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जब दुकान बंद हो, लेकिन ग्राहक बाज़ ना आए: रीफिटिंग के दौरान ग्राहकों की जिद की हास्य-पूर्ण दास्तान

व्यस्त सुपरमार्केट का 3D कार्टून चित्रण, जिसमें ठेकेदार अंदर और ग्राहक बाहर इंतज़ार कर रहे हैं।
इस जीवंत 3D कार्टून चित्रण में, हम अपने सुपरमार्केट के नवीनीकरण के हलचल भरे दृश्य को प्रस्तुत करते हैं। ठेकेदार अंदर व्यस्त हैं और बाहर जिज्ञासु ग्राहक इंतज़ार कर रहे हैं, पुनः खोलने की उत्सुकता और हलचल स्पष्ट है!

हमारे देश में दुकानों के रीफिटिंग या मरम्मत के दौरान "माफ़ कीजिए, दुकान बंद है" का बोर्ड तो आम है, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि कुछ ग्राहक उस बोर्ड को देखकर भी मानते नहीं? दुकान बंद हो, शटर आधा गिरा हो, बोर्ड दीवार जितना बड़ा हो, फिर भी लोग अंदर घुसने की कोशिश करते हैं! आज हम आपको एक ऐसे ही दुकानदार की कहानी सुनाने जा रहे हैं, जिसे रीफिटिंग के दौरान अपने ग्राहकों से जूझना पड़ा, और किस तरह ये अनुभव एक हास्य-व्यंग भरे किस्से में बदल गया।

दुकान बंद है, लेकिन ग्राहक नहीं मानते!

एक छोटे से सुपरमार्केट में, जो कि यूके की जानी-मानी चेन का हिस्सा है, दो हफ्तों से रीफिटिंग का काम चल रहा था। दुकान में अंदर-बाहर ठेकेदारों की आवाजाही थी, दीवारें नई पुताई से चमक रही थीं, और स्टाफ सामान को फिर से सजा रहा था। बाहर एक विशाल बोर्ड टंगा था—छह फुट लंबा, तीन फुट चौड़ा—जिस पर साफ़-साफ़ लिखा था, “दुकान गुरुवार तक बंद है। कृपया प्रवेश न करें।” शटर भी आधा गिरा हुआ था।

लेकिन, ग्राहक हैं कि मानते ही नहीं! कोई दरवाज़ा खटखटा रहा है, कोई शटर के नीचे से झांक रहा है, तो कोई जबरन अंदर घुसने की कोशिश कर रहा है। एक बार तो एक ठेकेदार अपनी वैन से कुछ सामान लेने गया, तभी दो किशोर लड़कियाँ दुकान में घुस आईं और इधर-उधर टहलने लगीं। स्टाफ को फिर से कहना पड़ा—“बहनजी, दुकान अभी बंद है!” एक सज्जन तो ऐसे निकले, जैसे 'लिम्बो डांस' करते हुए शटर के नीचे से घुस गए और फिर मासूमियत से बोले, “खुली नहीं है क्या?”

इन घटनाओं को देखकर दुकानदार सोचने लगे—“लोग सुबह उठकर कैसे सही-सलामत घर से बाहर निकल आते हैं, ये भी किसी अजूबे से कम नहीं!”

बोर्ड तो लगाए, ग्राहक फिर भी बहाने बनाए!

ये कहानी सिर्फ एक दुकान की नहीं है; खुदरा दुकानों में काम करने वाले हर कर्मचारी को ऐसे अनुभव मिलते हैं। एक और दुकानदार ने टिप्पणी की, “हमने तो अखबार न होने पर 100 बोर्ड छाप दिए, हर जगह चिपका दिए कि अखबार खत्म हो गया है। फिर भी लोग बोर्ड हटाकर पूछते, 'भैया, अखबार है?' एक ग्राहक तो इतने परेशान हो गए कि बोले, 'अब चाय के साथ क्या पढ़ूँगा?'”

