विषय पर बढ़ें

जब डिपार्टमेंट चेयर को मिली असली 'करारी' जवाबी कार्रवाई – एक अंतरराष्ट्रीय शोधार्थी की कहानी

पीएचडी छात्र विभागाध्यक्ष के साथ शिक्षण पद पर बातचीत के बारे में सोचते हुए।
यह फोटो-यथार्थवादी चित्र एक पीएचडी छात्र के चिंतन के क्षण को दर्शाता है, जो एक चुनौतीपूर्ण बातचीत के बाद महत्वाकांक्षा और पेशेवरिता के बीच कटा हुआ है।

कभी-कभी जिंदगी में हमारे साथ ऐसा कुछ हो जाता है, जिसे सुनकर लगता है – “वाह! क्या पलटा मारा!” खासकर जब किसी ने आपके साथ नाइंसाफी की हो, और आप उसे अपने ही अंदाज में जवाब दे पाएं। आज की कहानी भी कुछ ऐसी ही है – एक अंतरराष्ट्रीय शोधार्थी की, जिसे उसके विभागाध्यक्ष ने वक्त पर धोखा दिया, लेकिन किस्मत और मेहनत ने मिलकर उसे ऐसा मौका दिया कि वह खुद मिसाल बन गया।

कहानी की शुरुआत – सपनों की उड़ान और अचानक आई आंधी

मान लीजिए, आप एक बड़े विश्वविद्यालय में PhD कर रहे हैं। पढ़ाई के साथ-साथ पढ़ा भी रहे हैं, ताकि घर-परिवार का खर्च चल पाए। सबकुछ ठीक चल रहा था, तभी विभागाध्यक्ष (डिपार्टमेंट चेयर) साहब आते हैं और बड़े विश्वास से कहते हैं, “इस बार Visiting Assistant Professor की पोस्ट खाली है, तुम्हें ही चाहिए। अगले सेमेस्टर में कुछ खास कोर्स पढ़ाने हैं, जो सिर्फ तुम संभाल सकते हो।”

अब भला किसे बुरा लगेगा? उम्मीद जागी, OPT (Optional Practical Training) की चिंता दूर, और परिवार को लेकर भी राहत। आदमी ने अगले साल की लीज भी रिन्यू कर दी। लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था! मई में वही चेयरमैन साहब कहते हैं, “पोस्ट कैंसिल हो गई। अब जाओ, कुछ और देख लो।”

सोचिए, भारतीय या दक्षिण एशियाई घरों में जब कोई नौकरी अचानक हाथ से निकल जाती है, तो कैसी हड़कंप मचती है – सबको फोन, माथे पर चिंता, “अब क्या होगा?” वैसे ही, बेचारे शोधार्थी की भी हालत हो गई। 60 से ज्यादा यूनिवर्सिटीज़ में एप्लाई किया, पर सब जगह से वही जवाब, “हमने तो पोस्ट भर ली है।”

किस्मत का खेल – 'कांटा' भी निकला, 'चांदी' भी मिली

लेकिन कहते हैं ना, “भगवान के घर देर है, अंधेर नहीं।” आख़िरकार, दो जगहों से ऑफर मिला – एक मेकैनिकल इंजीनियरिंग में (अपने ही राज्य में), और दूसरा एयरोस्पेस इंजीनियरिंग में (जो उनकी असली फील्ड थी, पर काफी दूर)। परिवार, छोटे बच्चे और खर्चों को देखते हुए पास की नौकरी चुन ली। हां, लीज तोड़ने के लिए भारी भरकम जुर्माना भी देना पड़ा, लेकिन आगे की राह तो खुल गई।

अब ज़रा सोचिए, हिंदी पट्टी में अक्सर सुनने को मिलता है – “जिसने मेरा बुरा किया, उसका भगवान भला करे, लेकिन मेरी तरक्की देख वो जरूर जल जाए!” कुछ-कुछ वैसा ही हुआ।

