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जब एक सहयोगी ने खुद को राजा समझा, और बाकी ने उसे उसकी औकात दिखा दी!

एक महिला की सिनेमा जैसी छवि, जो एक पुरुष से प्रतिशोध की योजना बना रही है, एक छोटी प्रतिशोध की कहानी से प्रेरित।
मैरी और टॉड की नाटकीय कहानी में डूब जाएं, जहां वह एक असली बेशर्म के साथ अपने संघर्ष का सामना करती है। इस प्रतिशोध की नई कहानी में उलटफेर और मोड़ खोजें, जिसे आपने सभी ने मांगा है!

कभी-कभी ऑफिस या बिजनेस में ऐसे लोग मिल जाते हैं, जो खुद को सबका बॉस समझ बैठते हैं, भले ही उनकी पोस्ट हो या न हो। ऐसे लोगों की बातें सुनकर लगता है जैसे वो अपने आपको घर का राजा और बाकियों को नौकर-चाकर समझ बैठे हैं। आज की कहानी भी एक ऐसे ही 'राजा बाबू' की है, जिसने अपने दो साथियों को हल्के में लिया, लेकिन उन दोनों ने मिलकर उसे ऐसा सिखाया कि वो महीनों तक अपने कपड़े धोने के लिए तरसता रहा!

कहानी की शुरुआत – 'राजा बाबू' का घमंड

ये किस्सा है मैरी, मेगन और टॉड (नाम बदले गए हैं) का, जो एक साथ बिजनेस करते हैं। वैसे तो तीनों के अपने-अपने घर हैं, लेकिन काम के चलते साल में आठ महीने सड़कों पर घूम-घूमकर रहते हैं। जैसे हमारे देश में कुछ लोग अपने व्यापार के लिए शहर-शहर घूमते हैं, वैसे ही ये लोग भी चलते-फिरते रहते हैं।

अब हुआ यूं कि एक दिन टॉड ने अपने अहंकार की झलक दिखा दी। उस दिन उसने बड़े ही घमंडी लहजे में मैरी से कहा, "मुझे तो बहुत काम है, मैं कपड़े धोने जैसे छोटे-मोटे कामों के लिए साइट से बाहर नहीं जाऊंगा। ये सब काम तुम ही कर लेना!" मानो उसने कह दिया हो, "मैं तो राजा हूं, ये छोटे-मोटे काम मेरे लिए नहीं!" उसका इशारा साफ था कि मेगन और मैरी तो बस फुर्सत में बैठे हैं, असली मेहनत तो वही करता है।

बदले की तैयारी – जुगाड़ु भारतीय स्टाइल

अब मैरी और मेगन कोई कमजोर तो थीं नहीं। मेगन ने आंख मारी और दोनों ने मिलकर एक जोरदार प्लान बना डाला। अगले ही दिन दोनों बाजार निकलीं। उन्होंने सोचा, "क्यों न कपड़ों की इतनी खरीदारी कर ली जाए कि महीने भर कपड़े धोने की जरूरत ही न पड़े?" अब ये आइडिया कुछ वैसा ही था, जैसे हमारे यहां शादी-ब्याह के मौसम में मम्मी बाजार से दस-दस जोड़ी कपड़े खरीद लाती हैं, ताकि बार-बार धोने की टेंशन न रहे!

दोनों ने विक्टोरिया सीक्रेट और ओल्ड नेवी जैसी दुकानों से इतने अंडरगारमेंट्स और कपड़े खरीद लिए कि आठ-दस हफ्ते आराम से निकल जाएं। अब टॉड सोचता रहा कि कपड़े धोना किसका काम है, लेकिन यहां तो खेल ही बदल चुका था!

