जब कंपनी की नीतियों ने कर्मचारी को सड़क पर भेजा: 'अगर घंटे भर में नहीं भेजोगे, तो मैं घंटे भर में आ जाऊंगा!
क्या आपने कभी ऑफिस की उन नीतियों का सामना किया है, जो सुनने में तो बड़ी समझदार लगती हैं, लेकिन असल में सिर पकड़ने लायक होती हैं? ऐसी ही एक कहानी है एक वर्क-फ्रॉम-होम कर्मचारी की, जिसे कंपनी ने "पॉलिसी" के नाम पर घंटों सड़क पर घुमाया… और आखिर में उसे ही अपनी गलती का एहसास भी हो गया!
ऑफिस की “बुद्धिमानी” और ट्रैफिक का जोड़-घटाव
सोचिए, आप घर पर बैठकर मोबाइल सॉफ्टवेयर की दुनिया में मग्न हैं। काम के लिए कुछ फिजिकल डिवाइस चाहिए, तो कंपनी से रिक्वेस्ट डालते हैं—“भेज दो, भैया!” अब तक तो सब सही चल रहा था, लेकिन अचानक कंपनी बोलती है—“तुम ऑफिस के एक घंटे के दायरे में रहते हो, खुद आकर ले जाओ।”
अब यहां दिक्कत ये कि अगर गूगल मैप्स दोपहर के 2 बजे बताता है कि एक घंटे में पहुंच सकते हैं, तो इसका मतलब ये नहीं कि सुबह या शाम के ट्रैफिक में भी उतना ही लगेगा! असल हकीकत ये है कि जब ऑफिस टाइम होता है, दिल्ली-मुंबई-बेंगलुरु हो या लखनऊ-पटना, सड़कें जाम से भरी रहती हैं। एक घंटा कब डेढ़-दो हो जाता है, पता ही नहीं चलता।
कर्मचारी ने भी कंपनी से विनती की—“भैया, मैं खुद कूरियर का पैसा दे दूंगा, पेट्रोल-डीजल और पार्किंग इससे सस्ता है।” लेकिन कंपनी की नीति थी “ना बाबा ना! आना ही पड़ेगा।”
“पॉलिसी” बनाम “अकल”: पाई-पाई की बचत, घंटों का नुकसान
यहां पर एक बहुत मजेदार कमेंट Reddit पर आया—“पैसे की बचत में पाउंड गंवा बैठे!” (अर्थात ‘पैसे का बैलेंस, अक्ल का दिवाला’). कई पढ़ने वालों ने अपने-अपने दफ्तर के किस्से सुनाए—किसी ने कहा, “हमारे यहां तो ट्रेन का किराया होटल से ज्यादा निकल जाता था, लेकिन पॉलिसी के नाम पर ट्रेनों में घंटों काटने पड़ते।”
हमारे कहानी के हीरो ने भी आखिरकार कंपनी की “आंखें खोलने” की ठान ली। दोपहर का खाना खाने के बाद, बढ़िया टाइम देखकर ऑफिस निकल पड़े—ऐसे वक्त पर जब ट्रैफिक अपने चरम पर था। दो घंटे गाड़ी में बैठकर, सिर्फ 5-10 मिनट में डिवाइस उठाई और फिर वापस! ऑफिस का दो घंटे का कीमती समय गाड़ी में ही निकल गया। ऊपर से अगर पेट्रोल, गाड़ी की घिसाई और टाइम की कीमत जोड़ें, तो कंपनी को भेजने में जितना खर्च आता, उससे कहीं ज्यादा नुकसान हो गया।
पाठक बोले: “नीति के नाम पर मूर्खता”, “काम की जगह सड़क”, और “कंपनी को सबक”
Reddit पर लोगों ने खूब मजाक उड़ाया—“कंपनी सोचती है, पांच रुपये के कूरियर बचा लिए, लेकिन कर्मचारी को दो घंटे सड़क पर बिठा दिया!” एक ने तो यहां तक कह दिया, “हमारे यहां तो हर कर्मचारी को 60 पैसे प्रति किलोमीटर की पेट्रोल मनी मिलती है, वो भी मांग लेते।”
एक और कमेंट में भारतीय ऑफिस कल्चर की झलक दिखी—“अगर बॉस को पता चल जाए कि कर्मचारी दो घंटे ऑफिस टाइम में गाड़ी चला रहा है, तो तुरंत मीटिंग बुलाकर पूछ लेते—‘इतना समय क्यों बर्बाद किया?’”
और जो लोग HR पॉलिसी से जूझ चुके हैं, उन्होंने तो अपने-अपने किस्से शेयर किए—कभी सस्ते टिकट के चक्कर में पूरा दिन एयरपोर्ट में बिताना पड़ा, कभी ऑफिस के सस्तेपन ने कर्मचारियों को परेशान किया।
आखिरकार कंपनी को समझ आया: “समय की कीमत, पैसे से बड़ी”
कहानी का सबसे मजेदार मोड़ तब आया, जब कर्मचारी ने एक बार कंपनी की बात मानकर, नियम के अनुसार सड़क पर दो घंटे जाया किए। अब कंपनी को खुद समझ आ गया कि “सस्ता कूरियर” भेजने में जो खर्च आता, उससे कहीं ज्यादा नुकसान तो कर्मचारी के टाइम और प्रोडक्टिविटी का है। अगले ही हफ्ते कर्मचारी को फिर से डिवाइस “कूरियर” से भेजने की अनुमति मिल गई।
कई पाठकों ने सलाह दी—“अगर कंपनी आपको सड़क पर भेज रही है, तो पेट्रोल और पार्किंग का दावा जरूर करें, ताकि उन्हें समझ आए कि कर्मचारियों का समय भी कीमती है।”
निष्कर्ष: दफ्तर की नीति—“सब बराबर”, या “अक्ल से काम लो”?
हमारे यहां भी दफ्तरों में अक्सर यही होता है—नीति सब पर बराबर लागू करनी है, भले ही नुकसान ही क्यों न हो! लेकिन असल में, हर स्थिति अलग होती है। कभी-कभी “नीति” से हटकर “अक्ल” से काम लेना चाहिए—यही कहानी सिखाती है।
तो अगली बार जब आपकी कंपनी कोई बेमतलब की पॉलिसी थोपे, तो सोचिए—क्या वाकई इससे फायदा हो रहा है? या फिर किसी को सड़क पर भेजकर, काम की जगह ट्रैफिक में समय जाया हो रहा है?
अगर आपके साथ भी ऐसा कुछ हुआ हो, तो कमेंट में जरूर बताएं—क्योंकि भाई, हर ऑफिस में ऐसी “मूर्खतापूर्ण” नीतियों का अपना ही मजा है!
मूल रेडिट पोस्ट: If you won't ship to me because my drive is less than an hour, then I'll make it in an hour