जब ऑफिस मैनेजर ने ठग सप्लायर को उसी की चाल में मात दी
कहते हैं, "सावधानी हटी, दुर्घटना घटी" – और दफ्तर में अगर हिसाब-किताब की लापरवाही हो जाए, तो नुकसान लाखों का भी हो सकता है। आज की ये सच्ची घटना एक छोटे कंस्ट्रक्शन कंपनी की है, जहाँ एक नई-नवेली ऑफिस मैनेजर ने अपनी सूझबूझ से सालों पुरानी चोरी का पर्दाफाश कर दिया।
ईमानदारी बनाम पुराना सिस्टम – नयी मैनेजर की एंट्री
सात साल पहले, हमारी कहानी की नायिका को एक छोटी कंस्ट्रक्शन कंपनी में ऑफिस मैनेजर बनाया गया। पहली ही नजर में काम बड़ा ही उलझा हुआ था — पुराने मैनेजर ने न कोई ढंग का रिकॉर्ड रखा था, न तकनीकी जानकारी थी, बस जैसे-तैसे काम चल रहा था। नई मैनेजर को न तो सप्लायर का सिस्टम पता था, न इन्वेंटरी का। लेकिन उसकी खासियत थी – हर छोटी-बड़ी बात नोट करना।
जैसे ही उसने जॉइन किया, हर सप्लाई, हर सामान, हर बिल – सबकुछ रजिस्टर में दर्ज करने लगी। और यही आदत आगे जाकर कंपनी की किस्मत बदलने वाली थी। दो महीने होते-होते मालिक ने फरमान सुनाया – "अब हफ्ते में सिर्फ एक दिन ही चेक साइन होंगे।" मतलब, सप्लायर को शुक्रवार से अगले गुरुवार दोपहर तक का बिल जमा करना होगा, और शुक्रवार को ही पैसा मिलेगा। ये नियम देसी ठेकेदारों के लिए अजूबा था – यहाँ तो लोग दो दिन में पैसा पाने के आदी थे!
सप्लायरों का बवाल और एक चालाक धोखेबाज
अधिकतर सप्लायरों ने थोड़ा-बहुत बड़बड़ाया, पर मान गए। लेकिन एक सप्लायर को ये बहुत नागवार गुज़रा। उसने फोन कर-करके हंगामा मचाया, यहाँ तक कह डाला, "अब मैं उस मैनेजर से कभी बात नहीं करूँगा!"
मगर मैनेजर ने भी ठान लिया – "ठीक है, अब तुम्हारा काम मुझसे कभी नहीं होगा!" लेकिन असली खेल तो इसके बाद शुरू हुआ। उस सप्लायर की डिलीवरी में हमेशा गड़बड़ रहती – कागजों में 100 गज सामान आता दिखता, पर ग्राउंड पर स्टाफ को बार-बार और सामान मंगाना पड़ता। पहले तो नई मैनेजर को लगा, शायद स्टाफ ही ज्यादा इस्तेमाल कर रहा है या माप गलत है।
पोल खुली तो सब हैरान – चोरी भी, ऊपर से बदतमीजी भी!
एक दिन मैनेजर ने अपने पसंदीदा सप्लायर से बात की – क्या वो वही सामान ला सकता है? जब उसने कीमत सुनी, तो बोला, "भाई, इतना सस्ता तो कोई ला ही नहीं सकता। वो सप्लायर झोल कर रहा है।" उसने बताया, "उसका ट्रक 20 गज से ज्यादा ले ही नहीं सकता, और तुमसे 45 गज का बिल बना रहा है? कभी वेट स्लिप ली?"
यहाँ एक कमेंट याद आता है – "हमेशा जितना सामान लिया है, उतना ही पेपर पर साइन करो, और जितने पेपर पर साइन किए हैं, उतना ही सामान लो।" हमारे यहाँ भी कई दफ्तरों में यही हाल है – बस भरोसे पर ही चेक कट जाता है!
खैर, पसंदीदा सप्लायर ने असली वेट स्लिप मँगवाई – और पोल खुली! हर बार सिर्फ 20 गज सामान आता, बिल 45 गज का बनता! सालों से ये खेल चल रहा था। पहले ऑफिस मैनेजर की लापरवाही (या मिलीभगत? एक कमेंटर ने शक भी जताया!) और सबकी आंख मूंद कर काम करने की आदत ने कंपनी को लाखों का चूना लगवा दिया था।
ईमानदारी और होशियारी की जीत
मैनेजर ने नया सप्लायर चुना, पुराने ठग के लिए दरवाजे बंद कर दिए। अब वो सप्लायर बार-बार फोन करता, मगर जवाब मिलता – "ऑफिस मैनेजर से ही बात करो।" उसने खुद कहा था, अब कभी बात नहीं करेगा – तो उसकी मुराद पूरी कर दी!
इस घटना के बाद कंपनी ने अपने सिस्टम में कई बदलाव किए – अब सिर्फ भरोसा नहीं, पूरा हिसाब-किताब, वेट स्लिप, इन्वेंटरी क्रॉस-चेकिंग, और बड़ी कंपनियों के साथ काम। एक कमेंटर ने मजेदार बात कही – "अगर कोई आपको ठग रहा है, तो कम से कम उसे नाराज मत करो, वरना पकड़े जाओगे!" यही यहां हुआ।
एक और कमेंटर ने लिखा – "इन्वेंटरी मैनेजमेंट अपने आप में एक करियर फील्ड है!" सही बात है, आजकल की कंपनियाँ JIT (Just In Time) सिस्टम अपनाती हैं, ताकि जितना चाहिए उतना ही माल आए, बाकी गोदाम में धूल न खाए।
निष्कर्ष: सीख – नज़र रखो, दिमाग चलाओ!
इस कहानी में एक सीधी बात छिपी है – चाहे दफ्तर छोटा हो या बड़ा, ईमानदारी और सतर्कता सबसे जरूरी है। पैसे का हिसाब-किताब, सप्लायर का रिकॉर्ड, और हर पेमेंट प्रूफ – सब कुछ पक्का होना चाहिए। वरना, कोई चालाक सप्लायर आपको भी ऐसे ही चूना लगा सकता है। और हाँ, कभी-कभी ‘बदतमीजी’ करने वाले खुद ही अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार लेते हैं!
आपके ऑफिस में भी ऐसी कोई अजीब घटना हुई है? या कभी किसी ठग सप्लायर से सामना हुआ हो? नीचे कमेंट में जरूर बताइए – आपकी कहानी भी किसी को सीख दे सकती है!
मूल रेडिट पोस्ट: You're right, you are never working with me again.