जब पड़ोसी का 'गोल्फ कोर्स' लॉन और जिद्दी स्वभाव बना सिरदर्द – छोटी सी बदले की कहानी
हमारे मोहल्लों में पड़ोसी के साथ छोटी-मोटी नोंकझोंक कोई नई बात नहीं। कभी दीवार के पार कद्दू उगाने को लेकर बहस, तो कभी छत पर सूखती चादरों को लेकर तकरार। मगर आज की कहानी तो कुछ अलग ही है – ये है एक ऐसे पड़ोसी की, जो अपने लॉन को गोल्फ कोर्स से कम नहीं मानता और बाकी सबको भी वही सपना दिखाना चाहता है।
इस कहानी की शुरुआत होती है एक ऐसे शख्स से, जो अपने गली के नीचे वाले पड़ोसी को ‘ट्विट’ यानी हल्के से तंज में ‘अजीब’ कहता है। वजह? वो जनाब अपने लॉन की देखभाल में ऐसे डूबे रहते हैं जैसे कोई किसान अपने खेत में। उनकी घास, झाड़ियाँ, पेड़ – सब कुछ नपा-तुला, बिलकुल सुथरा और ज्यामितीय आकार में। कहते हैं, उनके लॉन की सीध और हरियाली देख आसपास के लोग भी शरमा जाएँ!
मगर, असली मसला तो तब शुरू हुआ जब ये सज्जन मोहल्ले में अपनी खुद की ‘HOA’ (Home Owners Association – यानी सोसायटी के नियम-कानून) बनवाने का सपना देखने लगे। अब भारत में तो सोसायटी के नियम ज्यादातर बड़े अपार्टमेंट्स में चलते हैं, मगर पश्चिमी देशों में कई मोहल्लों में ये HOA नाम का बवाल आम होता है। खैर, यहाँ के बाकी पड़ोसी इस ‘नियमों की सरकार’ के चक्कर में नहीं पड़े – सबको अपनी मर्जी से रहना ज्यादा भाया।
पड़ोसी की टोका-टाकी और ‘संस्कार’ सिखाने का जुनून
अब हमारे कहानी के नायक (या शायद खलनायक, ये आप तय करें!) का लॉन उतना चमचमाता नहीं था। जब-जब वो घास काटने निकलते, ये ‘गोल्फ कोर्स’ वाले पड़ोसी तुरंत हाजिर हो जाते – “भाई साहब, आपकी झाड़ियाँ बहुत बढ़ गई हैं”, “पैदल रास्ता कभी ठीक से ट्रिम किया है?”, “लो मेरा इलेक्ट्रिक एडगर ही ले जाओ, सभ्य समाज में शामिल हो जाओ!” वगैरह-वगैरह।
सोचिए, जैसे कोई रिश्तेदार बार-बार शादी में खाने पर टोका-टाकी करे, वैसा ही हाल! नायक ने तो कान में कपास डालने तक की सोची, मगर आखिर कब तक चुप रहे?
जब बदला मिला... कुत्तों और खरपतवारों की मदद से!
अब यहाँ असली ‘पेटी रिवेंज’ (छोटा बदला) की शुरुआत होती है। हमारे नायक ने अपनी बहन के कुत्तों को घुमाने का जिम्मा लिया – खूब खुले मैदान, नदी किनारे दौड़ाए, खूब सारे जंगली बीज और खरपतवार उनके शरीर में चिपकवाए, और फिर उन्हें घर लौटते वक्त ध्यान से ब्रश कर दिया। मगर, वो बीज और कंटीले फल्लियाँ... सीधा पड़ोसी के खूबसूरत लॉन पर बिखरा दिए!
कुछ ही हफ्तों में पड़ोसी का ‘गोल्फ कोर्स’ लॉन बन गया ‘जंगल’। हरियाली की जगह अब घास-फूस, जंगली पौधे और खरपतवार! बेचारे पड़ोसी दिन-रात घुटनों के बल बैठकर घास उखाड़ते, जड़ी-बूटियों की दवा छिड़कते, मगर लॉन के हालात ‘राम भरोसे’!
समुदाय की राय – क्या सही, क्या गलत?
Reddit पर इस किस्से पर खूब बहस छिड़ गई। कईयों ने लिखा – “जैसा बोओगे, वैसा काटोगे!” (He reaps what you sowed)। एक और ने मजाक में लिखा – “भाई, तुमने एकरसता तोड़ी, बहुत बढ़िया!”। भारत में भी अक्सर लोग कहते हैं – “पड़ोसी का मक्खन, अपना छाछ” – यानि दूसरों के दिखावे में न पड़ो।
मगर दूसरी तरफ, कई लोगों ने नायक को भी ‘कमीना’ करार दिया – “किसी के लॉन में जानबूझकर खरपतवार फैलाना सही नहीं”, “अगर कोई सज्जन अपने लॉन को सुंदर रखता है, उसमें बुराई क्या?”। कुछ ने तो ये भी कहा – “सिर्फ बात करने या सुझाव देने पर ऐसा बदला लेना बचकाना है।”
वहीं, कुछ की राय थी – “हर मोहल्ले में ऐसा एक ‘HOA अध्यक्ष’ टाइप इंसान होता है, जो खुद नियम बनाना चाहता है और दूसरों पर थोपना भी।” हमारे देश की सोसायटियों में भी अक्सर एक-दो ऐसे सदस्य मिल ही जाते हैं, जिनकी पूरी पहचान ही ‘नियम’ बन जाती है।
लॉन की असली अहमियत – समय, पैसा या दिखावा?
कुछ कमेंट्स बड़े दिलचस्प थे – “लॉन में इतना समय और पैसा लगाना बेकार है, उसमें सब्जियाँ उगाओ, मधुमक्खियों के लिए फूल लगाओ।” किसी ने कहा – “ज्यादातर खरपतवार भी खाने के काम आ सकते हैं, अपने लॉन को मिनी बगीचा बना लो!”
दरअसल, आज के समय में लॉन को लेकर सोच बदल रही है – जहाँ एक तरफ कुछ लोग इसे स्टेटस सिंबल मानते हैं, वहीं नई पीढ़ी पर्यावरण, पानी की बचत और प्राकृतिक विविधता पर ज़ोर देती है। भारत में भी अब छतों पर गार्डनिंग, किचन गार्डन और ‘मॉस लॉन’ (मखमली काई) जैसे ट्रेंड चलन में हैं।
निष्कर्ष – बदले की ये कहानी हमें क्या सिखाती है?
आखिर में, ये किस्सा दो अलग-अलग सोच और अहंकार की टक्कर है। एक ओर पड़ोसी की ‘परफेक्शन’ की सनक, दूसरी ओर नायक की ‘पेटी’ बदले की खुशी। सच पूछिए तो दोनों ही अपनी-अपनी जगह जिद्दी हैं।
तो अगली बार जब पड़ोसी अपनी झाड़ू लेकर आपके दरवाजे पर आए, सोचिए – क्या आप भी ‘पेटी रिवेंज’ का रास्ता अपनाएँगे, या फिर चाय की प्याली में सारी कड़वाहट घोल देंगे?
आपका क्या अनुभव रहा है ऐसे पड़ोसियों के साथ? नीचे कमेंट करके जरूर बताइए – और हाँ, अगली बार अपने लॉन में खरपतवार उग आए तो सोचना, कहीं कोई ‘पेटी बदला’ तो नहीं ले रहा!
मूल रेडिट पोस्ट: A small, but petty, revenge