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जब 'ईमेल नहीं मिला' बना होटल कर्मचारी के लिए सिरदर्द – एक मज़ेदार किस्सा

काम के दौरान शुक्रवार रात को फंसी, एक अभियान की तैयारी कर रहा एनीमे पात्र।
शुक्रवार रात को काम में फंसी, हमारी नायिका गबी एक रोमांचक अभियान की तैयारी कर रही है—बस एक और दिन जब चीजें योजना के अनुसार नहीं चलतीं! इस जीवंत एनीमे चित्रण का आनंद लें जो अप्रत्याशित पलों की हास्यात्मकता को दर्शाता है।

शुक्रवार की रात, जब ज़्यादातर लोग घर में बैठकर चाय की चुस्कियों के साथ फिल्म देख रहे होते हैं, कुछ लोग होटल के रिसेप्शन पर भी ड्यूटी कर रहे होते हैं। हमारे आज़ के किस्से का हीरो भी ऐसे ही एक होटल कर्मचारी हैं, जिन्हें शुक्रवार की ड्यूटी मानो 'मनहूसियत की रात' जैसी लगती है। और इसी रात उनकी मुलाकात होती है एक ऐसे बुज़ुर्ग मेहमान से, जिनकी तर्कशक्ति ने इंटरनेट के पन्नों पर सबको हँसा दिया।

जब कॉल आई और कहानी ने करवट बदली

शुरुआत में सब सामान्य था। कर्मचारी साहब अपने अगले गेम कैम्पेन के लिए 'गैबी' नाम की कैरेक्टर बना रहे थे, जिनके पिता पिछले कैम्पेन में विलेन रह चुके हैं – अब आप सोच सकते हैं कैसे गेमर लोग अपनी असल ज़िंदगी में भी कहानियों की बुनाई में लगे रहते हैं।

इसी बीच फोन बजता है। उधर से एक बुज़ुर्ग सज्जन—जिन्हें हम 'ओल्ड मैन' कहेंगे—पूछते हैं, "क्या आप वो होटल हैं जो हाईवे के पास है?" जवाब मिलता है, "जी, यही होटल है, कैसे मदद करूं?" बुज़ुर्ग कहते हैं, "मुझे अपनी आज की बुकिंग कैंसल करनी है।" कर्मचारी झट से नाम लेकर बुकिंग रद्द कर देते हैं।

पर कहानी यहीं खत्म नहीं होती!

कैंसलेशन पॉलिसी – हर होटल का नियम

बुकिंग कैंसल होते ही बुज़ुर्ग पूछते हैं, "अब क्या मुझसे पैसे कटेंगे?" कर्मचारी साहब अंदर-ही-अंदर सोचते हैं, 'लीजिए, अब असली मज़ा आएगा।' बड़ी विनम्रता से जवाब देते हैं, "हमारी 48 घंटे की कैंसलेशन पॉलिसी है, तो आज की बुकिंग कैंसल करने पर चार्ज लगेगा।"

बुज़ुर्ग बोले, "जिस लड़की ने बुक किया था, उसने कहा था कोई चार्ज नहीं लगेगा!" कर्मचारी मुस्कराते हुए बोले, "सर, ऐसा कोई नोट नहीं है।"

बुज़ुर्ग ने बात आगे बढ़ाई, "कोई और है जिससे बात करूं? कोई मैनेजर?" कर्मचारी बोले, "शाम को मैनेजर आएंगे, उनसे बात कर सकते हैं।"

'ईमेल नहीं आया' – नया तर्क, नया सिरदर्द

बीस मिनट बाद फिर फोन बजता है। अब बुज़ुर्ग बड़ी जीत की मुद्रा में कहते हैं, "मुझे तो ईमेल ही नहीं मिला, तो मेरी बुकिंग थी ही नहीं! आप मुझसे चार्ज नहीं ले सकते।"

