जब ऑफिस के गुस्सैल बाबू को मिले अजीब स्टिकर: छोटी-सी शैतानी, बड़ी राहत!
ऑफिस या गोदाम में काम करने वाला हर कोई जानता है – वहां एक ऐसा शख्स जरूर होता है जिसका मूड हमेशा गरम रहता है और जो खुद को बॉस से कम नहीं समझता। हम सबने किसी न किसी ‘गुरुजी’ या ‘बड़े बाबू’ जैसे किरदार को झेला ही है, जो हर बात में टांग अड़ाते हैं, दूसरों पर रौब झाड़ते हैं और नियम अपने हिसाब से तोड़ते-मरोड़ते हैं। आज की कहानी भी ऐसे ही एक ‘मिस्टर झक्की’ की है, जिसे उसकी आदतों का अनोखा और बड़ा मजेदार जवाब मिला – वो भी सिर्फ अजीब और बेकार से दिखने वाले स्टिकर के ज़रिए!
गोदाम के मिस्टर झक्की: हर जगह अपनी चलाने वाले
हमारे नायक एक बड़े गोदाम में काम करते थे, जहां हर शिफ्ट में लोगों का आना-जाना लगा रहता था। वहां एक ‘मिस्टर झक्की’ थे – 20 साल से जमे हुए, बॉस के खास और पूरी कोशिश करते कि उनकी हर ‘सुपारी’ मानी जाए। वो न सिर्फ अपने सीनियर होने का रौब झाड़ते, बल्कि जाति, धर्म और LGBTQ+ लोगों के खिलाफ अपनी घटिया राय जाहिर करने से भी बाज़ नहीं आते। ऊपर से वो ऐसे ‘साफ-सफाई के दीवाने’ (गर्मफोब) थे कि अपनी मशीन को हर दिन आधा घंटा साफ करते, ताकि कोई और उसे छू भी न सके।
मशीनें सीमित थीं, लेकिन मिस्टर झक्की ने अपनी मशीन को ‘अपना किला’ बना लिया था। बाकी लोग मजबूरी में जब उसे इस्तेमाल करते, तो उन्हें उनकी नाराज़गी झेलनी पड़ती। काम का माहौल उनके कारण अक्सर बोझिल हो जाता था, जैसे किसी सरकारी दफ्तर में बैठा कोई बाबू जो हर फाइल पर अपनी मुहर जरूरी समझता है।
छोटी-सी शैतानी का बड़ा असर: अजीब स्टिकर का खेल
कहते हैं, “जहां बात नहीं बनी, वहां थोड़ा मजाक जरूरी है!” हमारे नायक की गर्लफ्रेंड शिक्षिका थीं और उनके पास बच्चों के लिए कई तरह के स्टिकर थे – कुछ इतने अजीब कि कोई समझ ही न पाए कि किसलिए बने हैं! जैसे डांस करते चिप्स के साथ गुआकामोले या बिल्ली का चेहरा लगी चिकन विंग। एक दिन जब मिस्टर झक्की की बातों से नायक परेशान होकर घर पहुंचे, तो गर्लफ्रेंड ने सलाह दी – “क्यों न उनके गर्मफोब नेचर का फायदा उठाओ? रोज़ उनकी मशीन पर एक अजीब स्टिकर चिपका दो।”
बस फिर क्या था! हर सुबह, मिस्टर झक्की के आने से पहले, एक नया विचित्र स्टिकर उनकी मशीन की एक ही जगह पर चिपका दिया जाता। मिस्टर झक्की आते, उसे गुस्से से हटाते, मशीन को सैनेटाइज़ करते, और रोज़ ये सिलसिला चलता रहा। दो महीने तक ये छोटी-सी शरारत ऐसे ही चलती रही – नायक और उनके दोस्त हर सुबह मन ही मन ठहाके लगाते, और मिस्टर झक्की अपना माथा पीटते रहते।
जब पूरी टीम बनी ‘स्टिकर गैंग’ और मिस्टर झक्की हुए परेशान
धीरे-धीरे, ये ‘स्टिकर चिपकाने की रस्म’ पूरी टीम का फेवरिट टाइमपास बन गई। एक दिन नायक ने देखा कि मिस्टर झक्की अपने ऑफिस फ्रेंड (‘वर्क हस्बैंड’, यानी सबसे अच्छा ऑफिस दोस्त) से गुस्से में बहस कर रहे थे – “हर शिफ्ट कोई न कोई मेरी मशीन पर ये पागल स्टिकर लगा देता है!” जब सच सामने आया कि ये माजरा दरअसल नायक और उनके दोस्तों का था, तो सभी पेट पकड़कर हंस पड़े।
एक मजेदार मोड़ तब आया जब मिस्टर झक्की ने एक नोट भी लगा दिया – “स्टिकर लगाना बंद करो, अब हद हो रही है!” लेकिन शरारती टोली ने उस नोट पर भी एक और अजीब स्टिकर चिपका दिया – “धीरे-धीरे मांस खाओ, अच्छा जीवन जियो!” (जैसा एक कमेंट में किसी ने कहा, “ये स्टिकर तो जैसे हिंदी फिल्मों के डायलॉग हो गए – बिना मतलब मगर मजेदार!”)
