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जब टाईमशेयर के मालिक ने होटल से $400 की दावत मुफ्त में मांग ली!

टाइमशेयर रिसॉर्ट का सिनेमाई दृश्य, जिसमें मालिक छुट्टियों के लाभ और क्रेडिट रिडेम्प्शन का आनंद ले रहे हैं।
यह सिनेमाई छवि टाइमशेयर अनुभव की आत्मा को दर्शाती है, यह दिखाते हुए कि मालिक कैसे अनयूज्ड समय को मूल्यवान क्रेडिट में बदल सकते हैं। जानें कि हमारा प्रोग्राम कैसे आपको आपके निवेश को अधिकतम करने और अविस्मरणीय छुट्टियों का आनंद लेने में सक्षम बनाता है!

होटल की दुनिया में रोज़ नए-नए किस्से जन्म लेते हैं। कभी कोई मेहमान अपनी चाय में शक्कर कम बता कर बहस करता है, तो कभी कोई बिल में एक्स्ट्रा पापड़ जोड़ने पर नाराज़ हो जाता है। लेकिन आज जो किस्सा सुनाने जा रहा हूँ, उसमें टाईमशेयर के एक मालिक ने ऐसी जिद पकड़ ली कि होटल स्टाफ को भी अपनी किस्मत पर हँसी आ गई!

टाईमशेयर: विदेशों का 'समूहिक प्लॉट'!

सबसे पहले, थोड़ा सा टाईमशेयर के बारे में। भारत में जैसे लोग मिलकर कोई प्लॉट या मकान लेते हैं और उसका समय बांट लेते हैं, वैसे ही विदेशों में टाईमशेयर का चलन है – यहाँ लोग साल भर में कुछ दिन किसी होटल या रिज़ॉर्ट में रुकने का हक खरीद लेते हैं। अगर वो हक (ownership) किसी साल इस्तेमाल नहीं हुआ, तो होटल एक स्कीम देता है जिसमें आप उसे कुछ क्रेडिट या पैसा में बदल सकते हैं। लेकिन भाई साहब, हर स्कीम की अपनी शर्तें होती हैं – और यही शर्तें इस कहानी का तड़का हैं!

शर्तों की किताब और मालिक का गुस्सा

कहानी का नायक, यानी टाईमशेयर वाला मालिक, होटल की स्कीम के तहत अपने unused ownership को क्रेडिट में बदल चुका था। होटल वालों ने बाकायदा उसे टर्म शीट पढ़ाई और साइन करवाई, जिसमें साफ लिखा था कि क्रेडिट कहाँ-कहाँ काम आएगा। पर जनाब का मन जैसे बचपन में आस-पड़ोस की दुकानों में उधारी चलती थी, वैसे ही किसी भी 'western' होटल में क्रेडिट चलाने का था।

हुआ यूँ कि वे पास के एक और 'western' होटल के रेस्तराँ में गए, वेटर से पूछा – "भैया, क्या यहाँ room charge कर सकते हैं?" वेटर ने बिना पूरी जानकारी दिए हाँ कर दी। खाने के बाद जब बिल आया, तो मालिक बोले – "बिल मेरे टाईमशेयर वाले western होटल के रूम पर डाल दो।" रेस्तराँ वाले बोले – "साहब, ये हमारा होटल उस स्कीम में नहीं है।" बस, फिर क्या था! जैसे गाँव के मेले में कोई झूला वाले से पैसे वापसी की जिद पकड़ ले, वैसे ही साहब ने होटल स्टाफ पर गुस्सा निकाल दिया।

ग्राहक हमेशा सही नहीं होता!

इस कहानी में सबसे दिलचस्प बात ये रही कि जब होटल के मैनेजर ने अगले दिन मालिक से बात की और शांति से समझाया कि आपके साइन किए गए टर्म्स में उस रेस्तराँ का नाम नहीं है, तो मालिक साहब बोले – "पिछले साल तो मैंने यही किया था!" मैनेजर ने भी गजब जवाब दिया – "साहब, कभी भी ऐसा नहीं हुआ, और आपने खुद टर्म्स पढ़कर साइन की थी।"

अंत में मालिक इतना गुस्से में आ गए कि बोले – "मैं अब यहाँ कभी नहीं आऊँगा!" और फोन पटक दिया। मैनेजर ने सोचा – "जय हो, एक सिरदर्द कम हुआ!" (वैसे, होटल वालों को पता है कि ऐसे गुस्सैल ग्राहक दोबारा लौट ही आते हैं!)

Reddit कम्युनिटी की प्रतिक्रियाएँ: हँसी का पिटारा

Reddit पर इस किस्से को पढ़कर लोगों ने खूब मज़ा लिया। एक यूज़र ने लिखा – "उम्मीद है, उन्होंने ज़िंदगी की सबसे शानदार दावत खाई होगी!" तो दूसरे ने चुटकी ली – "वो पहले कभी इतना अच्छा नहीं खाया था!" किसी ने कहा – "आखिर में सब ठीक ही हुआ।"

एक और मज़ेदार कमेंट आया – "ऐसे ग्राहक जब धमकी देते हैं कि वो कभी वापस नहीं आएँगे, तो होटल वालों की तो बल्ले-बल्ले हो जाती है।" कोई और बोला – "फिक्र मत करो, ये फिर लौट आएँगे, हमेशा आते हैं।"

सच पूछिए तो, भारत में भी ऐसे ग्राहक खूब मिलते हैं – जो 'मुफ्त' के चक्कर में दुकान से लेकर होटल तक, हर जगह अपनी जुगाड़ भिड़ाते रहते हैं। और जब बात नहीं बनती, तो 'कभी वापस न आने' की धमकी बड़ी शान से देते हैं। दुकानदार भी मन ही मन सोचता है – "साहब, आप न आओ, इसी में हम सबकी भलाई है!"

सीख और मुस्कान – टर्म्स पढ़ना जरूरी है!

ये किस्सा हमें ये सिखाता है कि कोई भी स्कीम, चाहे होटल की हो या बैंक की, उसकी शर्तें ध्यान से पढ़ना बहुत जरूरी है। और ये भी कि 'ग्राहक भगवान होता है' – ये कहावत हर बार सही नहीं बैठती। कभी-कभी भगवान भी गलती कर बैठता है!

तो अगली बार जब आप होटल या किसी स्कीम में जाएँ, तो टर्म्स-एंड-कंडीशन्स जरूर पढ़ लें। और हाँ, अगर कहीं 'मुफ्त' का लालच दिखे, तो दो बार सोच लें – वरना न नुक्सान होटल का होगा, न आपका – हँसी तो सबकी लगेगी ही!

अंत में, आपके साथ भी कोई ऐसा मजेदार किस्सा हुआ हो, तो नीचे कमेंट में ज़रूर बताएँ – कौन जाने, अगला किस्सा आपका ही छप जाए!


मूल रेडिट पोस्ट: Timeshare world