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जब अतिथि ने होटल के बंद रेस्तरां को खुलवाने की ज़िद की – बारिश, सलाद और ‘मैं ही ब्रह्मांड हूँ’ सिंड्रोम!

मंद रोशनी में खाली रेस्तरां का आंतरिक दृश्य, बंच सेवा के बाद की शांति दर्शाता है।
बंच के बाद हमारे रेस्तरां का शांत नज़ारा, मेहमानों का स्वागत करने वाला सुखद वातावरण—रविवार की रात के खाने तक!

होटल में काम करने वालों की ज़िंदगी बड़ी रंगीन होती है – रोज़ नए चेहरे, नए नखरे और कभी-कभी ऐसे मेहमान, जो खुद को धरती का राजा समझ बैठते हैं। ऐसे ही एक वाकये की चर्चा आज Reddit पर छिड़ी, जिसमें एक गेस्ट ने होटल कर्मचारी की परीक्षा ही ले ली! सोचिए, अगर आपके होटल का रेस्तरां रविवार को 3:30 बजे बंद हो जाए, और कोई मेहमान शाम को आकर कहे – “मुझे तो अब खाना ही है, खोलो रेस्तरां!” तो आप क्या करेंगे?

“रेस्तरां बंद है? मुझे तो आज ही खाना है!”

इस पूरी घटना की शुरुआत होती है एक होटल में, जहाँ नियम बड़ा साफ़ था – हर रविवार दोपहर के बाद रेस्तरां बंद हो जाता है। चेक-इन के समय भी यह बता दिया जाता, वेबसाइट पर भी लिखा है, और फ्रंट डेस्क भी दोहराता है। लेकिन शाम के साढ़े पाँच बजे एक मेहमान नीचे आईं और पूछा, “रेस्तरां में कोई क्यों नहीं है?”

फ्रंट डेस्क वाले ने शांति से जवाब दिया, “मैडम, आज ब्रंच के बाद रेस्तरां बंद हो गया है, अगला नाश्ता कल सुबह 7 बजे से मिलेगा।” बस, फिर क्या था! उन्हें गुस्सा आ गया – “मैं तो इसी होटल में इसलिए रुकी थी कि यहाँ का खाना खा सकूं! कल तो घूमने निकल गई थी, आज तो खाना ही है!”

फ्रंट डेस्क की विनम्रता – “कल सुबह ब्रेकफास्ट खुला होगा, तब आइएगा।” लेकिन मैडम का कहना – “ये तो बिल्कुल गलत है! क्या कोई रसोइया अभी भी है, जो मेरे लिए खाना बना सके? बाहर बारिश हो रही है!”

“सलाद तो कोई भी बना सकता है!”

फ्रंट डेस्क वाले ने समझाया कि सारे रसोइये जा चुके हैं। लेकिन मेहमान मानी नहीं – “मुझे यकीन है, कोई न कोई होगा! मैनेजर को बुलाओ! मुझे सिर्फ़ एक सिंपल सलाद चाहिए।”

अब यहाँ एक कमेंट की याद आती है – “ऐसे लोग दुकान के सामने लगे समय के बोर्ड को भी अनदेखा कर देते हैं, और बार-बार दरवाज़ा खटखटाते हैं!” एक और मज़ेदार कमेंट था – “अगर बारिश में भी वो बाहर जातीं तो लगता कहीं गल न जाएँ!” (किसी ने चुटकी ली कि शायद वह चीनी से बनी हैं, पानी में घुल जाएँगी।)

मैनेजर आए, वही बात समझाई – रेस्तरां बंद है, लेकिन आपकी असुविधा के लिए नाश्ते का कूपन फ्री में मिल जाएगा। मैडम ने आँखें घुमा दीं और ऊपर चली गईं। यहाँ कई पाठकों ने लिखा – “गलत व्यवहार करने वालों को इनाम क्यों देते हो? इससे तो और बढ़ावा मिलता है!”

“डिलीवरी भी गुम, दोष भी होटल का!”

