जब 'अगर पसंद नहीं तो निकाल दो!' बोलना भारी पड़ गया – एक नौसेना की सच्ची कहानी
सरकारी दफ्तरों या बड़ी कंपनियों में आपने भी ऐसे कुछ लोग जरूर देखे होंगे, जो खुद को सबसे ऊपर समझते हैं। ऐसे लोग अक्सर सोचते हैं कि उनके बिना तो ऑफिस चल ही नहीं सकता। लेकिन क्या होता है जब किसी की अकड़ खुद पर ही भारी पड़ जाए? आज की कहानी ऐसी ही एक नौसेना कर्मचारी की है, जिसकी जुबान और घमंड ने उसे सीधे बाहर का रास्ता दिखा दिया।
‘आदमी’ की अकड़ – हर दफ्तर का एक ‘शेर’
करीब 20 साल पहले, डच नेवी के डेन हेल्डर बेस में एक कर्मचारी था – मान लीजिए उसका नाम ‘आदम’ है। आदम उन लोगों में से था जो हर वक्त खुद को सबसे बड़ा समझते हैं। हमारे यहां कहावत है ना, “चौबे जी बने छबे जी, घर लौट के बने दूबे जी!” आदम भी वही था – ऑफिस में सबसे ज़्यादा अनुभव रखने का दावा, हर सीनियर को ताना देना, और हर नियम का मज़ाक उड़ाना उसकी दिनचर्या थी।
आदम खुलेआम अपनी मंगेतर को धोखा देने की बातें करता, फिर भी खुद को बहुत प्यार करने वाला बताता। जब कोई उसे टोके, तो बुरा मान जाता – “तुम समझ नहीं सकते, चुप रहो!” यानी, खुद की गलती को भी शान समझना।
‘अगर पसंद नहीं तो निकाल दो!’ – हद से आगे
आदम ऑफिस के हर नए नियम का विरोध करता, वो भी बड़े ही बदतमीज़ अंदाज़ में। ऊपर से, भारी मशीनों को खतरनाक तरीके से चलाना तो उसके लिए शौक जैसा था। एक बार तो उसने बस ड्राइव करते वक्त खुद की वीडियो बना डाली – गाड़ी क्रूज़ कंट्रोल पर, खुद सीट छोड़कर, बस एक हाथ से स्टीयरिंग पकड़े हुए! फिर ये वीडियो सबको बड़े गर्व से दिखाता।
जब सीनियर्स तक उसकी शरारतों की खबर पहुंची, आदम ने सबको झूठ बोल दिया – “ऐसी कोई वीडियो है ही नहीं!” और फिर ठहाके मारकर बोला – “क्या कर लेंगे? निकाल देंगे?”
कुछ समय बाद आदम और भी ज़्यादा बेफिक्र हो गया। ऑफिस में जोर-जोर से बोलना, सीनियर्स के साथ बहस, और हर बार वही डायलॉग – “अगर पसंद नहीं, तो निकाल दो!” उसके मुंह से सुन-सुनकर सब परेशान हो गए थे।
अंत भला तो सब भला – जब अकड़ का गुब्बारा फूट गया
आदम की हरकतें हद से पार हो गईं। एक दिन फिर वही हुआ – ज़ोरदार बहस, और उसका फेवरेट डायलॉग: “अगर पसंद नहीं तो निकाल दो!” लेकिन इस बार उसके सीनियर ने भी जवाब दे दिया – “ठीक है, तुम निकाले जाते हो। चलो ऑफिस में, फॉर्मेलिटी पूरी करते हैं।”
ये सुनकर आदम के होश उड़ गए! ऑफिस के अंदर से उसकी चीख-पुकार सुनाई दे रही थी। पहले तो खूब गु्स्से में चिल्लाया, फिर धीरे-धीरे उसकी आवाज़ में मायूसी आ गई। जब बाहर निकला, तो उसकी आंखें लाल थीं और वो पूरी तरह शांत था।
काम करने का माहौल जैसे ही बदल गया – सबने राहत की सांस ली। एक कमेंट करने वाले ने बढ़िया लिखा, “ऐसी बेवकूफी की सजा भी बेवकूफी जैसी ही मिलती है।” (जैसे हमारे यहां कहते हैं – जैसी करनी, वैसी भरनी।)
पाठकवृंद की राय और हास्य-रस
रेडिट कम्युनिटी में इस कहानी पर खूब चर्चाएं हुईं – किसी ने कहा, “बेवकूफी की भाषा इंटरनेशनल है!” तो किसी ने हंसते हुए लिखा, “अगर आपको नहीं पसंद, तो खुद को ही निकाल दो!” एक ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया, “हमारे यहां भी एक कर्मचारी बार-बार धमकी देता था, ‘अगर ये नहीं बदला तो मैं छोड़ दूंगा!’ आखिरकार मैनेजमेंट ने उसे ही बाहर कर दिया।”
एक मज़ेदार टिप्पणी थी, “ऐसे लोगों को लगता है कि उनके बिना ऑफिस बंद हो जाएगा, लेकिन सच ये है कि उनके जाने के बाद ऑफिस और बढ़िया चलता है।” बिल्कुल वैसे ही जैसे हमारे यहां कहते हैं – “कोई भी अनिवार्य नहीं होता, ज़रूरत के वक्त सबकी जगह कोई न कोई ले ही लेता है।”
डच नेवी के नियम भी कुछ-कुछ हमारे सरकारी दफ्तरों जैसे ही हैं – किसी को निकालना आसान नहीं, लेकिन जब सब्र टूट जाए, तो छंटनी तय है। कई लोगों ने अपने अनुभव भी शेयर किए कि कैसे डॉक्यूमेंटेशन, चेतावनी और सही मौका देखकर ही बड़े अधिकारी ऐसे कर्मचारियों को बाहर का रास्ता दिखाते हैं।
सीख क्या है? अकड़ नहीं, समझदारी दिखाओ
इस कहानी में सबसे बड़ा सबक यही है – चाहे सरकारी दफ्तर हो या प्राइवेट कंपनी, अगर आप अपनी अकड़ में सबको तंग करेंगे, तो एक दिन उसी अकड़ का जवाब मिल ही जाएगा। जैसा एक पाठक ने लिखा, “कर्मा ने पकड़ लिया, अंतत: सबको शांति मिली।”
हमारे यहां भी तो यही कहा जाता है – “जितनी बड़ी हांडी, उतना ही बड़ा छेद!” यानी, ज्यादा घमंड करने वाले की पोल एक दिन खुल ही जाती है।
तो अगली बार अगर ऑफिस में कोई बार-बार बोले, “अगर पसंद नहीं, तो निकाल दो!” तो याद रखिए – कभी-कभी सीनियर भी सच में निकाल देते हैं। अपनी जगह को अनिवार्य समझने की भूल मत कीजिए।
आपके विचार?
क्या आपके ऑफिस में भी कोई ऐसा ‘आदम’ है? या कभी आपने किसी की अकड़ का ऐसा हश्र होते देखा है? कमेंट में हमें जरूर बताइए – आपकी कहानी भी अगली बार यहां जगह पा सकती है!
मूल रेडिट पोस्ट: If you don’t like it, then fire me!