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जब 'कंपयूएसए' में मैनेजर की चलाकी पर भारी पड़ा कर्मचारी का जुगाड़

कंपयूसा में टीम मीटिंग का नेतृत्व करते हुए फ्रंट एंड मैनेजर, 2004 की तकनीकी खुदरा यादों को जीवंत करते हुए।
2000 के दशक की शुरुआत में कंपयूसा में एक जीवंत टीम मीटिंग का सिनेमाई झलक, जहां तकनीकी खुदरा और टीमवर्क की यादें जीवित होती हैं। आइए, मैं अपने कैशियर और सुरक्षा कर्मचारियों के प्रबंधन के समय की एक मजेदार कहानी साझा करता हूँ!

क्या आपने कभी ऐसी नौकरी की है जहाँ ऊपरवाले बस टारगेट, सेल्स, और “अतिरिक्त बिक्री” की रट लगाए रहते हैं? आप चाहे जितनी मेहनत करो, गलती हमेशा आपकी ही निकलती है! ऐसी ही एक कहानी है ‘कंपयूएसए’ नाम की अमेरिकन इलेक्ट्रॉनिक्स दुकान की, जिसमें एक हिंदी फिल्म जैसा ट्विस्ट आया – और वहीं से शुरू हुआ असली मज़ा।

साल था 2004, कंपयूएसए की ब्रांच में फ्रंट एंड मैनेजर बने हमारे कहानी के हीरो। दुकान में कंप्यूटर, हार्डवेयर, सॉफ्टवेयर, और क्या-क्या नहीं बिकता था। उनका काम था कैशियर, सुरक्षा गार्ड और बाकी स्टाफ को सँभालना। लेकिन जब ऊपरवाले मैनेजरों की मीटिंग में उनके तरीके पर सवाल उठे, तो सबने उन्हें घेर लिया – जैसे स्कूल में क्लास टीचर के सामने एक सीधा बच्चा फँस जाए!

सेल्स का ‘फॉर्मूला’ और तुगलकी फरमान

ऑपरेशंस मैनेजर ‘जेफ’ ने मीटिंग में ताना मारा, “आपका स्टाफ हर चीज़ की सेल्स क्यूँ नहीं बढ़ा रहा?” कहानी सुनते हुए लगा – ये तो वैसा ही है जैसे भारत में बॉस बोले, “हर ग्राहक को क्रेडिट कार्ड, बीमा, पर्सनल लोन, सब कुछ समझाओ – भले ही उसे मोबाइल खरीदना हो!”

हीरो ने समझाया, “हम वही बताते हैं जो ग्राहक के काम का हो, इससे काउंटर पर लाइन भी कम लगती है, ग्राहक भी खुश।” लेकिन जेफ माने नहीं, और बाकी मैनेजर्स भी आ गए उनकी टोली में। सबने मिलकर हीरो को कोसना शुरू कर दिया कि सेल्स के नंबर कम क्यों हैं, जबकि असल में टारगेट से ऊपर ही चल रहे थे!

मज़ेदार बदला: जब ग्राहक लाइन में फँस गए!

हीरो ने बोला – ठीक है, अब जैसा कहोगे वैसा ही करेंगे। अगले दिन से हर कैशियर ने हर ग्राहक को रिप्लेसमेंट प्लान, स्टोर क्रेडिट कार्ड, ट्रेनिंग क्लास, घर पर इंस्टॉलेशन, यहाँ तक कि AOL इंटरनेट साइनअप तक सबकुछ ऑफर करना शुरू कर दिया। सोचिए, जैसे भारत में हर दुकानदार हर ग्राहक को बार-बार बोले – “साब, EMI चाहिए? वारंटी लीजिए! इंस्टॉलेशन फ्री है! क्रेडिट कार्ड मिलेगा!”