अब कहानी में ट्विस्ट आया। एक घंटे बाद मैडम ने फोन किया – “मेरा खाना डिलीवर होगा, आप ऊपर पहुँचा देना।” फ्रंट डेस्क ने हामी भर दी। लेकिन खाना आया ही नहीं! फिर फोन – “तुमने मेरा खाना चुरा लिया!” असल में, मैडम ने खुद ही गलत एड्रेस डाल दिया था।

अब वो चाहती थीं कि होटल का कर्मचारी बारिश में बाहर जाकर उनका खाना ढूंढे! जवाब मिला – “माफ़ कीजिए, मुझे डेस्क पर ही रहना है।” मैडम बोलीं – “लेकिन बारिश हो रही है!” आखिरकार 10 मिनट बाद मैडम खुद छाता लेकर निकलीं, खाना ढूंढकर आईं, फिर भी आँखें घुमाईं और ऊपर चली गईं।

यहाँ एक कमेंट ने बड़ा तगड़ा व्यंग्य किया – “अगर बारिश में गल ही जातीं तो दुनिया को बड़ा अजूबा दिखता!” किसी ने लिखा – “ऐसे लोग हमेशा दूसरों को दोष देते हैं, खुद की गलती कभी नहीं मानते।”

“मैं ब्रह्मांड का केंद्र हूँ” सिंड्रोम

इस घटना को पढ़ते हुए भारतीय पाठकों को भी कई किस्से याद आए होंगे – जैसे शादी-ब्याह में लोग पंडित जी से कहते हैं, “भोजन जल्दी खिलवा दो, हमारे घर जाना है!” या मेला-हाट में कोई दुकानदार से सामान उठवाने की जिद करे। Reddit के एक यूज़र ने बहुत सही लिखा – “कुछ लोग समझते हैं कि सभी लोग बस उन्हीं के लिए दुनिया में मौजूद हैं, बाकी सबका कोई काम-धंधा नहीं!”

एक और कमेंट था – “ऐसे लोगों को फ्री कूपन देकर होटल मैनेजमेंट ने इन्हें और बिगाड़ दिया। अगले बार ये और ज्यादा हंगामा करेंगे।” यह बात भारतीय संस्कृति में भी लागू होती है – अगर बदतमीज़ी का इनाम मिलता है, तो समाज में अनुशासन कैसे आएगा?

“बंद का मतलब बंद – इसमें बहस क्यों?”

होटल, दुकान, दफ्तर – कहीं भी “बंद” का मतलब “बंद” ही होता है। लेकिन कुछ मेहमान, ग्राहक या “अतिथि देवो भव:” को गलत समझने वाले, नियमों को अपने लिए बदलवाने की कोशिश करते हैं। Reddit की चर्चा में भी बहुतों ने कहा – “अगर आपको समय पता नहीं है तो गुस्सा खुद पर कीजिए, दूसरों पर नहीं।” कईयों ने सलाह दी – “यात्रा में हमेशा थोड़ा स्नैक्स साथ रखें, वरना भूखे रहना पड़ सकता है!”

यह वाकया होटल इंडस्ट्री ही नहीं, हर सर्विस लाइन वालों की कहानी है – कभी ग्राहक की मनमानी, कभी ‘मैं ही वीआईपी’ वाली सोच। लेकिन आखिर में, जैसे एक पाठक ने लिखा – “अगर बारिश में खाना लेने जाना इतना बुरा लग रहा था, तो क्या होटल वाला भीगकर लाएगा?”

निष्कर्ष: आपके साथ भी कुछ ऐसा हुआ है?

यह कहानी मज़ेदार है, लेकिन सोचने वाली भी है – क्या हम कभी खुद को दूसरों से ऊपर समझ लेते हैं? क्या हमें नियमों का सम्मान करना चाहिए, या अपनी सुविधा के लिए उन्हें तोड़वाना चाहिए?

कमेंट सेक्शन में बताइए – क्या आपके साथ कभी किसी ग्राहक या मेहमान ने ऐसी अजीब मांग की है? या आपने खुद कहीं पर नियमों को लेकर बहस की हो? अपनी राय और किस्से ज़रूर साझा करें!

अंत में बस यही कहेंगे – “अतिथि देवो भव:” ज़रूर, लेकिन अतिथि भी इंसानियत और नियमों की कद्र करे, तभी होटल, दुकान और समाज – सबका माहौल खुशहाल रहता है!


मूल रेडिट पोस्ट: Guest asked me to open restaurant when it was closed.