जब ग्राहक ने किया ट्रायल रूम का बंटाधार, तो सेल्सपर्सन ने लिया मज़ेदार बदला!
हम सबने कभी न कभी दुकानों में शॉपिंग करते वक्त सेल्सपर्सन की मुस्कान को नज़रअंदाज किया होगा, लेकिन उनके दिल में क्या चलता है, ये शायद ही किसी ने सोचा हो। आज की कहानी है एक ऐसे रिटेल वर्कर की, जिसने अपने गुस्से और झल्लाहट को अलग ही अंदाज़ में जाहिर किया। भैया, ये कोई बॉलीवुड फिल्म नहीं, बल्कि असली जिंदगी की 'पेटी रिवेंज' है!
ब्लैक फ्राइडे का बवाल: जब ट्रायल रूम बना युद्ध का मैदान
ब्लैक फ्राइडे – अमेरिका का वो दिन जब लोग दुकानों पर ऐसे टूट पड़ते हैं जैसे इंडिया में दिवाली पर मिठाई की दूकान पर भीड़ लगती है। ऐसे ही एक भीड़-भाड़ वाले दिन, Urban Outfitters नाम की दुकान में हमारे नायक (या कहें 'पीड़ित सेल्सपर्सन') ट्रायल रूम संभाल रहे थे। अब जो लोग कपड़ों की दुकानों में काम कर चुके हैं, वो जानते हैं कि ट्रायल रूम का काम किसी युद्ध से कम नहीं।
यहाँ के कपड़े खास तौर से 'विंटेज' या 'रीमेड' होते हैं – यानी हर शॉर्ट्स की साइज अलग! ग्राहक को ट्रायल करना ही पड़ता है, लेकिन भैया, ट्रायल करने का भी एक तरीका होता है। उस दिन एक कॉलेज की लड़की – सुनहरे बाल, स्टाइलिश – आई और पूरे शॉर्ट्स का ढेर लेकर ट्रायल रूम में घुस गई। वैसे तो नियम है कि सीमित आइटम्स ही ट्रायल करो, लेकिन अकेली थी तो सेल्सपर्सन ने भी दिल बड़ा कर दिया।
ग्राहक की बदतमीज़ी: "मालिक समझ लिया क्या?"
अब भारत में भी कई बार दुकानों में लोग कपड़े ऐसे ट्रायल करते हैं जैसे घर का सामान हो – सब उल्टा-पुल्टा कर देते हैं, हैंगर इधर-उधर, कपड़े जमीन पर। उसी तरह, ये मैडम ट्रायल रूम में हर दो मिनट में बाहर आकर नए शॉर्ट्स ले जातीं, पुराने दे जातीं – वो भी अंदर से बाहर, ज़िप खुला, कभी हैंगर पर तो कभी बिना हैंगर के।
बीस मिनट बाद, जब उनका मन भर गया, तो बिना कुछ खरीदे, ट्रायल रूम को ऐसे छोड़ गईं जैसे कोई शादी के बाद पंडाल छोड़ जाता है – हर तरफ कपड़े, हैंगर, कूड़ा-करकट! हमारे सेल्सपर्सन का पारा सातवें आसमान पर, लेकिन क्या करें, नौकरी भी तो निभानी है।
छोटा बदला, बड़ी राहत: "चश्मा चूर-चूर!"
साफ-सफाई करते वक्त उन्हें एक जोड़ी चश्मा मिला – जो दुकान का नहीं, बल्कि उसी लड़की का था। अब यहाँ से कहानी में ट्विस्ट आता है! हमारे सेल्सपर्सन ने गुस्से में आकर उस चश्मे को ऐसी ठोकर मारी कि चश्मा चकनाचूर हो गया। कुछ देर बाद मैडम लौटीं और बड़े भोलेपन से पूछा – "क्या आपको मेरा चश्मा मिला?" जवाब मिला – "नहीं बहनजी, इतनी सफाई के बाद भी कुछ नहीं मिला।"
मैडम को शायद भरोसा नहीं हुआ, तो खुद चेक करने गईं, लेकिन वहाँ तो सन्नाटा। लौटकर बोलीं, "अगर मिल जाए तो मुझे फोन कर लेना" – लेकिन नंबर भी कबाड़ में चला गया। कह सकते हैं, "अरे भैया, ये तो चश्मे के साथ-साथ उनके घमंड का भी चूरन बन गया!"
कमेंट्स की महफिल: जनता का न्याय
रेडिट पर इस किस्से को सुनकर लोगों ने खूब मज़े लिए। एक यूज़र ने लिखा, "वाह, जैसे सपनों का चश्मा टूट गया!" तो किसी ने चुटकी ली, "शॉर्ट्स के साथ-साथ इनका व्यवहार भी छोटा रह गया!" एक और ने मज़ाकिया अंदाज़ में कहा – "अगर इंडिया में होता तो चश्मा दुकान के बाहर लगे बाल्टी में फेंक देते!"
कुछ लोगों ने जवाबी तर्क भी दिया – "अगर वो चश्मा वहीं छोड़ देते, तो कोई नंगे पाँव आकर चोटिल भी हो सकता था, इसलिए साफ कर देना सही था।" वहीं एक और यूज़र बोले, "मैं भी कभी रिटेल में काम करता था, ट्रायल रूम का सपना आज भी डराता है!"
ग्राहक भगवान होता है... पर हर भगवान नहीं होता!
हमारे यहाँ कहते हैं, "ग्राहक भगवान है," लेकिन भाई, भगवान भी मर्यादा में रहते हैं। अगर आप दुकानदार या सेल्सपर्सन की इज्जत नहीं करेंगे तो कभी-कभी ऐसी छोटी-छोटी 'पेटी रिवेंज' आपको भी झेलनी पड़ सकती है। आखिरकार, सब इंसान ही हैं – उनकी भी भावनाएँ होती हैं, गुस्सा आता है और कभी-कभी वो भी छोटा बदला ले लेते हैं।
निष्कर्ष: दूसरों की मेहनत की कद्र करें!
तो अगली बार जब आप किसी दुकान में जाएँ, ट्रायल रूम में कपड़े ट्राई करें या सेल्सपर्सन से मदद लें, तो ज़रा सोचिए – आपके पीछे भी कोई इंसान है जो सब संभाल रहा है। छोटा सा सम्मान, थोड़ी सी तहजीब और तमीज – यही असली मार्क्सशीट है। वरना कहीं आपके चश्मे का भी चूरन न बन जाए!
आपकी क्या राय है? क्या आपने कभी किसी सेल्सपर्सन की मेहनत देखी है या खुद ऐसा कोई मजेदार वाकया देखा/झेला है? कमेंट में ज़रूर बताइए!
मूल रेडिट पोस्ट: Retail revenge