जब ग्राहक पांच साल पुरानी 'फ्री फल' स्कीम के लिए भिड़ गई: एक हास्यास्पद सुपरमार्केट किस्सा
भैया, दुकानों में हमारे देश में भी क्या-क्या नज़ारे देखने को मिलते हैं! कोई सब्ज़ी के भाव पर बहस करता है, तो कोई छूट की उम्मीद में बिलिंग काउंटर पर घंटों अड़ जाता है। लेकिन आज की कहानी, पश्चिमी देश से आई है, जिसमें एक महिला ने पांच साल पहले खत्म हो चुकी "बच्चों के लिए मुफ्त फल" स्कीम को लेकर पूरे सुपरमार्केट में बवाल मचा दिया। यकीन मानिए, यह किस्सा पढ़कर आपको आपके मोहल्ले की 'मौसी जी' जरूर याद आ जाएंगी, जो हर त्यौहार के बाद भी मिठाई की मुफ्त प्लेट मांगने से नहीं चूकतीं!
पुरानी स्कीम, नई ज़िद – “मुझे तो फ्री केला चाहिए!”
कहानी एक सुपरमार्केट के सुपरवाइज़र की है। पांच साल पहले उस दुकान में बच्चों के लिए 'फ्री फ्रूट' यानी मुफ्त फल की स्कीम चलती थी। मम्मी-पापा शॉपिंग करें और बच्चा बोर हो रहा हो, तो उसे एक केला, सेब या संतरा मुफ्त में मिल जाता था। सोचिए, कितना बढ़िया आइडिया था – बच्चा खुश, दुकान में शांति, और माता-पिता शांति से खरीदारी करें! लेकिन जैसा कि हमारे यहां भी होता है, लोग स्कीम का गलत फायदा उठाने लगे – बड़े भी बच्चे बनकर फल लेने लगे, तो दुकान ने यह स्कीम बंद कर दी।
लेकिन एक दिन, एक महिला आईं, सीधा फल वाले सेक्शन में पहुंचीं, सबसे तगड़ा केला उठाया और बेटे के हाथ में थमा दिया। जब काउंटर पर कैशियर ने पैसे मांगे, तो वही पुरानी बहस – "ये तो बच्चों के लिए फ्री है!" सुपरवाइज़र ने समझाया, "मैडम, वो स्कीम पांच साल पहले बंद हो गई थी।" लेकिन महिला कहां मानने वाली थी! उल्टा कहने लगीं, "आप लोगों ने मुझे बताया क्यों नहीं?" अरे भई, दुकान में न कोई पोस्टर, न स्टैंड, सब गायब – फिर भी जिद्द की सीमा पार!
“इतने में तो पूरा केला खरीदूंगी!” – अहंकार का जवाब अहंकार से
अब यहां कहानी में ट्विस्ट आया – जब उन्हें साफ मना कर दिया गया, तो मैडम गुस्से में वापस गईं, सबसे बड़ा केला खोजकर लाई, तौलवाया और पैसे देकर बोलीं, "लो, अब तो पूरा पैसा ले लो!" सुपरवाइज़र मन ही मन सोच रहा था – "हम तो एक केले की गिनती में भी कोई झंझट नहीं चाहते थे, पर आप तो मानो 'केले की लड़ाई' लड़ने आई हैं!"
यहां एक मजेदार बात याद आती है – कमेंट सेक्शन में किसी ने लिखा, "अरे, एक केला ही तो है। कितना महंगा होगा? दस डॉलर?" इस पर दूसरे ने चुटकी ली, "आप बहुत महंगे केले खरीदते हैं! आपके केले वाला कौन है?" ऐसे ही हमारे यहां भी आपसी बातचीत में बोल दिया जाता – "अरे मौसी, एक केले के लिए इतना हंगामा! केले के भाव में क्या चीन की चाय मिलती है?"
