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जब 'टिकट' बनाना ही बन गया मुसीबत: फार्मेसी की मैनेजर को मिला करारा सबक!

एक एनिमे-शैली की चित्रण जिसमें एक फार्मेसी ड्राइव-थ्रू है, जिसमें एक निराश कर्मचारी और धीमी टिकट प्रणाली है।
इस जीवंत एनिमे दृश्य में, हमारा फार्मेसी कर्मचारी एक परिचित चुनौती का सामना कर रहा है, जब ड्राइव-थ्रू दराज धीमा हो जाता है। आइए हम इस पल तक पहुँचने वाले अप्रत्याशित मोड़ों और इस सफर में सीखे गए पाठों का अन्वेषण करें!

कहते हैं, "लोहे को गरम होने पर ही चोट करनी चाहिए", लेकिन ऑफिसों में अक्सर होता ये है कि जब तक लोहे की चूड़ बनी न हो, तब तक अफसरों को सुध नहीं आती! आज की कहानी भी एक ऐसी फार्मेसी से है, जहां छोटी-सी लापरवाही ने मैनेजर साहिबा के होश उड़ा दिए और कर्मचारियों ने, नियमों का पालन करते हुए, उन्हें उनकी ही दवा चखाई।

फार्मेसी में टिकटों का चक्कर और मैनेजर की कंजूसी

अक्टूबर का महीना था, फार्मेसी के ड्राइव-थ्रू का दराज (drawer) धीरे-धीरे काम करने लगा। पहले भी ऐसा हो चुका था, हल्का-फुल्का सफाई-तेल लगाओ, मशीन फिर से चालू। लेकिन इस बार नियमों का पालन जरूरी था—हर समस्या के लिए "टिकट" डालो! टिकट का मतलब, अपने ऑफिस के आईटी या मेंटेनेंस सिस्टम में ऑनलाइन शिकायत दर्ज करना। पर अफसोस, वहां की व्यवस्था ऐसी थी कि 80% मामलों में, टिकट डालो तो डालो, भगवान भरोसे छोड़ दो!

पहले तो बढ़िया असिस्टेंट मैनेजर थे, बात करके जल्दी समाधान निकल आता था। लेकिन नए मैनेजर साहिबा आईं, जो हर चीज़ में पाई-पाई का हिसाब रखती थीं, प्रमोशन रोकती थीं, और स्टाफ को तंग करती थीं। ऐसे में जब कर्मचारी ने ड्राइव-थ्रू के बारे में बताया, तो जवाब मिला—"टिकट डालो, कुछ नहीं हुआ तो दोबारा डाल दो। मुझे मेल या मुँहजुबानी बताने की जरूरत नहीं।"

"जैसा कहा, वैसा किया", और आई मुसीबत

कर्मचारी ने भी "आ बैल मुझे मार" वाली कहावत सच कर दी। हर 48 घंटे में टिकट "बंप" करता रहा, जैसे हमारे यहां लोग शिकायत न सुने जाने पर ट्विटर पर टैग करते हैं। उधर मैनेजर को कोई जानकारी नहीं दी, जैसा आदेश था, वैसा ही किया।

बारहवें दिन अचानक दराज ने काम करना बंद कर दिया। अब तो ग्राहक भी लाइन में, फार्मेसी का काम भी ठप! आखिरकार "इमरजेंसी टिकट" डालना पड़ा, जिसका मतलब है—2-4 घंटे में सर्विस वाला जरूर आएगा, पर साथ में आएगी भारी-भरकम फीस, ओवरटाइम चार्ज और हर चीज़ की पेनल्टी। दुकान की दीवारें तक सुन रही थीं, "अब तो जेब ढीली करनी ही पड़ेगी!"

जब मैनेजर को मिली 'तेज डोज़' और कर्मचारियों ने बजाई ताली

इमरजेंसी टिकट पड़ते ही मैनेजर साहिबा ऐसे दौड़ीं जैसे उनके घर में आग लग गई हो। "मुझे क्यों नहीं बताया?"—कर्मचारी ने ठंडी मुस्कान के साथ मेल चेन दिखा दी, "आपने खुद मना किया था।" अब क्या, बिल आया 25 लाख रुपये (25k डॉलर) से ऊपर, क्योंकि पुराना सिस्टम था—कंपनी को नया बनवाना पड़ा, कई बार इंजीनियर दौड़े, ग्राहक नाराज़, स्टोर बंद, बोनस भी कटने का डर!

एक कमेंट में किसी ने चुटकी ली—"अगर आप समय पर दवा ले लें, तो ज़्यादा ताकत के इंजेक्शन की ज़रूरत नहीं पड़ेगी!" दूसरे ने कहा, "मैनेजर को अपने ही नियमों की गोली घोंटनी पड़ी।"

सबक जो हर भारतीय दफ्तर को सीखना चाहिए

कई पाठकों ने लिखा—"रखरखाव समय पर नहीं करोगे, तो मशीन खुद ही अपनी मरम्मत करवाएगी—वो भी आपके सबसे व्यस्त समय में!" यह बात भारत के हर ऑफिस, बैंक, सरकारी विभाग या दुकान में रोज़ देखने को मिलती है। एक यूज़र ने तो कह दिया, "कर्मचारी तो कब से बता रहे थे, लेकिन अफसर साहिबा को तो सलाह फ्री में लेना मंजूर ही नहीं था।"

एक और ने याद दिलाया, "पेपर ट्रेल (सबूत की चेन) हमेशा बचाकर रखो, वरना दोष तुम्हारे ऊपर भी आ सकता है।" बिल्कुल सही! अपने यहां भी तो कहते हैं—"कागज दिखाओ, वरना काम नहीं होगा।"

निष्कर्ष: कर्मचारियों की सुनोगे, तो बचेगा पैसा और सिरदर्द

आखिरकार, इस कहानी में सबसे बड़ा सबक यही है—समस्या छोटी हो या बड़ी, अपने कर्मचारियों या फ्रंटलाइन वर्करों की बात पर ध्यान दो। टिकट की टिकट बज गई, मैनेजर का अहंकार चूर हुआ, और फार्मेसी को नुक़सान भी झेलना पड़ा। जैसा कमेंट्स में भी कहा गया, "अगर समय रहते मरम्मत कर लो, तो इमरजेंसी में डॉक्टर बुलाने की नौबत नहीं आती।"

आपके ऑफिस में भी अगर कोई समस्या दिखे, तो मैनेजर जी को यही सलाह—"कर्मचारी की बात सुनो, वरना टिकट सिस्टम तुम्हें भी चिट्ठी दिखा देगा!"

आपका क्या अनुभव है ऐसे मैनेजरों या ऑफिस सिस्टम्स के साथ? नीचे कमेंट में जरूर बताएं, और अगर आपको ये कहानी पसंद आई हो, तो शेयर करना न भूलें!


मूल रेडिट पोस्ट: You just want me to submit tickets, no exceptions? Okay.