जब ग्राहक ने टोकरी भर दी और दुकानदार की नींद उड़ गई: एक मजेदार दुकानदारी का किस्सा
क्या आपने कभी सोचा है कि दुकानदार की कुर्सी के पीछे बैठा शख्स कितनी अजीब-अजीब परिस्थितियों का सामना करता है? कई बार ग्राहक ऐसी हरकतें कर जाते हैं कि हँसी भी आती है और सिर भी पकड़ना पड़ता है। आज मैं आपको ले चलता हूँ एक डॉलर स्टोर (जिसे भारत में ‘सब कुछ सस्ता’ या ‘जनरल स्टोर’ जैसा समझ सकते हैं) की एक दिलचस्प दिनचर्या पर, जहाँ दो ग्राहकों ने दुकानदार की नींद और धैर्य दोनों की परीक्षा ले ली।
ग्राहक की टोकरी और दुकानदार की मुश्किल
सोचिए, आपके पास एक ग्राहक आता है, उसकी टोकरी सामान से खचाखच भरी हुई है—लगभग डेढ़ सौ डॉलर के सामान का मतलब, मान लीजिए, हमारे यहाँ 100-120 आइटम्स! दुकानदार एक-एक करके सारे आइटम स्कैन करता है, बिल बनाता है और तभी ग्राहक बोल पड़ती है, “भैया, पैसे कम पड़ गए, थोड़ा सामान कम कर दो।”
अब दुकानदार भाईसाहब सोच रहे हैं—“अरे मैडम, जब बजट तय था, तो पहले ही हिसाब क्यों नहीं रखा? कम से कम मोबाइल में कैलकुलेटर ही चला लेतीं!” वैसे, यहाँ एक कमेंट में लिखा गया—“आजकल डॉलर स्टोर भी महंगे हो गए हैं, हर चीज एक डॉलर की कहाँ रही!” एक और जनाब ने चुटकी ली—“कैलकुलेटर निकालकर हिसाब कौन करे, इतनी आसानी से थोड़ी!” भाई, भारत में भी तो यही हाल है। जब दुकानों पर लिस्ट लेकर जाते हैं, तो हौले-हौले सामान बढ़ाते रहते हैं, और काउंटर पर आकर याद आता है—“अरे, बजट तो हाथ से निकल गया!”
खैर, उस ग्राहक ने कुछ सामान छांटकर सवा सौ डॉलर का सामान लिया, बाकी दुकानदार की टोकरी में डाल दिया। अब बेचारे को शिफ्ट खत्म होने पर वो बचे हुए आइटम्स वापिस रखने पड़े! इस पर एक और कमेंट था—“कई ग्राहक खुद गणित के उस्ताद नहीं होते, बेचारे दुकानदार ही भुगतते हैं!” सही बात है, ये रोजमर्रा का किस्सा है।
नींद के नशे में दुकानदार की जबान फिसल गई!
अब आते हैं दूसरी घटना पर, जिसमें दुकानदार की खुद की हालत देखने लायक थी। रात भर नींद पूरी ना हो, तो अगला दिन वैसे ही ‘भूतनी के भैया’ जैसा लगता है। दुकानदार भाई ने स्वीकारा—“रात भर बस तीन घंटे की नींद मिली थी, दिमाग घोड़े बेचकर सो रहा था!”
एक सज्जन ग्राहक आए, दो लीटर की कोल्ड ड्रिंक लेकर। दुकानदार ने झोले में डालने के बजाय, गलती से पूछ लिया—“सोडा को रसीद में डालूं?” दोनों की हँसी छूट गई! ग्राहक बोले—“भैया, झोले में डाल दो, रसीद में नहीं!” ऐसे मजेदार पल दुकानदारी को थोड़ा आसान बना देते हैं।
इस पर कम्युनिटी में भी हँसी की लहर दौड़ गई। एक ने लिखा—“कई बार दुकानदार कहता है ‘रसीद झोले में है’, और हम जवाब देते हैं—‘धन्यवाद, आपको भी!’” कोई बोला—“अरे, मैं तो सुबह-सुबह ‘शुभ संध्या’ बोल जाता हूँ, और रात को ‘नमस्कार’!” एक ने तो हद कर दी—“मंगलवार को ‘शुभ सप्ताहांत’ बोल दिया!” सच कहूँ, ये बातें हमारे यहाँ भी रोज सुनने मिलती हैं—कोई ‘नमस्ते’ की जगह ‘सलाम’ बोल जाता है, तो कोई ‘शुभरात्रि’ सुबह-सुबह।
ग्राहक-दुकानदार: दोनों की मुश्किलें
एक कमेंट में किसी ने बड़ी अच्छी बात कही—“ग्राहक हमेशा समझदार नहीं होता, और दुकानदार हमेशा मशीन नहीं होता।” सच है, दुकानदार भी इंसान है, उसकी भी सीमाएँ हैं। जब ग्राहक काउंटर पर आकर अपनी खरीददारी में कटौती करता है, या थकावट में दुकानदार का दिमाग उल्टा-पुल्टा बोलता है, तो ये आम बातें हैं।
हमारे देश की दुकानों में भी यही नजारा दिखता है—भीड़ भरी दुकानों में ग्राहक सामान बढ़ाते जाते हैं, और आखिर में दुकानदार को ही सब समेटना पड़ता है। वहीं, दुकानदार भी अगर दिन भर खड़े-खड़े थक जाए, तो कभी-कभी उसकी जबान फिसल ही जाती है।
क्या आपने भी देखी हैं ऐसी घटनाएँ?
दोस्तों, इस पोस्ट में जो मजेदार अनुभव बताए गए, वो हर उस इंसान के लिए हैं, जिसने कभी दुकानदारी की हो या भीड़-भाड़ वाले बाजार में खरीदारी की हो। भारत में भी, किराने से लेकर कपड़े की दुकान तक, ऐसी घटनाएँ रोज घटती हैं। कभी ग्राहक की गलती, कभी दुकानदार की थकावट—आखिरकार, हम सब इंसान हैं।
आपके साथ भी कभी ऐसा हुआ है कि आपसे गिनती गड़बड़ा गई हो, या दुकानदार ने कुछ अजीब बोल दिया हो? कमेंट में जरूर बताइए! कौन जाने, आपकी कहानी भी किसी और के चेहरे पर मुस्कान ले आए।
आखिर में, दुकानदार भाई ने तो खूब सही कहा—“सुबह दस बजे ‘शुभरात्रि’, और रात को ‘शुभदिवस’—हिंदी की दुकानदारी में यही असली मजा है!”
मूल रेडिट पोस्ट: Interesting day at work