जब ग्राहक ने कहा 'सिर्फ एक रंग चाहिए विज्ञापन में', तो डिज़ाइनर ने कर दिया कमाल!
क्या आपने कभी ऐसे बॉस या ग्राहक का सामना किया है, जिसे बस अपनी ही चलानी हो—वो भी तर्क-वितर्क से परे? अगर हाँ, तो आज की ये कहानी आपकी हँसी रोक नहीं पाएगी! हर दफ्तर में एक न एक ‘खास ग्राहक’ ज़रूर होता है, जिनकी फरमाइशें सुनकर कभी-कभी तो मन करता है, “भैया, ये तो हद ही हो गई!” तो आइए, मिलते हैं एक युवा ग्राफिक डिज़ाइनर से, जिसकी पहली नौकरी में उसे मिला ऐसा ही ‘खास’ ग्राहक—जिसकी मांग थी, “विज्ञापन में सिर्फ एक रंग चाहिए!”
विज्ञापन की दुनिया के ‘कलेक्टर साहब’ और उनका रंगीन (या कहें बेरंग) आदेश
हमारे नायक, अभी कॉलेज से निकले-निकले थे—जोश में, नए आइडियाज से भरे हुए। लेकिन पहली ही नौकरी में उन्हें ऐसे ग्राहक से पाला पड़ा, जो अपने कार बेचने वाले विज्ञापनों को जितना ‘बेकार’ बनवा सकता था, बनवाता था। आप सोचिए—एक छोटे से 7x5 इंच के पेज में 50-100 कारों की फोटो, एक ही भारी-भरकम फॉन्ट (Impact), हर कोना भरा हुआ... यानी “कचरा विज्ञापन” की परिभाषा!
डिज़ाइनर साहब ने शुरू में कोशिश भी की कि कुछ काबिलियत दिखाएं, पर ऑफिस वालों ने साफ कह दिया—“हमें बस वही कचरा चाहिए, क्लाइंट को पसंद है!” अब मजबूरी में वही करना पड़ा। लेकिन फिर, ग्राहक साहब ने रंगों पर भी बंदिशें लगानी शुरू कर दीं—पहले लाल मत लगाओ, फिर नारंगी, पीला, हरा, बैंगनी, गुलाबी, भूरा, सफेद, काला... आखिर में सिर्फ नीला बचा।
‘नीला ही नीला’ – ग्राहक की डिमांड पर कलाकार का जवाब
अब ज़रा कल्पना कीजिए, किसी ने आपसे कह दिया, “सिर्फ एक रंग में सारा विज्ञापन बनाओ—कोई शेडिंग, कोई हाइलाइटिंग नहीं।” हमारे डिज़ाइनर ने भी वही किया—सारी कारें, सारा टेक्स्ट, हर एलिमेंट बस एक ही नीले रंग में रंग दिया। नतीजा? एक बड़ा सा नीला चौकोर डिब्बा! मानो किसी बच्चे ने रंग भरने वाली किताब में, बिना कुछ देखे, पूरा पन्ना नीला कर दिया हो।
कहानी यहीं खत्म नहीं होती। जब वो ‘महान’ विज्ञापन ग्राहक के पास गया, तो जनाब का पारा सातवें आसमान पर! फोन पर गुस्से में चिल्लाने लगे, “ये क्या बनाया!” लेकिन डिज़ाइनर ने बड़ी शांति से जवाब दिया—“आपने खुद ही कहा था, सिर्फ नीला रंग इस्तेमाल करना है। सारे आपकी बताई चीजें इस्तेमाल कीं, बस रंग वही रखा।” और मज़े की बात, कॉल रिकॉर्ड होती थी, तो बॉस भी कुछ नहीं कह सके।
दफ्तर की दुनिया में ऐसे किस्से आम हैं!
यह कहानी पढ़ते हुए मुझे अपने मोहल्ले के बिजली मिस्त्री की याद आ गई, जिसे एक बार पड़ोसी ने कहा, “पुराना पंखा है, बस आवाज़ मत करे, हवा चाहे कम दे।” मिस्त्री ने पंखे से ब्लेड निकाल दिए—अब पंखा चलता भी था, आवाज़ भी नहीं करता था, हवा भी नहीं देता था! ग्राहक, ग्राहक में फर्क नहीं होता—चाहे अमेरिका हो या इंडिया, अजीब फरमाइशें हर जगह मिलेंगी।
रेडिट पर इस कहानी को पढ़ने वालों ने भी खूब मज़ेदार प्रतिक्रिया दी। एक ने लिखा, “हमारे ऑफिस में तो एक मैडम थीं, जिन्हें गोल कोने या वृत्त बिल्कुल पसंद नहीं थे, चाहे जो हो जाए!” किसी ने कहा, “ग्राहक की डिमांड सुनकर तो ऐसा लगा जैसे नीला आदमी खुद ही विज्ञापन बनवा रहा हो!” किसी ने तो अपने पिताजी का किस्सा सुनाया, “शावर से सिर्फ गर्म पानी आता है, पता चला, नॉब ही पूरा गर्म पर घुमाया था!” यानी तकनीक और समझदारी में फर्क समझना भी ज़रूरी है।
डिजाइनर के लिए सबसे बड़ा सबक
इस कहानी में छुपा बड़ा संदेश यही है—हर पेशे में, खासकर क्रिएटिव काम में, कई बार ग्राहक की डिमांड पर आँख मूँदकर चलना मजबूरी बन जाता है। लेकिन कभी-कभी, ग्राहक को उसी की बातों में उलझाकर असलियत दिखाना भी एक कला है। ऊपर से जब बॉस भी ग्राहक के ही पक्ष में हो, तब तो मज़ा दोगुना!
एक टिप्पणीकार ने बड़ी सही बात लिखी, “ग्राफिक डिज़ाइन में सबसे मुश्किल हिस्सा ग्राहक होते हैं, लेकिन हँसी के लिए वही सबसे बढ़िया।” किसी ने सलाह दी कि “कभी-कभी ग्राहक को वही देने में मज़ा आता है, जो वो माँगता है—फिर चाहे वो खुद ही अपनी गलती का एहसास क्यों न करे!”
निष्कर्ष – आपकी भी कोई ऐसी कहानी है?
तो दोस्तों, ये थी एक डिज़ाइनर और उसके ‘नीला प्रेमी’ ग्राहक की मजेदार जंग। अगली बार जब आपके ऑफिस में कोई अजीब डिमांड आए, तो इस कहानी को याद कीजिए और चेहरे पर मुस्कान लाइए! और हाँ, अगर आपके पास भी ऐसी कोई मजेदार ऑफिस/ग्राहक की कहानी है, तो कमेंट में ज़रूर साझा कीजिए—क्योंकि हँसी बाँटने से ही बढ़ती है!
आपको यह किस्सा कैसा लगा? क्या आपके साथ भी कभी ऐसा हुआ है? नीचे अपने विचार ज़रूर लिखें!
मूल रेडिट पोस्ट: You said you wanted an ad with only one color. You got it buddy!