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जब दो सहकर्मी आपस में बोलना छोड़ दें और आपको बीच में डाल दें: एक मज़ेदार ऑफिस कहानी

एक विशेष दुकान में दो सहकर्मी एक-दूसरे से अजीब तरीके से बचते हुए, एक मजेदार कर्मचारी उन्हें देखते हुए।
इस फोटोरियलिस्टिक दृश्य में, दो सहकर्मी संवाद करने से इनकार कर रहे हैं, जबकि एक अनोखा कर्मचारी उनके तनाव के बीच फंसा हुआ है, एक जीवंत विशेष दुकान में जो संग्रहणीय वस्तुओं और नर्डी खजानों से भरी हुई है।

क्या आपके ऑफिस में कभी ऐसा हुआ है कि दो लोग आपस में बात करना ही छोड़ दें और सारा झंझट आपके सिर पर डाल दें? अगर हाँ, तो आज की यह कहानी आपको हँसा-हँसा कर लोटपोट कर देगी। एक युवा कर्मचारी की ये आपबीती किसी बॉलीवुड कॉमेडी फिल्म से कम नहीं, जिसमें ऑफिस के दो सहकर्मी ऐसे भिड़े कि पूरे माहौल का सत्यानाश कर दिया, और बेचारा नया लड़का उनके बीच 'डाकिये' की तरह फँस गया!

कॉमिक्स की दुकान, लेकिन ड्रामा किसी सीरियल से कम नहीं!

ये किस्सा है एक ख़ास दुकान का, जहाँ हर दिन कुछ नया तमाशा होता था—कॉमिक्स, ऐनिमे और कलेक्टिबल्स बेचने वाली एक गीक-नर्ड शॉप। मालिक को दुकानदारी का ज्यादा अनुभव नहीं था, और जब भी स्टाफ की कमी होती, वो अपने ही कस्टमर को नौकरी पर रख लेता। अब सोचिए, जब ग्राहक ही कर्मचारी बन जाएँ, तो दुकान का क्या हाल होगा?

एक दिन तो जैसे 'घर की सफाई' का त्योहार ही मन गया—मालिक ने पुराने सभी कर्मचारियों को चलता कर दिया और तीन नए चेहरों को जोड़ा, जिनमें से एक थे हमारे आज के हीरो। पहले कर्मचारी थे एक लोकल संगीतकार, जिन्हें दुकान में काम कम, नींद ज्यादा आती थी। दूसरे थे कॉलेज के थिएटर वाले, जिनमें 'द क्रो' की आत्मा बस गई थी—हमेशा गुस्से और रहस्यमय अंदाज में रहते, और खुद को हर हॉरर लेखक से बेहतर मानते।

जब प्यार की तकरार बनी ऑफिस का सिरदर्द

तीन दिन के अंदर ही, संगीतकार बाबू ने थिएटर वाले की गर्लफ्रेंड के साथ चक्कर चला लिया। नतीजा? थिएटर वाले ने गर्लफ्रेंड का सामान तोड़ डाला और बिचारी बिल्ली को भी बाहर छोड़ दिया। उसके बाद दोनों ने कसम खा ली कि अब एक-दूसरे से बात नहीं करेंगे। अब मालिक सोच रहा था कि ‘समय के साथ सब ठीक हो जाएगा’, लेकिन लगता है उसने कभी भारतीय सीरियल्स की दुश्मनी नहीं देखी थी!

हुआ ये कि दोनों ने तीसरे नए लड़के—यानी हमारे नायक—को बीच का दूत बना डाला। जैसे स्कूल के दिनों में होता था, “उससे कह दो ये”, “उससे पूछो वो”। बेचारा लड़का बार-बार समझाता, “भैया, खुद बोल लो”, लेकिन दोनों के जवाब ऐसे मिलते, जैसे घर में दो जिद्दी देवरानी-जेठानी लड़ रही हों—“तो अब तुम उसकी साइड हो?”, “तुमसे कोई उम्मीद नहीं!”