कई बार तो ग्राहक इतने 'जिद्दी' होते हैं कि टेप, बैरिकेड, यहां तक कि खतरे के बोर्ड भी उनके लिए कोई मायने नहीं रखते। एक दुकान में कॉफी मशीन खराब थी, उस पर बड़ा सा कचरे का बैग चढ़ा था, तीन बोर्ड लगे थे “आउट ऑफ ऑर्डर”, फिर भी एक महिला ने ताले को तोड़ा, बैग को काटा और कॉफी निकाल ली। बाद में बोली, “किसी ने बताया ही नहीं कि मशीन खराब है!”

दिमागी दिवालिएपन का आलम

एक टिप्पणीकार ने लिखा, “आधा देश औसत समझदारी का है, बाकी उससे भी कम।” ये सुनकर हर दुकानदार मुस्कुरा देगा! कभी-कभी तो लगता है जैसे ग्राहकों को ये सब संकेत दिखते ही नहीं। बिजली चली जाए, दुकान में अंधेरा हो, फायर अलार्म बज रहा हो, ग्राहक फिर भी अंदर घुसने की कोशिश करते हैं—“भैया, सामान तो दे दो, पैसे कैश में दे देंगे!”

ऐसी ही एक घटना में, दुकान में बाढ़ आ गई, तीन फुट पानी भर गया, फिर भी कुछ लोग दरवाज़ा तोड़कर अंदर आ गए और शिकायत करने लगे कि “फ्रिज में दूध ठंडा क्यों नहीं है?” कोई-कोई तो इतना आगे निकल जाता है कि पुलिस टेप के नीचे से गाड़ी घुसा देता है, जबकि अंदर क्राइम सीन चल रहा हो!

भारतीय संदर्भ में—हमारे देश की दुकानों में भी यही हाल!

अगर आप सोच रहे हैं कि ये सिर्फ विदेशी दुकानों का हाल है, तो ज़रा अपने मोहल्ले की किराना या मेडिकल शॉप का दृश्य याद कर लीजिए। त्योहारों, शादी-ब्याह या लॉकडाउन में दुकान बंद हो, तो लोग “भैया, बस एक चीज़ चाहिए थी”, “आंटी, जल्दी दे दो, बहुत ज़रूरी है” कहते हुए अंदर घुस ही जाते हैं। कभी-कभी तो दुकानदार को खुद बाहर आकर समझाना पड़ता है कि “अरे भैया, दुकान में रंग-रोगन चल रहा है, फर्श पर गीला पेंट है, अंदर आएंगे तो फिसल जाओगे!” लेकिन ग्राहक हैं कि मानेंगे नहीं।

किसी ने सही ही कहा है, “जो लोग खतरे की परवाह नहीं करते, वही बार-बार मुसीबत में फँसते हैं, और दुकानदारों के लिए ये रोज़ की कहानी है।”

निष्कर्ष: क्या आप भी ऐसे ग्राहक हैं?

इस पूरे किस्से से एक बात तो साफ़ है—दुकानदारों के लिए “दुकान बंद है” कहना जितना आसान है, ग्राहकों को समझाना उतना ही मुश्किल! अगली बार जब आप किसी दुकान के सामने “बंद है” का बोर्ड देखें, तो कृपया उसे गंभीरता से लें। दुकानदार भी इंसान हैं, उन्हें भी थोड़ा चैन से रीफिटिंग या सफाई करने दीजिए।

आपका इस विषय पर क्या अनुभव रहा है? क्या आपने कभी खुद को ऐसे हालात में पाया है? या आपके आसपास किसी ने ऐसी जिद की हो? अपने किस्से कमेंट में ज़रूर साझा करें—शायद अगली बार हम आपके अनुभव को भी शामिल करें!

ध्यान रहे, बोर्ड देखकर मान जाना भी एक समझदारी है, और दुकानदार की मेहनत की कद्र करना भी!


मूल रेडिट पोस्ट: Refit hell...the customers just won't stop trying to get in!