जैसे भारतीय घरों में बच्चे होमवर्क ना करने पर कहते हैं, “कॉपी ही नहीं मिली थी”, वैसे ही यहाँ बुज़ुर्ग ने बुकिंग ही न मानने का तर्क दे मारा। कर्मचारी साहब हँसी रोकते हुए बोले, "सर, हमारे सिस्टम में आपकी बुकिंग थी, कार्ड भी है, और पॉलिसी के अनुसार चार्ज भी।"

बुज़ुर्ग अड़े रहे, "नहीं! ईमेल नहीं तो बुकिंग नहीं।" कर्मचारी बोले, "सर, आपके कार्ड से ऑफिशियली चार्ज हो चुका है।" बुज़ुर्ग बोले, "मैनेजर से बात करूंगा, नहीं माने तो कॉर्पोरेट और फिर अखबारों में खबर छपवाऊंगा।"

सोचिए, अगर हर बार जब ग्राहक का मन न माने, वो “अखबारों” को धमकी देने लगे, तो अगले दिन के हेडलाइन क्या होंगे – 'होटल ने चार्ज किया, बुज़ुर्ग नाराज़!'

कम्युनिटी की राय – हँसी, तंज और बचपन की यादें

रेडिट पर इस किस्से को सुनकर लोगों ने खूब मज़ेदार टिप्पणियाँ कीं। एक ने लिखा, "अरे, क्या उन्होंने होटल को पोस्ट से बुकिंग की कॉपी के लिए SASE (Self Addressed Stamped Envelope) भेजा था? और साथ में ग्रेप-नट्स सीरियल के डिब्बे के बॉक्स टॉप्स भेजे?" भारतीय संदर्भ में सोचिए, अगर होटल बुकिंग की पावती पाने के लिए ग्राहक से दो डाक टिकट और परचून के बिल की कॉपी माँगने लगे!

एक और कमेंट में लिखा गया, "अगर बुकिंग नहीं थी, तो फोन क्यों किया कैंसल करने के लिए?" बिल्कुल, ये वैसा ही है जैसे कोई शादी में खाना खाकर बाद में कहे – 'मैं तो आया ही नहीं था।'

कुछ लोगों ने अपने अनुभव भी साझा किए – एक ने बताया, कैसे उन्होंने दो होटल बुक कर लिए थे, पर ईमेल न मिलने का बहाना बनाना तर्क नहीं बनता। और एक ने यह भी कहा, "हर होटल की अपनी पॉलिसी होती है, उसे पढ़ना चाहिए।"

भारतीय संदर्भ – ग्राहक हमेशा राजा, लेकिन नियम भी ज़रूरी

हमारे देश में अक्सर ग्राहक को 'भगवान' मान लिया जाता है। लेकिन क्या वाकई हर बात में ग्राहक सही होता है? होटल, रेस्तरां या किसी भी सेवा में नियमों का महत्व उतना ही है जितना ग्राहक संतुष्टि का। अगर हर व्यक्ति अपनी सुविधा अनुसार नियम तोड़ने लगे, तो व्यवस्था का क्या होगा?

यह कहानी हमें मज़ेदार अंदाज़ में सिखाती है कि होटल कर्मचारी कितनी धैर्य और समझदारी से ऐसे 'तर्कशास्त्री' ग्राहकों का सामना करते हैं। और कभी-कभी, नियमों की किताब ही सबसे बड़ा हथियार होती है।

निष्कर्ष – आपकी क्या राय है?

क्या आपके साथ भी कभी ऐसा अजीबो-गरीब ग्राहक या अधिकारी से सामना हुआ है, जिसने नियमों को अजीब तर्क से तोड़ने की कोशिश की हो? नीचे कमेंट में ज़रूर बताइए। और अगली बार जब आप होटल बुक करें, तो ईमेल, SMS या कॉल – जो भी मिले, उसकी पावती संभाल के रखें। क्योंकि नियम सबके लिए समान हैं, और होटल वाले भी इंसान होते हैं, मशीन नहीं!

अगर आपको यह किस्सा पसंद आया, तो शेयर करें – क्या पता, अगली बार किसी 'ईमेल नहीं मिला' वाले किस्से में आपका नाम भी आ जाए!


मूल रेडिट पोस्ट: I didn't get an email.