटी सी बदला लेने की जिद से दूसरे को ऐसा सबक सिखाया कि आगे से उसने कभी उसकी चीज़ को हाथ तक नहीं लगाया!
कूड़ेदान की जंग: 'मेरी गली, मेरा डब्बा!'
हमारे नायक, Reddit यूज़र u/Less_Marionberry3051, एक ऐसी बिल्डिंग में रहते थे जिसमें दो फ्लैट थे। हर फ्लैट के सामने उसके अपने दो कूड़ेदान – एक गीले कचरे के लिए, दूसरा सूखे के लिए। अब यहां शुरू होता है असली तमाशा।
उनके पड़ोसी ने अपनी आदत बना ली थी कि पार्किंग में अपने लिए जगह बचाने के लिए हर बार हमारे नायक का कूड़ेदान खींचकर सड़क के कोने में रख देते। कभी आपने मोहल्ले में बाइक या ईंट रखकर जगह घेरने वालों को देखा है? बस, वैसा ही मामला! मगर यहां ईंट की जगह कूड़ेदान था।
हमारे नायक ने सोचा, “भई, मेरी चीज़ है, मैं क्यों दूँ?” और हर बार अपना कूड़ेदान वापस सही जगह पर रख देते। जवाब में पड़ोसी फिर से वही हरकत दोहराते। ये सिलसिला कई बार चला – कभी डिब्बा दो फीट इधर, कभी तीन फीट उधर, और कभी तो दोनों आपस में शिफ्टिंग गेम खेलने लगे। दोनों के बीच ये "कूड़ेदान की कुश्ती" मोहल्ले की गपशप का नया टॉपिक बन गई!
जब सब्र का बांध टूटा: 'अब आया ऊँट पहाड़ के नीचे'
एक रात हमारे नायक का सब्र जवाब दे गया। उन्होंने पड़ोसी का कूड़ेदान उठाकर सीधे सड़क के बीचोंबीच पटक दिया – वो भी उल्टा करके! अब चाहे कोई गाड़ी उसे कुचल दे, या कोई उसे उठाए – नायक को कोई फर्क नहीं पड़ा। अपना डिब्बा फिर से सही जगह पर रख कर, चैन की नींद ले ली।
अगले दिन, कमाल हो गया! पड़ोसी ने पहली बार अपने ही कूड़ेदान से अपनी पार्किंग की जगह घेर ली और हमारे नायक के डिब्बे को छुआ तक नहीं। जैसे कहते हैं, “जिस थाली में खाते हो, उसी में छेद मत करो” – पड़ोसी ने सबक सीख लिया था!
समुदाय की प्रतिक्रियाएँ: हंसी, सलाह और थोड़ा सा डर
Reddit की जनता भी इस कहानी को पढ़कर खूब हंसी। एक यूज़र ने मज़ाकिया अंदाज में लिखा, “Bin there, done that!” यानी – ये तो मेरे साथ भी हो चुका है! किसी ने तो यहां तक कह दिया – “अगर पड़ोसी फिर से हरकत करे, तो उसके डब्बे में पानी या गीली मिट्टी भर देना, सर्दियों में तो और भी मजा आएगा!”
कुछ लोग थोड़े गंभीर भी हुए – “भई, सड़क पर डिब्बा फेंकना ठीक है, लेकिन कहीं किसी गाड़ी वाले को नुकसान ना हो जाए।” एक कमेंट में बड़ा बढ़िया कहा गया – “अगर कोई इतनी बड़ी चीज़ को सड़क पर देख नहीं पाया, तो शायद उसे झटका लगना भी जरूरी है। आज डिब्बा कुचला, कल कहीं बच्चा या साइकिल वाला ना आ जाए।”
हमारे नायक ने भी मज़ाकिया जवाब दिया, “हां, शायद आपने सही कहा...” मगर अंत में जीत तो उनकी ही हुई!
भारतीय मोहल्लों में ऐसा क्यों नहीं चलता?
अब आप सोच रहे होंगे, भारत में तो ऐसा कम ही होता है। यहां तो लोग अपने डब्बे को ताला भी लगा दें, या फिर पड़ोसी के डब्बे में अपना कचरा भी डाल दें! कभी-कभी तो कूड़ेदान ही गायब हो जाता है, और मोहल्ले के बच्चे उसमें क्रिकेट खेलते मिल जाते हैं।
हमारे यहां का जुगाड़ भी कमाल का है – अगर पार्किंग में जगह चाहिए, तो कोई ईंट, टायर या टूटी कुर्सी रख देगा। कोई-कोई तो गमला रखकर भी जगह घेरता है! पर सोचिए, अगर हमारे मोहल्लों में भी ऐसी “कूड़ेदान की जंग” शुरू हो जाए, तो क्या नज़ारे होंगे!
कहानी से सीख: अपनी चीज़ों की कद्र करो, दूसरों की भी!
कहानी जितनी मज़ेदार है, उतनी ही गहरी सीख भी देती है। दूसरों की चीज़ों का सम्मान करना और अपनी हद में रहना – यही असली सभ्यता है। वरना छोटी-छोटी बातों में पड़ोसी से दुश्मनी, फिर वो झगड़ा धीरे-धीरे बढ़ता जाता है।
और हां, अगर कभी आपको भी लगे कि कोई आपकी चीज़ का गलत इस्तेमाल कर रहा है, तो कभी-कभी थोड़ा सा “प्यारा बदला” लेना भी बुरा नहीं – बशर्ते किसी को असली नुकसान न हो। आखिर, “जैसे को तैसा” भी तो हमारी संस्कृति का हिस्सा है!
अंत में – आपकी राय क्या है?
क्या आपके साथ कभी ऐसा हुआ है, जब किसी ने आपकी चीज़ अपने हिसाब से इस्तेमाल कर ली हो? आपने क्या किया? या आपके मोहल्ले में भी “कूड़ेदान की जंग” जैसी कोई मजेदार कहानी है? नीचे कमेंट में जरूर बताइए – और हां, ऐसी मजेदार कहानियों के लिए हमारे ब्लॉग को फॉलो करना न भूलें!
मूल रेडिट पोस्ट: Use your own bin!