जब पड़ोसी की चीखों ने उड़ाई नींद, और चालाकी से मिला जवाब
शायद ही कोई भारतीय होगा जिसे अपने पड़ोसी की वजह से कभी सिरदर्द ना हुआ हो। कभी तेज़ म्यूजिक, कभी झगड़ों की आवाज़, तो कभी रातभर चलती पार्टियां – पड़ोसी का शोरगुल वाकई हमारी नींद, शांति और धैर्य की सबसे बड़ी परीक्षा है। लेकिन अगर आपको लगे कि आपके पड़ोसी सबसे ज़्यादा परेशान करते हैं, तो ज़रा यह कहानी पढ़िए – जिसके किरदार ने बड़े ही चुटीले अंदाज़ में अपने 'चीखू' पड़ोसी को सबक सिखाया।
शोरगुल की दहशत: जब दीवारें भी कांप उठीं
कहानी एक छोटे से फ्लैट की है, जिसमें एक दंपती पिछले छह साल से रहते हैं। आसपास के ज़्यादातर पड़ोसी अच्छे दोस्त बन चुके हैं, लेकिन बगल वाले फ्लैट में रहने वाला युवा जोड़ा – खासतौर पर उसकी गर्लफ्रेंड – मानो आफ़त की पुड़िया! दिन हो या रात, उसकी चीखें, दरवाज़े पटकना, ज़ोर-ज़ोर से झगड़ना इस कदर कि दीवारें हिल जाएं। ये कोई मामूली शोर नहीं, बल्कि ऐसा लगता था जैसे 'क्राइम पेट्रोल' का एपिसोड लाइव चल रहा हो।
आमतौर पर भारतीय मोहल्लों में महिलाएं या बुज़ुर्ग ऐसे घरों में जाकर समझा-बुझा ही लेते हैं, लेकिन यहाँ तो बात उलटी पड़ गई। जिस दिन इस महिला ने जाकर शांति की बात की, उस दिन सामने से गाली-गलौच और "cry me a river, you fucking bitch!" जैसा जवाब मिला। अब बताइए, हमारे यहां तो इतनी बदतमीज़ी पर 'मुहल्ला पंचायत' ही बैठ जाती!
शांतिपूर्ण उपाय फेल, तो शुरू हुई 'छोटी बदला-लीला'
परेशानी बढ़ती गई – मकान मालिक से शिकायत, पुलिस को कॉल, यहां तक कि विडियो भेजना – सब बेकार। पुलिस आती भी थी तो घंटों बाद, और तब तक झगड़ा शांत। मकान मालिक तो मानो 'मूर्तिवत' हो गया था। ऐसे में, क्या करती भला?
अंत में, हमारी नायिका ने अपनाया 'पेटी रिवेंज' यानी छोटी मगर असरदार बदला-लीला। बिल्डिंग का बेसमेंट सबके लिए खुला था, और वहीं था बिजली का 'ब्रेकर्स' बॉक्स। एक रात जब चीख-पुकार ने हद कर दी, तो वो चुपके से गईं और पड़ोसी के फ्लैट की बिजली बंद कर दी। अब भले ही ज्यादातर लोग बिजली जाने पर ब्रेकर चेक कर लें, लेकिन इनका पड़ोसी जोड़ा इतना 'जीनियस' नहीं निकला। पिछली बार गर्मियों में बिजली काटने पर ये लोग दो-तीन दिन बिना बिजली के ही गुज़ार चुके थे! इस बार ठंड थी, तो सोचिए – अब 'चीखना' भी अंधेरे और ठंड में करना पड़ा!
सोशल मीडिया जुगाड़ और मोहल्ले की नुक्ताचीनी
रेडिट पर लोगों ने भी मज़ेदार सुझाव दिए। किसी ने कहा, "उसकी चीखें रिकॉर्ड करो और लाउडस्पीकर पर बजाओ – उसी की भाषा में उसे जवाब दो!" एक और पाठक ने बढ़िया तुकबंदी सुझाई – जब भी पड़ोसी चीखे, 'Cry Me A River' गाना बार-बार चला दो। सोचिए, अगर हमारे मोहल्लों में कोई ऐसा करता, तो अगले दिन की चाय-समाचार वहीं शुरू हो जाती!
कई टिप्पणियों में चिंता भी झलकती है – क्योंकि असल में ये महिला अपने बॉयफ्रेंड के साथ ज़्यादती कर रही थी। एक पाठक ने लिखा, "बेचारा आदमी! कई बार शोषित लोग खुद को दोषी मान बैठते हैं और रिश्ते से निकल नहीं पाते।" हमारे भारतीय समाज में भी ऐसी कहानियाँ आम हैं – जहाँ 'घर की इज्ज़त' के नाम पर शोषित चुपचाप सहते रहते हैं।
कुछ लोग तो सोशल मीडिया पर उसकी हरकतें वायरल करने की बात करने लगे। सोचिए, अगर हमारे यहां किसी की ऐसी फजीहत हो जाए तो – अगले दिन अखबारों की हेडलाइन तय है!
छोटी हरकत, बड़ा असर – क्या सही, क्या गलत?
एक ओर जहां कुछ पाठक बिजली काटने को 'कानून के खिलाफ' बता रहे थे, वहीं ज़्यादातर का कहना था – "भई, जब कोई तुम्हारी शांति भंग करे, तो उसे उसी की भाषा में जवाब मिलना चाहिए।" एक पाठक ने तो यहां तक कह दिया, "पड़ोसी के शोर के मुकाबले, बिजली काटना तो फूलों की सेज है!"
यहां सोचने की बात है – क्या कभी-कभी छोटी शरारतें, बड़ी समस्याओं का हल हो सकती हैं? या इससे बात और बिगड़ सकती है? भारत में भी अक्सर लोग ऐसे जुगाड़ अपनाते हैं – जैसे टीवी के रिमोट से पड़ोसी का चैनल बदल देना, डोरबेल बजाकर भाग जाना, या गाड़ी के नीचे केले का छिलका रख देना!
अंत में – सबक क्या मिला?
कहानी के आखिरी हिस्से में, हमारी नायिका बताती हैं कि कुछ समय बाद वो 'चीखू' लड़की घर छोड़कर चली गई। मोहल्ले में चैन लौटा, और सबने राहत की सांस ली। कई पाठकों ने लिखा – "ऐसे लोगों के लिए मोहल्ले की एकजुटता ही सबसे बड़ी दवा है।"
तो अगली बार जब आपके पड़ोसी शांति भंग करें, तो याद रखिए – कभी-कभी 'पेटी रिवेंज' भी काम आ सकता है, लेकिन समझदारी और संयम सबसे जरूरी है। और हाँ, अगर किसी के घर में हिंसा या शोषण हो, तो चुप न रहें – मदद कीजिए, क्योंकि मौन भी कभी-कभी अपराध बन जाता है।
आपकी क्या राय है, क्या ऐसे बदले जायज़ हैं? या आपको भी कभी ऐसे जुगाड़ आज़माने पड़े हैं? कमेंट में जरूर बताएं – और हां, अपने मोहल्ले की मजेदार किस्से भी साझा करें!
मूल रेडिट पोस्ट: Loud neighbor