जब पड़ोसी आंटी को मिली पुलिस शिकायत की असली सज़ा
क्या आपके पड़ोस में भी कोई ऐसा है जो हर छोटी बात पर शिकायत करता रहता है? जैसे ही टीवी की आवाज़ ज़रा सी तेज़ हुई, फौरन दरवाज़े पर आकर टोक देगा, या फिर सीधा पुलिस को फोन! आज की कहानी भी ऐसे ही एक पड़ोसी की है, लेकिन इसमें ट्विस्ट है – इस बार शिकायत करने वाली आंटी खुद फंस गईं।
शोरगुल का झगड़ा – एक आम समस्या, लेकिन अंत ज़बरदस्त!
ये किस्सा है लगभग 21 साल पुराना, जब एक नौजवान अपने “कागज़ और कार्डबोर्ड” जैसे पतले दीवारों वाले अपार्टमेंट में रहता था। उसकी बगल में एक बुजुर्ग दंपती रहते थे। अब आप सोचिए, दीवारें इतनी पतली कि पड़ोसी के छींकने की आवाज़ भी सुन लो! ऐसे में अगर कोई फिल्म देखना चाहे, या थोड़ा सा संगीत सुन ले, तो सामनेवाले को बुरा लगना लाजमी है।
पर यहाँ बात थोड़ी अलग थी। आंटी जी, जिनका गुस्सा शायद उनके कानों से भी तेज़ था, बार-बार पुलिस को बुला लेतीं – “बहुत शोर है!” पुलिस आती, हर बार वही नतीजा, “आंटी जी, आवाज़ तो सामान्य है, लेकिन आप कृपया थोड़ा कम कर लीजिए।” सोचिए, पुलिसवाले भी परेशान!
धैर्य की हद – और फिर पलटवार!
बार-बार बिना वजह पुलिस बुलाए जाने से जब युवक का धैर्य जवाब दे गया, तो उसने पुलिसवालों से सीधा सवाल पूछ लिया, “क्या बार-बार झूठी शिकायत करने वाले को भी सज़ा मिल सकती है?” पुलिसवाले एकदम चौंक गए, लेकिन जवाब नहीं दिया। फिर क्या था, उस दिन के बाद आंटी जी की शिकायतें अचानक बंद हो गईं।
कुछ हफ्तों बाद बिल्डिंग के चौकीदार ने बताया कि आंटी को ‘झूठी शिकायत’ करने पर भारी जुर्माना भरना पड़ा। अब कहावत याद आई – “जैसा करोगे, वैसा भरोगे।” पूरा मोहल्ला मुस्कुरा उठा!
कम्युनिटी की प्रतिक्रिया – हँसी, मज़ाक और सीख
रेडिट पर इस कहानी को पढ़ने वालों ने भी खूब मज़े लिए। एक यूज़र ने लिखा, “आंटी ने अपनी जिद और अकड़ का अच्छा-खासा दाम चुका दिया!” वहीं, किसी ने मज़ाक में कहा, “अब तो आंटी को हर हफ्ते डीजे पार्टी करनी चाहिए थी – जुर्माना तो मिल ही गया!” एक और कमेंट आया, “आंटी को आखिरकार उनके कर्मों का फल मिल ही गया।”
एक मजेदार कमेंट था – “मैं तो उस रात जान-बूझकर तेज़ आवाज़ में गाना बजाता, फिर अचानक आवाज़ कम कर लेता, ताकि आंटी को लगे कि मैंने भी बदला लिया!” किसी ने तो ये भी कहा, “कुछ लोग शिकायत करने में ही अपनी खुशी ढूंढते हैं, लेकिन जब खुद को भुगतना पड़े तो समझ आता है।”
एक और यूज़र ने अपनी कहानी साझा की – “मेरी पड़ोसन हर छोटी बात पर पुलिस बुलाती थी, लेकिन जब मैंने उसके कुत्तों को परेशान करने की तरकीब निकाली, तो खुद उसे घर छोड़ना पड़ा। तब जाकर शांति मिली!”
भारतीय नजरिए से – पड़ोसी और शिकायत, एक चिर-परिचित रिश्ता
हमारे देश में भी ऐसे पड़ोसी मिल जाते हैं, जिन्हें दूसरों के घर से आती हल्की-सी हंसी या रसोई से निकलती प्याज़ की खुशबू भी बर्दाश्त नहीं होती। कभी-कभी लगता है, जैसे मोहल्ले की शांति की जिम्मेदारी सिर्फ उन्हीं पर हो!
पर सच्चाई ये है कि हर किसी को अपने जीवन में थोड़ा समझौता करना पड़ता है। एक पाठक ने सही लिखा – “अगर शोर से दिक्कत है तो कान में रुई डाल लें या अच्छा-सा हेडफोन ले लें। पूरी दुनिया आपके हिसाब से नहीं चल सकती।”
निष्कर्ष – शिकायत से समाधान या सिरदर्द?
इस कहानी से एक बात साफ है – बार-बार बेवजह शिकायत करना अंत में खुद के लिए परेशानी का सबब बन सकता है। पड़ोसी को परेशान करना, पुलिस को तंग करना – इन सबसे अच्छा है थोड़ा सहनशील बनें, बातचीत से हल निकालें। आखिरकार, मोहल्ला हो या अपार्टमेंट, शांति और आपसी समझदारी से ही जीवन आसान बनता है।
आपके पड़ोस में भी कोई “शिकायत-किंग” या “क्वीन” है? या खुद आप कभी परेशान हो चुके हैं किसी की शिकायतें सुन-सुनकर? कमेंट में जरूर बताइएगा – ऐसी कहानियाँ सबको हँसाने और सिखाने का काम करती हैं!
मूल रेडिट पोस्ट: Old lady got the ticket instead