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जब गणित के पेपर में हर सवाल का जवाब 67 हो गया: एक शिक्षक की मज़ेदार बदला कहानी

एक हाई स्कूल गणित शिक्षक की कार्टून 3डी चित्रण, एक गड़बड़ geometry कक्षा के पुनः परीक्षा दृश्य की निगरानी करते हुए।
इस जीवंत कार्टून 3डी दृश्य में, एक हाई स्कूल गणित शिक्षक geometry कक्षा के पुनः परीक्षा के हास्यपूर्ण गड़बड़ को संभालते हुए, शिक्षण के चुनौतियों और अप्रत्याशित क्षणों को दर्शाता है। कक्षा में "दुष्ट अनुपालन" की यात्रा में शामिल हों!

स्कूल के दिनों में हम सबने कभी न कभी ऐसे शरारती बच्चों को देखा है, जो पढ़ाई से ज़्यादा अपनी शैतानियों में मशगूल रहते हैं। लेकिन जब बच्चों की शैतानियों में माता-पिता और स्कूल का प्रशासन भी कूद पड़े, तब कहानी में असली मसाला आ जाता है। आज की कहानी है एक हाई स्कूल के गणित शिक्षक, एक चालाक छात्र, उसकी बहुत ही "संरक्षक" माँ और स्कूल के अधिकारियों की, जहां एक साधारण अंक – 67 – पूरी परीक्षा की तस्वीर बदल देता है।

गणित का मैदान और 67 का जादू

कहानी की शुरुआत होती है एक अमेरिकी हाई स्कूल के गणित शिक्षक से, जिन्होंने अचानक एक जियोमेट्री (रेखागणित) की कक्षा संभाली। पढ़ाई में वैसे ही नई-नई चुनौतियाँ थीं, ऊपर से एक छात्र ने परीक्षा में जिन सवालों के जवाब नहीं आते थे, वहाँ सीधा 67 लिख दिया! सोचिए, हमारे यहाँ तो मास्साब ऐसे में "मूर्ख नंबर 1" कहकर कॉपी ही फाड़ देते! पर वहां छात्र को 17% अंक मिले, और उसने इसे बड़ी मज़ाकिया बात समझा।

शिक्षक ने छात्र को समझाया, "बेटा, मेहनत कर लो, सुधार कर लो, आधे नंबर मिल जाएंगे।" लेकिन साहब जी को तो मज़ाक सूझ रही थी। माँ को फोन किया गया तो उन्होंने उल्टा टीचर को ही घेर लिया – "आपने बहुविकल्पीय (multiple choice) परीक्षा क्यों नहीं ली? ऐसे तो बच्चे मनमाना जवाब देंगे ही!"

माँ की जिद और प्रशासन की झुकावट

यहाँ कहानी में ट्विस्ट तब आया जब माँ सीधे प्रशासन (प्रिंसिपल) के पास पहुँच गईं। हमारे यहाँ जैसे सरकारी दफ्तरों में सिफारिश चलती है, वैसे ही वहाँ भी प्रशासन ने माँ की बात मान ली और टीचर को कहा – "बेटा, बहुविकल्पीय परीक्षा दो।" अब महाशय टीचर भी कम नहीं थे। उन्होंने हर सवाल के चार विकल्पों में से एक विकल्प – 67 – ही डाल दिया!

यहाँ एक पाठक ने कमेंट किया, "शिक्षक ने तो छात्र के लिए मौके आसान कर दिए, अब तो 25% की जगह 33% चांस है सही जवाब चुनने का!" यानी अगर छात्र को पता है कि 67 तो गलत ही होगा, तो बाकी तीन में से कोई भी चुन ले। लेकिन छात्र ने फिर भी ज़्यादातर सवालों में 67 ही टिक किया, और नंबर बढ़कर 30% हो गए। अब भला बताइए, ऐसी जिद्दी बुद्धि को क्या कहें!

जीवन के सबक: नंबर से आगे की बात

यहाँ कई पाठकों ने बड़ी दिलचस्प बातें लिखीं। एक ने कहा, "जीवन में हर काम का नतीजा होता है – माँ हमेशा पास नहीं बचा सकती।" दूसरे ने जोड़ा, "आजकल के बच्चों को लगता है, फेल होना कोई विकल्प ही नहीं है – लेकिन असल जिंदगी में गिरना-उठना, सीखना ही असली शिक्षा है।"

हमारे समाज में भी माता-पिता अक्सर बच्चों की गलतियों पर परदा डालने की कोशिश करते हैं, लेकिन इससे बच्चों को नुकसान ही होता है। एक कमेंट में बहुत सटीक लिखा था – "माँ अपने बेटे का भला नहीं कर रही, अगर वह अच्छा करेगा तो अपनी मेहनत से, माँ की बचाव नीति से नहीं।"

शिक्षक ने भी यही कहा – "मेरा मकसद बच्चों को केवल गणित नहीं, बल्कि जीवन के जरूरी गुण सिखाना है – जैसे समय पर आना, सकारात्मक सोच रखना और पूरी कोशिश करना। ये बातें किसी भी करियर में काम आएंगी।"

टीचर की 'मालिशियस कम्प्लायंस' और कुछ हँसते-हँसते ज्ञान

अब ज़रा सोचिए, अगर हमारे स्कूल में भी कोई छात्र हर सवाल के जवाब में "42" या "67" लिख देता और माँ आकर कहे – "मतलब आपने बहुविकल्पीय परीक्षा क्यों नहीं ली?" तो मास्साब क्या जवाब देते? शायद, "बेटा, जिंदगी में हर सवाल का जवाब बहुविकल्पीय नहीं होता!"

एक पाठक ने मज़ाकिया अंदाज में लिखा, "शिक्षक को चाहिए था कि अंतिम नंबर भी 67 ही दे देते, फेल तो वैसे भी होना था!" तो कोई बोला, "अच्छा हुआ पास नहीं हुआ, वरना जीवन भर यही सोचता रहता कि सब कुछ ऐसे ही आसानी से मिल सकता है।"

शिक्षक ने आखिर में बड़ी बात कही – "मैंने जानबूझकर 67 विकल्प इसलिए डाले, ताकि छात्र को दूसरा मौका मिले और वह सीखे कि मेहनत के बिना नंबर नहीं बढ़ते।" लेकिन छात्र ने फिर भी वही पुरानी चाल चली, और आखिरकार फेल हो गया।

निष्कर्ष: सच्ची शिक्षा की असली कसौटी

इस पूरी घटना में एक गहरा संदेश छुपा है – शिक्षा सिर्फ नंबर पाने या पास-फेल की दौड़ नहीं, बल्कि जिम्मेदारी, ईमानदारी और जीवन की हकीकतों को समझने का नाम है। माता-पिता अगर बच्चों को हर बार बचाते रहेंगे, तो वे कभी असफलता से सीख नहीं पाएंगे। और असल जिंदगी में, हर सवाल का जवाब 67 नहीं होता!

आपका क्या कहना है? क्या कभी आपके स्कूल में ऐसी कोई घटना हुई है? क्या आपको भी लगता है कि आजकल के बच्चों को असफलता का स्वाद चखना जरूरी है? अपनी राय नीचे कमेंट में ज़रूर लिखिए – और हां, अगली बार कोई "67" लिखे तो उसे जरूर बताइए – असली जिंदगी में तो सवाल और भी टेढ़े होते हैं!


मूल रेडिट पोस्ट: Admin says “Just Give Him a Multiple Choice Retake”