जब अजीब स्टिकर ने मिस्टर झक्की को ‘पगला’ दिया
छह महीने तक जब ये सिलसिला चलता रहा, मिस्टर झक्की का पारा सातवें आसमान पर था। एक दिन वो इतने परेशान हो गए कि सारे उतारे हुए स्टिकर एक बड़े कार्डबोर्ड पर चिपकाकर ‘स्टिकर म्यूरल’ बना लिया (सोचिए, जैसे हमारे गांवों के स्कूलों में बच्चों की ड्राइंग का बोर्ड)! उन्होंने गुस्से में सबको दिखाया – “देखो, ये सब किसकी करतूत है!” असल में, छोटे-छोटे स्टिकर के जरिए मिस्टर झक्की को ‘मानसिक हलचल’ का सामना करना पड़ा।
लेकिन असली ट्विस्ट तब आया जब मिस्टर झक्की ने इसका सारा दोष ऑफिस के एक ट्रांसजेंडर सहकर्मी पर मढ़ दिया। उनकी घृणास्पद बातें सुनकर नायक और भी नाराज़ हो गए। तब उन्होंने और पक्के इरादे के साथ, ऐसे दिन चुने जब वो ट्रांसजेंडर सहकर्मी ड्यूटी पर न हों – ताकि मिस्टर झक्की और उलझ जाएं कि ‘आखिर ये कर कौन रहा है!’ (एक कमेंट में किसी ने सही कहा – “धीरे-धीरे पागल बना दिया!”)
अंतिम ठहाका: जब सच सामने आया
छह महीने बाद आखिरकार नायक ने सच कबूल किया। मिस्टर झक्की का चेहरा देखना ही बनता था – एक साथ धोखा, राहत और गुस्सा! पूरी टीम ने फिर हंसते-हंसते इसे अपनी ‘ऑफिस की सबसे यादगार शरारत’ मान लिया। एक कमेंट में किसी ने लिखा – “यही तरीका है, ऐसे लोगों को उनकी ही भाषा में जवाब देना चाहिए। हिम्मत है तो सामने आओ!”
एक यूज़र ने मजेदार टिप्पणी की – “भाई, ये स्टिकर तो जैसे हिंदी फिल्मों के विलेन के लिए ‘चिट्ठी बम’ बन गए।” वहीं, एक और ने कहा – “ऐसे लोग खुद ही अपने जाल में फँस जाते हैं। क्या खूब बदला लिया!”
आपकी सोच: क्या ऐसी शरारतें जरूरी हैं?
कभी-कभी, ऑफिस की टेंशन दूर करने के लिए ऐसी ‘शरारतें’ जरूरी होती हैं, खासकर जब कोई व्यक्ति अपनी हरकतों से सभी का जीना मुश्किल बना दे। स्टिकर की ये कहानी दिखाती है कि बिना किसी बड़े झगड़े के, हल्की-फुल्की शरारत से भी किसी घमंडी को सबक सिखाया जा सकता है। आखिर, “लोहा लोहे को काटता है”, और “जैसी करनी वैसी भरनी” – ये कहावतें ऑफिस की राजनीति में भी सटीक बैठती हैं।
अगर आपके ऑफिस में भी कोई ऐसा ‘मिस्टर झक्की’ है, तो आप क्या करेंगे? क्या आप भी कभी इस तरह की शरारत का हिस्सा रहे हैं? अपने अनुभव नीचे कमेंट में जरूर शेयर करें – कौन जाने, अगली कहानी आपकी ही हो!
मूल रेडिट पोस्ट: Being a jerk? Here. Have a sticker :)