जब 'मीडिएटर' बना चालाक जोकर

शुरू में तो बेचारे ने ईमानदारी से संदेश पहुँचाए, लेकिन कुछ दिनों में मामला बेकाबू हो गया। एक कमेंट करने वाले ने बिल्कुल सही कहा—“तुमने सोचा था कि ये लोग बड़े हैं, खुद सुलझा लेंगे, लेकिन तुम गलत थे!” (कुछ वैसा ही जैसे हमारे यहाँ घर के बड़े सोचते हैं, बच्चे आपस में सुलझा लेंगे, पर उल्टा घर सिर पर उठा लेते हैं!)

अब हमारे नायक ने सोचा, "अगर मुझे मीडिएटर बनना ही है, तो थोड़ा मज़ा क्यों न लिया जाए?" बस, फिर क्या था—शरारती दिमाग चल पड़ा। कभी एक से कहता, “दूसरा पूछ रहा है, क्या आप पेन इस्तेमाल कर चुके?” जबकि सामने ही पेन चल रहा है। कभी कहता, “बोर्ड गेम की तरफ एक ग्राहक कुछ पूछ रहा है”—जबकि वहाँ कोई नहीं। कभी दोनों को 'ब्लूबेरी आइस' की काल्पनिक गंदगी ढूंढने भेज देता। और हद तो तब हो गई, जब वो दोनों को एक ही बोर्ड पर साइन चेंज करवाकर चक्कर में डाल देता।

जब मज़ाक ने लड़ाई को दोस्ती में बदल दिया

आखिरकार, थक-हारकर, उसने दोनों को अलग-अलग ये कह दिया कि दूसरा माफी माँगना चाहता है। दोनों अपने-अपने घमंड में, “अरे, अब वो झुक कर माफी माँगेगा”—इस उम्मीद में एक कमरे में बैठे। वहां दोनों ने सारी सच्चाई जानी और समझ गए कि बीच वाला लड़का ही असली गेम खेल रहा था।

अब सोचिए, दोनों की सालों पुरानी दुश्मनी एकदम से खत्म! कैसे? क्योंकि दोनों ने मिलकर तय कर लिया—अब इस लड़के को ही इग्नोर करेंगे! खुद नायक का कहना था, “ओह, नहीं! अब ये दोनों मुझे पूरा दिन अकेला छोड़ देंगे... हाय राम!” (यहाँ एक कमेंट करने वाले ने ठहाका लगाया—"कितनी शानदार सज़ा है ये!") और अंत में, तीनों को कुछ ही महीनों में नौकरी से निकाल दिया गया।

कॉमेंट्स का तड़का: पाठकों की राय और मिर्च मसाला

रेडिट पर इस कहानी को पढ़कर लोग खूब हँसे—किसी ने कहा, “ये तो 'द यंग वन्स' या 'आईटी क्राउड' जैसी कोई एपिसोड लगती है!” एक और पाठक ने पूछा, “बिल्ली का क्या हुआ?” जिस पर लेखक ने जवाब दिया, “मालूम नहीं, पर उम्मीद करता हूँ कि बिल्ली सही-सलामत रही हो।”

एक कमेंट में किसी ने बड़ी गहरी बात लिखी—“जीतने का एकमात्र तरीका है—खेल में ही न पड़ो!” (बिल्कुल वैसे, जैसे हमारे बुजुर्ग कहते हैं—'जहाँ दो लोग लड़ रहे हों, वहाँ से दूर ही रहो।') और अंत में, सबका यही निष्कर्ष था—“कभी-कभी सबक सीखने के लिए जिंदगी भी हमें जोकर बना देती है।”

निष्कर्ष: आपके ऑफिस का माहौल कैसा है?

अगर आपके ऑफिस में कभी ऐसा 'डाकिया' बनने का मौका मिले, तो एक पाठक की सलाह याद रखिए—“शुरू में ही साफ़ मना कर दो, वरना आप भी कहीं किसी ऐसी ही मज़ेदार मुसीबत में न फँस जाओ।” ज़िंदगी में कभी-कभी मज़ाक करना अच्छा है, पर दायरे में रहकर। अब आप बताइए, आपके ऑफिस में कभी ऐसी 'टीम वर्क' देखी है?

नीचे कमेंट में अपने अनुभव जरूर शेयर करें—शायद आपकी कहानी अगली बार यहाँ छप जाए!


मूल रेडिट पोस्ट: Two coworkers refused to talk to each other. They stuck me in the middle. I am goofy.