“आप कब से काम कर रहे हो?” – सवालों की बमबारी
इतना ही नहीं, महिला ने सुपरवाइज़र और दूसरे कर्मचारियों से उनकी नौकरी की जॉइनिंग डेट पूछनी शुरू कर दी। जैसे कोई पूछ रहा हो, "बेटा, ससुराल कब गए थे?" जब कोई जवाब न मिला, तो सीधा स्टोर मैनेजर के पास पहुंच गईं और वही सवाल। अब सबका चेहरा देखने लायक था – "केले के दाम से आपका जॉइनिंग डेट क्या लेना-देना मैडम?" कई कमेंट्स में लोगों ने तंज कसा, "इसका तो नया पैमाना आ गया – 'केले के भाव से इसका क्या लेना-देना?'"
सोशल मीडिया पर धमकी – “अब सबको बदनाम करूंगी!”
आखिर में जब किसी ने उनकी बात नहीं मानी, तो धमकी दी – "मैं तुम सबको सोशल मीडिया पर पोस्ट करूंगी! कितने निकम्मे लोग हो, काम ठीक से करते नहीं!" सुपरवाइज़र ने मन ही मन सोचा होगा – "मैडम, न कोई बोर्ड, न स्कीम, न स्टैंड, आप 2021 में खत्म हुई स्कीम के लिए यमराज बन गई हैं! फेसबुक पर पोस्ट कर लो, शायद आपको वहां केले का भाव कम मिल जाए!"
यहां एक और कमेंट ने हंसी ला दी – "अब तो हर बात का पैमाना बन गया है – केले का दाम क्या है?" जैसे हमारे यहां कहते हैं, "इसका तो आलू-प्याज के भाव से क्या लेना-देना?"
पाठकों की राय और पुरानी यादें
कई पाठकों ने अपनी-अपनी दुकान की कहानियां भी साझा कीं। किसी ने लिखा, "हमारे यहां भी बच्चों के लिए फ्री फल की टोकरी होती थी, लेकिन बाद में लोगों ने खूब गलत इस्तेमाल किया, तो बंद करनी पड़ी।" एक अन्य ने बहुत प्यारी बात कही, "हमारे घर के पास वाली दुकान में जब यह स्कीम थी, तो मेरी जुड़वा बच्चियों को फ्री फल दिलाना मेरे लिए राहत थी – दुकान में वे चुपचाप बैठती थीं।"
किसी ने तो अपने बचपन की याद बांटी – "मेरी छोटी बहन ने एक बार गाड़ी से ही नाशपाती उठा ली और काट भी दी, पापा इतने शर्मिंदा हो गए कि तुरंत जाकर पैसे दे आए!"
खास बात, कई लोगों ने इस बात का भी जिक्र किया कि कोविड के बाद ऐसी स्कीमें धीरे-धीरे बंद हो गईं। कुछ देशों में आज भी यह परंपरा जारी है, लेकिन जगह-जगह अलग-अलग नियम हैं।
निष्कर्ष – ग्राहक हमेशा सही नहीं होता!
तो साथियों, यह किस्सा हमें एक चीज़ याद दिलाता है – "ग्राहक भगवान है" वाली कहावत हमेशा सही नहीं बैठती। कभी-कभी ग्राहक भी अतीत में जीते रहते हैं और हकीकत को मानने से इनकार कर देते हैं। एक केला ही सही, पर जब बात सम्मान और तर्क की हो, तो कर्मचारी भी इंसान हैं – हर बार झुकना जरूरी नहीं।
आपके मोहल्ले या गली में भी ऐसी मजेदार दुकानदारी की कहानियां जरूर होंगी। अगर आपके पास भी कोई "केले के दाम" जैसी मजेदार घटना हो, तो कमेंट में जरूर बताएं! और हां, अगली बार जब दुकान जाएं, तो ये जरूर याद रखें – मुफ्त की चीज़ें भी कभी न कभी बंद हो जाती हैं, पर अच्छी यादें हमेशा दिल में रह जाती हैं।
अब आप बताइए – आपके इलाके में कौन-सी स्कीम सबसे ज्यादा चर्चित रही? या कभी आपको भी किसी पुरानी स्कीम के लिए ऐसे ही झगड़ना पड़ा? कमेंट में जरूर साझा करें!
मूल रेडिट पोस्ट: Lady tries to claim a 'Free Fruit for Kids' promo that ended 5 years ago.