'राजा बाबू' की असलियत – जब खुद पर आई तो होश ठिकाने आ गए

कुछ दिन बाद टॉड फिर आया, बोला – "आज कपड़े धोने जा रही हो क्या?" मैरी बोली, "नहीं, अभी तो कपड़े हैं!" टॉड के चेहरे पर वही भाव, जैसे किसी बच्चे का खिलौना छीन लिया हो। कुछ दिन और बीते, तो टॉड मेगन से बोला – "मेरी चड्डी और मोज़े तो खत्म होने वाले हैं, उसे बोलो कपड़े धो आए!" मेगन मुस्कुराकर बोली, "मुझे तो अभी जरूरत नहीं, और मैरी की भी वर्कशॉप में जरूरत है।"

ऐसा महीने भर चलता रहा। टॉड रोज नई फरियाद लेकर आता, और दोनों बहनों की तरह मुस्कुराकर टाल देतीं। आखिरकार, जब टॉड की हालत ऐसी हो गई कि उसके पास पहनने को कुछ नहीं बचा, तब वो खुद ही अपना झोला उठाकर कपड़े धोने भागा। मज़े की बात – एक कमेंट में किसी ने लिखा, "लगता है टॉड ने अपनी अंडरवियर को उल्टा-सीधा पहनकर महीने भर निकाल दिया!"

पाठकों की प्रतिक्रिया – क्या सीख मिली?

रेडिट पर इस कहानी पर मज़ेदार रिएक्शन आए। एक पाठक ने लिखा, "क्या इसका असर हुआ, या टॉड अब भी वही पुरानी हरकतें करता है?" खुद 'मेगन' (कमेंट्स में) बताती हैं – "नहीं जी, टॉड तो अगले कई सालों तक और भी बुरा होता गया। हमारे पास ऐसी दस साल की कहानियाँ हैं!"

एक और पाठक ने चुटकी ली, "कभी उससे पूछना था, क्या उसकी मम्मी भी साथ आएंगी, ताकि वो 'बड़े भैया' का काम कर सकें?" एक महिला पाठक ने लिखा, "मैं तो अपने पति के अंडरवियर भी नहीं धोती, बच्चों को भी खुद सिखा दिया है... अगर आठ साल का बच्चा ये कर सकता है, तो पचपन साल का टॉड क्यों नहीं?"

कुछ लोगों ने तो यहां तक कहा कि अपने काम खुद करना हर किसी की जिम्मेदारी है, और ऐसे आलसी लोग हर जगह मिल जाते हैं – चाहे भारत हो या अमेरिका। किसी ने लिखा, "हमारे यहां भी ऐसे 'राजा बाबू' खूब हैं, जिन्हें लगता है कि बाकी सब उनके सेवक हैं!"

भारतीय संदर्भ – दफ्तर और घर की राजनीति

भारत में भी दफ्तरों और परिवारों में ऐसे लोग मिल जाते हैं, जो दूसरों पर अपना काम थोपने की कोशिश करते हैं। कभी-कभी सास-बहू के बीच, कभी बॉस-इंप्लॉई में, तो कभी पार्टनरशिप में भी ऐसा ही होता है। ऐसे में 'पेटी रिवेंज' यानी छोटी-छोटी बदले की कहानियां बहुत सुकून देती हैं।

जैसे हमारे यहां कहावत है – "अक्ल ठिकाने आ जाती है जब खुद पर आती है!" टॉड को भी वही सबक मिला। इस कहानी ने ये भी दिखा दिया कि महिलाओं को कम आंकना भारी पड़ सकता है – चाहे ऑफिस हो या घर।

निष्कर्ष – आपकी राय?

तो दोस्तों, बताइए – क्या आपके ऑफिस या घर में भी कोई ऐसा 'टॉड' है, जो खुद को सबसे ऊपर समझता है? आपने उसे कैसे सबक सिखाया? या कोई मजेदार अनुभव हो, तो कमेंट में जरूर बताइए।

ऐसी और कहानियां पढ़ना चाहते हैं? तो हमें फॉलो करें और शेयर करें! याद रखें – अपनी हद में रहना ही सबसे अच्छा है, वरना कभी-कभी चड्डी और मोज़े भी धोने पड़ सकते हैं!


मूल रेडिट पोस्ट: More revenge