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जब कचरे की बाल्टी वाली मैडम ने लाइन में सब्र खो दिया: एक मज़ेदार बदला

कभी-कभी ज़िंदगी हमें ऐसे मज़ेदार किस्से दे देती है, जो सुनकर खुद की हंसी छूट जाए। सोचिए, आप किसी दुकान की लंबी लाइन में खड़े हैं, सामने-पीछे लोग अपनी-अपनी खरीदारी में लगे हैं, और तभी कोई आपके इतने करीब आ जाए कि आपको लगे, “भैया, सांस तो लेने दो!” ऐसा ही कुछ हुआ Reddit यूज़र u/Choccymilk5125 के साथ, जब एक महिला अपनी भारी-भरकम कचरे की बाल्टी लेकर उनकी एड़ी के ठीक पास आकर खड़ी हो गई।

कहानी जितनी सीधी दिखती है, असल में उतनी ही हंसी-ठिठोली से भरी है। चलिए, जानते हैं इस अनोखी 'पेटी रिवेंज' की दास्तान, जिसमें बदला भी है, मज़ा भी और सीख भी!

लाइन में लगे-लगे बज गई कचरे की बाल्टी

अब ज़रा अपने आपको किसी दिल्ली के फेमस बाज़ार की लाइन में सोचिए—सब्र की परीक्षा चल रही है, एक-एक कदम बढ़ते जाना है। u/Choccymilk5125 भी ऐसे ही हार्डवेयर स्टोर में खड़े थे, जब पीछे एक महिला आई, उम्र चालीस के आसपास, हाथ में लोहे की बड़ी सी कचरे की बाल्टी जिसमें उसका खुद का सामान भरा था। महिला ने बाल्टी को इतनी जोर से नीचे पटका कि जैसे किसी मेले में ड्रम बज रहा हो—धड़ाम!

हमारे लेखक महाशय वैसे तो झगड़ा करने वालों में नहीं थे, बस बाल्टी की ओर और फिर महिला की ओर एक 'संकेत वाली' नज़र डाली। लेकिन मैडम बेपरवाह! बाल्टी वहीं की वहीं, इतनी नज़दीक कि लगता था जैसे एड़ी में बत्तीसी लग जाएगी। आगे बढ़ते ही, मैडम फिर से बाल्टी को उठाकर धड़ाम!—फिर से पीछे-पीछे।

'धीमी चाल' और छोटी-छोटी जीतें

अब यहाँ से असली मस्ती शुरू हुई। अगली बार लाइन आगे बढ़ी, लेखक ने सोचा, "क्यों न थोड़ा बदला लिया जाए?" तो उन्होंने खुद को धीमा कर लिया—एक कदम, फिर रुकना, फिर एक और छोटा कदम, फिर रुकना। हर बार महिला को अपनी भारी बाल्टी उठाकर फिर पटखनी देनी पड़ती। पाँच मिनट तक ये 'स्टेप-बाय-स्टेप' ड्रामा चलता रहा। लेखक ने पीछे मुड़कर देखा भी नहीं, बस चुपचाप अपने काम में लगे रहे और मैडम बार-बार बाल्टी उठाकर पटकती रहीं।

रेडिट कम्युनिटी में एक यूज़र ने लिखा, "कम से कम मैडम को आज जिम जाने की ज़रूरत नहीं पड़ी, 30 पाउंड की बाल्टी उठाकर अच्छी कसरत हो गई होगी!" वहीं एक और ने चुटकी ली, "लगता है मैडम को Space Invaders गेम बहुत पसंद है—हर बार लाइन में घुस पड़ना!"

निजी स्पेस की क़ीमत: भारतीय संदर्भ में

विदेशों में 'पर्सनल स्पेस' यानी व्यक्तिगत जगह को बहुत गंभीरता से लिया जाता है, लेकिन भारत में तो बस, लाइन का मतलब है 'जितना आगे घुस सको, उतना बेहतर'! बस, ट्रेन, या मंदिर की लाइन—हर जगह आपको कोई न कोई ऐसा मिल ही जाएगा जो आपके इतने करीब आ जाएगा कि लगता है, अभी तो गले ही मिल लेंगे।

ऐसे में Reddit के बाकी यूज़र्स के सुझाव बड़े मज़ेदार थे—
- एक ने लिखा, "अगर कोई बहुत पास आ जाए, तो ज़ोर से खांसी मारो, लोग खुद-ब-खुद दूर भागेंगे!"
- एक ने मज़ाकिया अंदाज़ में कहा, "अगर कोई पीछे-पीछे आ जाए, तो पलटकर पूछो, 'आप मेरे पति हैं या डॉक्टर? नहीं? तो ज़रा दूरी बनाएँ!'"
- एक ने तो यहाँ तक कह दिया, "कभी-कभी मैं जानबूझकर झुककर कुछ गिरा देती हूँ, ताकि पीछे वाला थोड़ा पीछे हो जाए—अगर गिरा भी दूँ तो हँसी-बज़ाक के साथ!"

भारत में भी जब कोई लाइन में घुसपैठ करता है, लोग या तो चुप रह जाते हैं या कोई हल्की-फुल्की नोकझोंक कर लेते हैं। लेकिन इस कहानी में लेखक ने बिना कुछ बोले, सिर्फ अपनी चाल बदलकर ही सामने वाली को परेशान कर दिया—इसे कहते हैं 'चुपचाप बदला'!

सबक: छोटी-छोटी हरकतें भी बड़ा असर कर सकती हैं

इस किस्से में न कोई तू-तू मैं-मैं, न बहसबाज़ी, फिर भी जो मज़ा आया, वो किसी हिंदी फिल्मी 'पेटी रिवेंज' से कम नहीं। ऐसे ही एक कमेंट में किसी ने लिखा, "कभी-कभी चुप रहकर भी अच्छे से बदला लिया जा सकता है।"

और सोचिए, अगर यही घटना हमारे देश में होती—हो सकता है कोई दादी बोल देती, "बेटा, जरा दूर खड़े हो जाओ, बुढ़ापे में हड्डियाँ कमज़ोर हैं!" या कोई युवक कह देता, "भाई, थोड़ा साँस लेने दो, कोरोना गया नहीं अभी!"

इस कहानी में असल जीत लेखक की थी—न कोई झगड़ा, न शोर-शराबा, बस अपनी चाल में इतना बदलाव कि सामने वाली को उसकी गलती का एहसास तक न हुआ और खुद लेखक की सुबह हँसी में बीत गई।

आपकी क्या राय है?

क्या आपके साथ भी कभी ऐसी कोई घटना हुई है जहाँ किसी ने आपकी निजी जगह का उल्लंघन किया हो? आप ऐसे लोगों से कैसे निपटते हैं—चुपचाप, मज़ाक में, या सीधा-सीधा बोलकर?
अपने अनुभव नीचे कमेंट में ज़रूर शेयर करें!

इस तरह की और मज़ेदार कहानियों के लिए जुड़े रहिए—क्योंकि रोज़मर्रा की ज़िंदगी के छोटे-छोटे पल भी बड़े किस्से बन सकते हैं!


मूल रेडिट पोस्ट: Garbage can lady doesn't understand personal space