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जब दो 'केविन' मिले, स्पेगेटी के जादू में फँस गए!

दो केविन्स, एक पिता और एक दोस्त, एक मजेदार पल साझा करते हुए।
इस सिनेमाई छवि में, हम पिता केविन और दोस्त केविन को एक हल्के-फुल्के पल का आनंद लेते हुए देखते हैं, जो एक दिन में दो केविन्स का सामना करने की अप्रत्याशित खुशी को दर्शाता है। उनकी चंचल अभिव्यक्तियाँ मेरे डबल केविन अनुभव की अनोखी भावना को बखूबी दर्शाती हैं।

अरे भई, आपने कभी सोचा है कि अगर आप मैगी या स्पेगेटी को बीच से तोड़ दें तो वो अचानक दोगुनी हो जाएगी? सुनने में अजीब लग रहा है न? लेकिन यकीन मानिए, आज की कहानी में ऐसे ही दो 'केविन' हैं जो इसी जादू पर यकीन कर बैठे थे! और सबसे मज़ेदार बात–इनमें से एक हैं खुद लेखक के पिताजी!

स्पेगेटी का जादुई गुण: नूडल्स दोगुने!

तो बात कुछ यूँ है–शादी के शुरुआती दिनों में लेखक की माँ एक रात स्पेगेटी बना रही थीं। अब भारत में तो हम मैगी या सेवई को तोड़कर ही पकाते हैं, लेकिन विदेशों में स्पेगेटी को तोड़ना थोड़ा गलत माना जाता है। खैर, माँ ने स्पेगेटी को दो टुकड़ों में तोड़कर उबालना शुरू किया। तभी पिताजी (यहाँ कहलाएंगे 'डैड केविन') चिंता में पड़ गए–"अब तो नूडल्स दोगुने हो गए!" और ये कोई मज़ाक नहीं था, वह वाकई गंभीर थे!

लेखक की माँ तो अवाक रह गईं। सोचिए, पढ़े-लिखे इंसान भी कभी-कभी ऐसी बातें कर जाते हैं कि हँसी छूट जाए!

दोस्त 'केविन' की भोली मासूमियत

सालों बाद, लेखक ने ये किस्सा अपने दोस्तों को सुनाया, उम्मीद थी कि सब मिलकर डैड केविन की मासूमियत पर हँसेंगे। मगर कहानी में ट्विस्ट तब आया जब एक दोस्त (यहाँ कहलाएंगे 'फ्रेंड केविन') नाराज हो गए। वजह? उन्होंने तो अपनी पूरी जवानी इसी खुशफहमी में काट दी कि स्पेगेटी को तोड़ने से नूडल्स दोगुने हो जाते हैं!

उन्हें तो लगता था कि वो 'पास्ता कंपनियों' की चालाकी पर भारी पड़ रहे हैं! अब कैसे समझाया जाए कि अगर लकड़ी के एक बोर्ड को दो टुकड़ों में काट दें तो बोर्ड की मात्रा तो नहीं बढ़ती, बस टुकड़े छोटे हो जाते हैं!

दुनिया भर में ऐसे 'केविन' कहाँ-कहाँ!

ये कहानी सिर्फ स्पेगेटी तक ही सीमित नहीं है। एक पाठक ने मेक्सिको की टाको (Taco) संस्कृति का ज़िक्र किया–वहाँ कुछ दुकानदार टाको के साथ दो टॉर्टिया (रोटी जैसी) देते हैं ताकि टाको टूटे नहीं। लेकिन कुछ लोग उस टॉर्टिया को अलग करके समझते हैं कि उन्हें दो टाको मिल गए! दुकानदारों ने इसके लिए बाकायदा बोर्ड लगा दिए–"दूसरी टॉर्टिया से दूसरा टाको बनाना मना है!" वाह, ये तो वही बात हो गई–'एक अनार, सौ बीमार'!

एक और पाठक ने कहा, "अगर मेरी 6 साल की बेटी से स्पेगेटी के टुकड़े गिनवाओ तो वो सच में ज़्यादा गिन लेगी, लेकिन असल में खाने की मात्रा उतनी ही रहेगी।" यही बात तो हमारी दादी-नानी भी समझाती थीं–"गिनती बढ़ाने से पेट नहीं भरता बेटा!"

विज्ञान का तड़का: मास और तर्कशक्ति

एक और टिप्पणी आई, जिसमें बचपन में सीखी गई 'संरक्षण सिद्धांत' (conservation of mass) का ज़िक्र हुआ। बच्चों को ये समझने में वक्त लगता है कि कोई चीज़ अगर रूप बदल ले, तो उसकी मात्रा नहीं बदलती। जैसे पानी को चौड़ी गिलास से लंबी गिलास में डाल दो तो वो ज़्यादा नहीं हो जाता। पर हमारे दोनों 'केविन' शायद अब भी उसी उम्र में अटके हैं!

एक पाठक ने मज़ाकिया अंदाज़ में कहा–"अगर हर बार स्पेगेटी के टुकड़े को आधा करते जाओ तो अनंत पास्ता मिलेगा!" ये तो वही बात हो गई–"प्याज छीलो, छिलके ही छिलके निकलते जाएंगे!"

थोड़ी हँसी, थोड़ी सीख

मजेदार बात ये है कि फ्रेंड केविन आज तक इस राज़ के खुलने से नाराज़ हैं। लेखक ने बताया कि जब भी ये किस्सा छिड़ता है, उनके दोस्त का चेहरा खट्टा हो जाता है! एक पाठक ने भी कहा, "काश वो खुद पर हँस पाते, वरना ये तो बहुत मजेदार है!"

इसी तरह, एक पाठक ने बचपन का किस्सा सुनाया–"माँ ने बिस्किट तोड़कर दे दिया, ताकि बच्चा समझे उसके पास दो हैं!" यानी, ये ट्रिक बच्चों पर चल जाती है, पर बड़ों पर भी चले तो हँसी आना लाज़मी है।

निष्कर्ष: अपनी मासूमियत पर हँसना सीखें

जीवन में कभी-कभी हम सब 'केविन' बन जाते हैं। कभी राशन के दाने गिनते-गिनते, कभी आलू के पकौड़े छोटे-छोटे काटते वक्त, हमें लगता है कि खाना बढ़ जाएगा। लेकिन असलियत तो यही है–मात्रा उतनी ही रहती है, चाहे जितने टुकड़े कर लो!

तो अगली बार जब आप स्पेगेटी, मैगी या पराठे को दो हिस्सों में बाँटें, तो मुस्कुरा कर याद करिएगा–'केविन' तो हम सबके अंदर हैं! और हाँ, अगर आपका दोस्त कभी ऐसी मासूमियत दिखाए, तो उसे प्यार से समझाइए, हँसिए–क्योंकि यही तो असली जिंदगी है।

आपका क्या अनुभव रहा है? क्या आपने भी कभी ऐसी मासूम गलतफहमी में कुछ किया है? कमेंट में जरूर बताइए!


मूल रेडिट पोस्ट: Kevin times 2