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जब ग्राहक ने धमकी दी – 'अगर दिक्कत दूर न हुई तो ऑफिस में तोड़फोड़ कर दूंगा!

CAD मशीनों के बीच परेशान इंजीनियर का कार्टून-3D चित्र, तकनीकी सहायता की चुनौतियों को दर्शाता है।
इस जीवंत कार्टून-3D दृश्य में, एक परेशान एप्लिकेशन इंजीनियर ईडीए उद्योग में तकनीकी सहायता की जटिलताओं से जूझता है, शुरुआती कंप्यूटर तकनीक की यादें और चुनौतियाँ उजागर करता है।

टेक्नोलॉजी सपोर्ट की दुनिया में रोज़ नए-नए रंग देखने को मिलते हैं – लेकिन कुछ किस्से ऐसे होते हैं जिन्हें सुनकर सिर पकड़ लो! आज हम आपको लेकर चलते हैं 1980 के दशक में, जब कंप्यूटर उतने आम नहीं थे, और टेक्निकल सपोर्ट का मतलब था फोन उठाकर सीधे "हॉटलाइन" पर गुस्सा निकालना।

सोचिए ज़रा, आपके ऑफिस में एक ग्राहक आता है जो गाली-गलौच पर उतर आए, और धमकी दे डाले – "अगर मेरी दिक्कत हल नहीं हुई, तो मैं आकर ऑफिस में तोड़फोड़ कर दूंगा!" क्या करेंगे आप?

80 के दशक की टेक्नोलॉजी – जब कंप्यूटर थे राजा, लेकिन राजा भी परेशान!

उस दौर की बात है जब EDA (Electronic Design Automation) इंडस्ट्री में एक कंपनी अपने खुद के हार्डवेयर वर्कस्टेशन बेच रही थी। कंप्यूटर स्टैंडर्ड नहीं थे, इसलिए हर कंपनी अपना ही सिस्टम बनाती थी। कंपनी ने Motorola 68000 प्रोसेसर पर आधारित मशीन बनाई, जिसमें UNIX BSD 4.2 ऑपरेटिंग सिस्टम बाद में डाला गया – क्योंकि ग्राहक भी अब स्टैंडर्ड प्लेटफॉर्म मांगने लगे थे।

कंपनी ने "रूट इंजन" नाम की डिवाइस भी बनाई थी – ऐसी मशीन जिसमें न मॉनिटर, न कीबोर्ड, न माउस, न हार्डडिस्क! बस एक 5¼ इंच की फ्लॉपी से बूट करो, और नेटवर्क के ज़रिए उसमें जॉब भेज दो। अगर कभी किसी ने मशीन से ज़्यादा मेमोरी मांग ली, तो मशीन फ्रीज़ हो जाती थी। तब तक आपको तब तक पता ही नहीं चलता जब तक एक "डिबग मॉनिटर" नाम की टर्मिनल से कनेक्ट न करें।

यह डिबग मॉनिटर कंपनी देती नहीं थी – ग्राहक को खुद ही इंतज़ाम करना पड़ता था। सलाह दी जाती थी – "भैया, डिबग मॉनिटर ले लो, नहीं तो फँस जाओगे!" लेकिन, भारत में भी जैसे लोग "इंश्योरेंस मत लो, भगवान भरोसे चलाओ!" वैसे ही वहाँ भी कई लोग बिना मॉनिटर के काम चला लेते थे।

ग्राहक का गुस्सा और सपोर्ट इंजीनियर की बेबसी

अब आते हैं असली कहानी पर। हमारे नायक, जो उस समय टेक्निकल सपोर्ट के लीड थे, को एक दिन पता चला कि एक ग्राहक ने उनकी कंपनी की हॉटलाइन ऑपरेटर को इतना बुरा-भला कह दिया कि वो रो पड़ीं! उस जमाने में न ईमेल था, न टिकट सिस्टम – सीधे फोन घुमाओ, और सपोर्ट वाले का जीना हराम कर दो।

आम तौर पर ऐसे बदतमीज़ ग्राहकों को ब्लैकलिस्ट कर देते, लेकिन मामला फँस गया क्योंकि वो ग्राहक एक ऐसी कंपनी में काम करता था, जिसके फाउंडर खुद उनके CEO रहे थे। अब तो मैनेजर ने भी ठान लिया – "चलो, एक बार और कोशिश करते हैं!"

