घुमावदार ग्राहक बनाम कॉल सेंटर: जब दोनों ने 'स्क्रिप्ट' पकड़ी
सोचिए, आप किसी कंपनी के कस्टमर केयर नंबर पर फोन करते हैं, और दूसरी तरफ से वही घिसी-पिटी स्क्रिप्ट सुनने को मिलती है – "सर/मैम, मैं आपकी मदद करने के लिए यहाँ हूँ, कृपया अपनी समस्या बताएं..."। अब अगर आपकी समस्या का हल उनकी स्क्रिप्ट में नहीं है, तो आप भी परेशान, वो भी परेशान! लेकिन क्या हो, जब दोनों ही अपनी-अपनी स्क्रिप्ट पर अड़े रहें? कुछ ऐसा ही किस्सा Reddit पर u/Silver_Wonder_7104 ने सुनाया, जिसने इंटरनेट पर सबका ध्यान खींचा।
ग्राहक सेवा का 'भंवर': जब हल नहीं, तो चक्कर ही चक्कर
हमारे देश में भी कॉल सेंटर वालों का हाल कुछ अलग नहीं है। यहाँ भी अक्सर सुनने को मिलता है – "क्षमा कीजिए, मैं रिफंड नहीं दे सकता, क्या आप मेरी सहायता के लिए कुछ और पूछना चाहेंगे?" Reddit की कहानी में भी कुछ ऐसा ही हुआ। ग्राहक बार-बार वही सवाल दोहरा रही थी, और प्रतिनिधि बार-बार वही उत्तर। जैसे हिंदी फिल्मों में 'रिपीट टेली-कास्ट' चलता है!
एक कमेंट में u/mmilanese ने लिखा, "कई बार तो सामने बैठा प्रतिनिधि भी दिमागी थकावट का शिकार लगता है, बस स्क्रिप्ट रट कर बोलता है। ऐसे में मैंने भी उनकी भाषा में जवाब देना शुरू कर दिया, दोनों ही बच्चा बन गए – एक ही बात बार-बार!" सोचिए, जब ग्राहक और प्रतिनिधि दोनों ही 'तोता-रटंत' शैली में उतर आएं, तो कौन जीतेगा?
कंपनी की नीतियाँ – ग्राहक और प्रतिनिधि दोनों की परेशानी
हमारे यहाँ सरकारी दफ्तरों या बैंकों में भी कुछ ऐसा ही अनुभव होता है – "साहब, सिस्टम में अनुमति नहीं है, हम कुछ नहीं कर सकते।" Reddit पोस्ट में OP ने बताया कि कंपनी की आंतरिक नीति के कारण उन्हें हर बार यही पूछना पड़ता था – "क्या मैं आपकी किसी और चीज़ में सहायता कर सकता हूँ?" चाहे ग्राहक मान भी जाए, तब भी यह सवाल पूछना ज़रूरी!
u/Zoreb1 ने पूछा, "अगर ग्राहक आपकी बात मान ले, तो आप क्यों बार-बार वही सवाल पूछते रहे?" इस पर OP ने बताया, "नीति ही ऐसी थी कि ग्राहक मना न करे, तब तक यही पूछते रहो!" अब सोचिए, ऐसी नीति में बेचारा प्रतिनिधि क्या करे!
u/Metalsmith21 ने मजेदार सुझाव दिया – "मैं तो सीधा कह देता, 'अब आपकी कोई और शिकायत नहीं है, तो मैं कॉल समाप्त कर रहा हूँ।' आखिरकार हम रोबोट तो हैं नहीं।" इस पर कई पाठकों ने अपनी-अपनी जगह ताली बजाई।
दोनों तरफ से 'मालिशियस कंप्लायंस' – सिस्टम को मात देने का खेल
अब इस कहानी में असली मज़ा यहाँ है कि ग्राहक और प्रतिनिधि दोनों ही सिस्टम के नियमों का फायदा उठाकर एक-दूसरे को थकाने लगे। जैसे पुराने जमाने में पड़ोस की आंटियाँ 'कुर्सी पकड़' पर बैठ जाती थीं – "पहले आप उठिए, नहीं-नहीं, पहले आप!" वैसे ही यहाँ भी – "आप कुछ और पूछना चाहेंगे?" "नहीं, आप बताइए!" और ये सिलसिला तब तक चलता, जब तक कोई हार न मान ले।
u/mmilanese ने लिखा, "अक्सर मैं इसी तरह से जीत जाता हूँ, तो ये आदत बन गई है!" ये किसी हिंदी फिल्म के 'जिद्दी हीरो' जैसा है, जो अंत तक हार नहीं मानता।
u/ReluctantPhoenician ने अपनी चिंता जताई, "ऐसी जगह पर काम करना और ग्राहक बनना दोनों ही बुरा अनुभव है!" सोचिए, आज के दौर में भी ऐसी नीतियाँ कैसे लोगों को परेशान करती हैं।
भारतीय संदर्भ में – क्या हल है इस 'घूमती बातचीत' का?
हमारे यहाँ भी बहुत से लोग कॉल सेंटर पर फोन करते समय यही सोचते हैं – "बस जल्दी से काम हो जाए!" लेकिन जब दोनों तरफ से यही जवाब मिले, तो गुस्सा आना लाजिमी है। कुछ कंपनियाँ अब 'ह्यूमन टच' जोड़ने की कोशिश कर रही हैं, जैसे – "आपकी समस्या को समझ रहा हूँ, क्या मैं कुछ अलग तरीके से मदद कर सकता हूँ?" लेकिन कई जगह अब भी पुरानी स्क्रिप्ट का ही बोलबाला है।
कई पाठकों ने सलाह दी – "सीधे सुपरवाइज़र से बात कर लो!" जैसे हमारे यहाँ लोग कहते हैं – "बड़े साहब से मिलवा दो!" पर कंपनी की नीतियाँ अक्सर इस राह में भी रोड़ा बन जाती हैं।
निष्कर्ष: क्या आप भी कभी ऐसे चक्कर में फँसे हैं?
आज की कहानी से साफ है – चाहे ग्राहक हों या प्रतिनिधि, दोनों ही कभी-कभी सिस्टम के हाथों मजबूर हो जाते हैं। लेकिन थोड़ी होशियारी और हँसी-मजाक से माहौल हल्का किया जा सकता है। आखिरकार, दोनों ही इंसान हैं – रोबोट नहीं!
क्या आपको भी कभी ऐसी 'घूमती बातचीत' का सामना करना पड़ा है? नीचे कमेंट में अपने अनुभव जरूर साझा करें। और अगर आपके पास भी कोई मजेदार ग्राहक सेवा की कहानी है, तो हमारे साथ बाँटें – हो सकता है, अगली बार आपकी कहानी पर भी मजेदार चर्चा हो!
मूल रेडिट पोस्ट: Circular customers - Malicious compliance?