'करारा जवाब' – जब पुराने बॉस से हुई टक्कर

कई महीने बाद, एक कॉन्फ्रेंस में पुराने विभागाध्यक्ष से मुलाकात हो गई। बड़े ठाठ से पूछते हैं, “कहो, कैसे हो?” अब सज्जन मुस्कुराए और बोले, “बहुत अच्छा! Visiting पोस्ट तो छोड़िए, मुझे तो Tenure Track Assistant Professor की स्थायी पोस्ट मिल गई है। और इस साल हमारे यूनिवर्सिटी में एयरोस्पेस इंजीनियरिंग का नया प्रोग्राम भी शुरू हो रहा है।”

चेयरमैन साहब बोले, “तो अब तो तुम हमारे कॉम्पटीटर हो गए?”
जवाब में, जैसे कोई बॉलीवुड फिल्म का डायलॉग हो – “सिर्फ प्रतियोगी नहीं, अब तो आपकी यूनिवर्सिटी के स्टूडेंट्स भी अपनी ओर बुला लूंगा। आपकी यूनिवर्सिटी प्राइवेट और महंगी है, हमारी सरकारी – सबको मौका दूंगा, और आपकी मुश्किलें बढ़ा दूंगा!”
आखिर में, तंज कसते हुए बोले, “आपका धन्यवाद! आपने मुझे निकाल दिया, वरना मैं यहां तक नहीं पहुंचता।”

पाठकों की प्रतिक्रिया – सोशल मीडिया पर मचा धमाल

रेडिट पर इस कहानी को पढ़कर लोग जमकर वाहवाही कर रहे हैं। एक कमेंट में किसी ने लिखा, “शानदार खेल! चेयरमैन के चेहरे का भाव देखने लायक रहा होगा।”
दूसरे कमेंट में किसी ने कहा, “अकादमिक दुनिया में इस तरह की राजनीति आम है, लेकिन जो आपने किया, वो काबिले-तारीफ है।”
एक यूज़र ने तो मज़े लेते हुए पूछा, “क्या आपने माइक गिराया? (Drop the mic)” – जैसे बॉलीवुड में कोई हीरो आखिरी पंच मारकर मंच छोड़ता है!
खुद पोस्ट लिखने वाले ने जवाब दिया, “काश कर पाता! लेकिन मन ही मन वही फीलिंग आई।”

एक और कमेंट बड़ा दिल छूने वाला था – “अंतरराष्ट्रीय छात्रों के साथ अकसर ऐसा बुरा व्यवहार होता है। आपकी सफलता देखकर दिल खुश हो गया।”
लेखक ने जवाब दिया, “हर किसी को मौका मिलना चाहिए। अंतरराष्ट्रीय छात्रों के लिए हालात बहुत मुश्किल हैं, लेकिन मेरा मानना है – मेहनत और सच्चाई से रास्ता निकल ही आता है।”

कुछ लोग बोले, “सबसे बढ़िया बदला – एक अच्छी जिंदगी जीना!”
और ये बात तो हमारे समाज में भी खूब कही जाती है – “कामयाबी ही सबसे बड़ा जवाब है!”

अंतिम विचार – जब किस्मत और मेहनत साथ मिल जाए

इस कहानी में सिर्फ बदला नहीं, बल्कि प्रेरणा छुपी है। जब कोई आपके साथ अन्याय करे, तो हार मानने के बजाय, खुद को साबित करके दिखाइए। फिर देखिए, वही लोग जो आपकी राह में रोड़े अटकाते थे, एक दिन आपके कद के सामने बौने नजर आएंगे।

तो दोस्तों, क्या आपके साथ भी कभी ऐसा कुछ हुआ है कि किसी ने आपको नीचा दिखाने की कोशिश की हो, और आप बाद में उससे कहीं आगे निकल गए हों? अपने अनुभव कमेंट में जरूर साझा करें।
क्योंकि आखिर में, “कोई आपका भाग्य नहीं बनाता, अपनी किस्मत खुद बनाइए!”


मूल रेडिट पोस्ट: Was I in the wrong for rubbing it in to the department chair?