ग्राहक को समझाने के लिए मैनेजर और सपोर्ट इंजीनियर खुद साइट पर पहुंचे। समझाया – "भैया, डिबग मॉनिटर से fsck कमांड चलाओ, फ्लॉपी सही रखो, तभी काम चलेगा!" लेकिन जनाब तो एकदम 'अशिक्षित' निकले। जितना सिखाओ, उतना ही उलझते जाएं। आखिरकार, सपोर्ट टीम ने हार मान ली – "लो, ये दस फ्लॉपी की स्टैक रख लो। अगर मशीन बूट न हो, तो एक नई लगा देना। जब खत्म हो जाएं, तो हमें बता देना – हम और बना देंगे!"

"अगर नहीं बना, तो तोड़फोड़ कर दूंगा!" – और फिर कहानी में ट्विस्ट

अब आते हैं कहानी के सबसे मज़ेदार मोड़ पर। जब सब कुछ समझा-बुझा कर मैनेजर ने कहा, "अब आपकी समस्या सुलझ जाएगी", ग्राहक ने तमतमाते हुए धमकी दी – "अगर अब भी दिक्कत आई, तो ऑफिस में आकर तोड़फोड़ कर दूंगा!"

मालूम होता है, 80 के दशक में भी "कुंठित ग्राहक" हर जगह थे – और गुस्सा निकालने का स्टाइल वही पुराना! एक कमेंट करने वाले ने मज़ाक में लिखा – "लगता है, उस जमाने की पेट्रोल में सीसा ज्यादा था, दिमाग का संतुलन हिल जाता था!" कोई और बोला – "80s में कोकीन का भी दौर था, शायद दोनों का असर हो!"

खैर, सपोर्ट टीम ने धमकी को अनसुना किया और निकल गई। कुछ ही दिनों बाद अखबार में खबर आई – वही ग्राहक अपनी अलग हो चुकी पत्नी को चाकू की नोंक पर अगवा करने के आरोप में गिरफ्तार हो गया! और उसके बाद कभी उसका फोन नहीं आया।

टेक्निकल सपोर्ट में ऐसे किरदार कम नहीं!

कहानी पढ़कर लगता है कि टेक्निकल सपोर्ट वाले कितने धैर्यवान होते हैं। किसी ने कमेंट किया – "ये तो एकदम फिल्मी एंडिंग हो गई!" एक और टेक्निकल एक्सपर्ट ने अपने अनुभव साझा किए – "उस दौर में कई इंजीनियर्स नई टेक्नोलॉजी को अपनाने में बहुत हिचकिचाते थे। जैसे हमारे यहाँ भी पुराने लोग नई मशीनों से दूर भागते हैं!"

एक और मज़ेदार कमेंट था – "कभी-कभी लगता है कि इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियर सर्किट डिजाइन करें, लेकिन इन्हें सॉफ्टवेयर से दूर ही रखना चाहिए!"

इस किस्से से एक बात तो साफ है – टेक्निकल सपोर्ट का काम सिर्फ मशीन ठीक करना नहीं, बल्कि लोगों की मनोदशा को भी संभालना पड़ता है! और कभी-कभी, "डुप्लीकेट फ्लॉपी" जैसी देसी जुगाड़ ही सबसे बड़ी राहत बन जाती है।

निष्कर्ष – आपकी टेक्नोलॉजी की कहानी क्या है?

हमारे देश में भी अक्सर ऐसा होता है – ग्राहक अगर समझ न पाए, तो सारा गुस्सा टेक्निकल सपोर्ट वाले पर ही उतारता है! लेकिन धैर्य, थोड़ी सी जुगाड़, और कभी-कभी 'चुप्पी साधना' – यही टेक्निकल सपोर्ट का असली हुनर है।

अगर आपके साथ भी ऐसा कोई अजीब ग्राहक या ऑफिस का किस्सा हुआ हो, तो नीचे कमेंट में ज़रूर साझा कीजिए। क्या कभी किसी ने धमकी दी, या कोई जुगाड़ अपनाई? आपकी कहानी सुनने का हमें इंतज़ार रहेगा!


मूल रेडिट पोस्ट: This better fix my problem or I'll come over and trash the place