नतीजा? काउंटर पर लंबी लाइनें, ग्राहक परेशान, सेल्स स्टाफ भी झल्ला गया! सबसे मज़ेदार बात – क्रेडिट कार्ड और AOL के लिए ग्राहक को काउंटर से दूसरे टर्मिनल तक ले जाना पड़ता था, जिससे हर ट्रांजैक्शन में 3-5 मिनट ज्यादा लगने लगे। एक हफ्ते में ही मैनेजर्स ने हार मान ली – “भाई, तुम अपना पुराना तरीका ही अपनाओ।”

‘टिम बक्स’ – इनाम का खेल, लेकिन जलन का जुगाड़

कुछ महीनों बाद स्टोर मैनेजर टिम ने सेल्स बढ़ाने के लिए एक नया इनाम शुरू किया – हर एड-ऑन बेचने पर स्टाफ को ‘टिम बक्स’ नाम की दुकान की नकली करंसी (जिस पर टिम की फोटो भी थी!) मिलती। मतलब – जैसे भारत में कंपनी वाले इन्सेंटिव कूपन बाँटते हैं, वैसे ही। हीरो ने मेहनत करके $1500 की दुकान क्रेडिट जमा कर ली – और एकदम तगड़ा गेमिंग कंप्यूटर खरीद डाला!

अब जलन में आकर जेफ ने सीधा चोरी का इल्जाम लगा दिया, और कॉर्पोरेट सिक्योरिटी बुला ली। लेकिन हीरो ने अपने पास हर खरीदारी की रसीद और टिम बक्स की पूरी फाइल संभालकर रखी थी – जैसे हमारे यहाँ सरकारी बाबू हर फाइल की फोटोस्टेट रखते हैं! जांच के बाद सब क्लियर, हीरो निर्दोष, लेकिन जेफ की बोलती बंद!

असली क्लाइमेक्स: जब मैनेजर ही एक्सपोज़ हो गया!

कॉर्पोरेट ने सोचा – चलो सब मैनेजर्स को लंच पर ले चलते हैं। लेकिन जेफ बोला – “तुम (हीरो) दुकान पर रहो, बाकी चलेंगे।” हीरो का गुस्सा सातवें आसमान पर – और उन्होंने कर दिया असली बदला! सारे महंगे गेम्स के बॉक्स उठाकर दुकान के दरवाजे के पास फेंक दिए और बोला – “इनमें से किसी में भी सिक्योरिटी टैग नहीं है, जबकि होना चाहिए!” सबके सामने जेफ की लापरवाही उजागर हो गई, और बाकी मैनेजर्स हँसी नहीं रोक पाए। जेफ को शर्मिंदगी उठानी पड़ी और बाकी सबने मज़े से लंच किया!

पाठक टिप्पणी: हर दुकान में मिलते हैं जेफ जैसे बॉस!

रेडिट समुदाय में इस कहानी को पढ़कर कई लोगों ने अपने-अपने अनुभव साझा किए। एक पाठक ने लिखा, “मेरे पुराने बॉस ने भी ऐसे ही उल्टे-सीधे तरीके अपनाए, और जब मैंने सही तरीका बताया तो मुझे ही निकाला गया!” भारत में भी अक्सर ऐसा होता है – बॉस की गलती का खामियाजा ईमानदार कर्मचारी को ही भुगतना पड़ता है।

एक और पाठक ने कंपयूएसए में हुए अजीबो-गरीब इनामों और सेल्स टारगेट के किस्से सुनाए – जैसे हमारे देश में दिवाली सेल के टाइम हर स्टाफ पर दबाव होता है कि हरेक ग्राहक को एक्स्ट्रा सर्विस बेचो, वरना बोनस कट जाएगा!

किसी ने पुराने दिनों की याद ताज़ा की – “कंपयूएसए में हर हफ्ते नया नियम, ऊपर से मैनेजमेंट की मनमानी, लेकिन कलीग्स के साथ मस्ती करना अलग ही मज़ा था।” क्या हमारे यहाँ भी ऑफिस में यही हाल नहीं?

निष्कर्ष: छोटी-छोटी जीत, बड़े-बड़े सबक

इस कहानी में साफ़ दिखता है – जब कर्मचारी अपनी समझदारी, ईमानदारी और थोड़ी-सी चालाकी से काम करें तो बड़े-बड़े मैनेजर भी मात खा जाते हैं। चाहे अमेरिका हो या भारत, ऑफिस पॉलिटिक्स, बॉस की जलन, और कर्मचारियों की जुगत हर जगह एक जैसी है।

क्या आपके ऑफिस में भी कभी ऐसा “मास्टरस्ट्रोक” किसी ने खेला है? या कभी बॉस की ज़िद का जवाब होशियारी से दिया हो? अपने मज़ेदार किस्से कमेंट में ज़रूर लिखिए – क्योंकि असली मज़ा तो ऐसे ऑफिस गप्पों में ही है!


मूल रेडिट पोस्ट: Fun Story from CompUSA