ग्राहक हमेशा सही होता है… जब तक वह खुद अपनी गलती का शिकार न हो जाए!
हमारे देश में एक कहावत है—“ग्राहक भगवान होता है।” लेकिन भाई, भगवान भी अगर ज़्यादा चिढ़ जाए तो किसकी सुनें? दुकानदार हो या डिलीवरी वाला, कभी-कभी ग्राहक ऐसे-ऐसे फरमान सुना देता है कि भगवान भी सोच में पड़ जाए! आज की कहानी कुछ ऐसी ही है—a डिलीवरी बॉय और उसके ‘सुपरबिज़ी’ ग्राहक की।
जब डिलीवरी बॉय फँसा ‘ग्राहक भगवान’ के चक्कर में
मान लीजिए, आप एक फर्नीचर और हार्डवेयर कंपनी में डिलीवरी बॉय हैं। रोज़ का काम—सामान पहुँचाओ, रिसीविंग लो, और अगले ऑर्डर के लिए निकल लो। आमतौर पर काम शांति से चलता है, लेकिन कभी-कभी ऐसा ग्राहक मिल जाता है, जिसे लगता है बदतमीज़ी ही उसकी असली पहचान है।
पिछले गुरुवार की बात है, हमारे हीरो डिलीवरी बॉय को भारी-भरकम सीडर लकड़ी (महंगी वाली, जिसकी कीमत सुनकर आपका दिल डोल जाए!) एक ग्राहक के पास पहुँचानी थी। एड्रेस था—शहर के बाहर एक पुराना इंडस्ट्रियल एरिया, जहाँ अब सिर्फ़ जंग लगे गेट और वीरान ज़मीन बची थी। GPS बेचारा भी भटक गया!
ग्राहक की ‘बॉसगिरी’ और डिलीवरी बॉय का धैर्य
डिलीवरी बॉय ने समझदारी दिखाई—ग्राहक को दस मिनट पहले फोन करके पूछा, “भैया, कहाँ डिलीवर करना है? क्योंकि यहाँ तो खाली मैदान और गेट लगा है।” उधर से आवाज़ आई, जैसे किसी फिल्म के विलेन ने डायलॉग मारा हो—“तुम्हें सिर्फ गाड़ी चलाने के पैसे मिलते हैं, बेवजह सवाल मत करो! जो एड्रेस पेपर पर है, वहीं रख दो। बार-बार परेशान करोगे तो मैनेजर से शिकायत कर दूँगा।”
भला हो डिलीवरी बॉय का, जिसने शांति से ‘हाँ जी, जैसा आदेश’ कह दिया। फिर वह पहुंचा उस वीराने में, जंग लगे गेट के पास, जहाँ कोई इंसान तो दूर, एक कुत्ता भी नहीं था। पेपर पर लिखा एड्रेस बिलकुल वहीं था। उसने लकड़ी के प्लैंक उतारे, गेट के सहारे रखे, फोटो खींची और निकल लिया।
जब ‘कर्मा’ ने ग्राहक को सबक सिखाया
करीब तीन घंटे बाद बॉस का फोन आया, “भाई, क्या किया तूने? ग्राहक तो आगबबूला है!” असल में, ग्राहक ने गलती से अपने पुराने ऑफिस का एड्रेस डाल दिया था, घर का नहीं। जब वह वहाँ पहुँचा, तब तक आधी लकड़ी राहगीरों ने उठा ली थी, बाकी कीचड़ में पड़ी थी। अब जनाब का गुस्सा सातवें आसमान पर!
ग्राहक ने शिकायत की, “तुम्हें तो समझ जाना चाहिए था ये गलत एड्रेस है!” लेकिन बॉस ने ठंडे दिमाग से रिकॉर्ड की गई कॉल चला दी, जिसमें खुद ग्राहक ने चिल्लाकर कहा था—“पेपर पर जैसा लिखा है, वैसा ही करो!” इस पर कोई बहस नहीं बची, ग्राहक को नया ऑर्डर देना पड़ा—अपने खर्चे पर!
यहाँ एक कमेंट बहुत दिलचस्प था—“अरे भाई, सीडर की लकड़ी कोई सस्ती चीज़ नहीं है! ये तो बिलकुल वैसा हुआ जैसे किसी ने अपनी जेब कटवा ली।” एक और ने मज़ाकिया अंदाज में लिखा, “अब अगली बार ये साहब ऑर्डर देने से पहले तीन बार एड्रेस चेक करेंगे।”
सोशल मीडिया की राय और भारतीय तड़का
रेडिट की इस कहानी पर एक यूज़र ने लिखा, “ऐसे ग्राहक को तो सीधा कर्मा ने तमाचा मारा है – जेब से भी, और समय से भी।” एक और ने कहा, “रिकॉर्डेड कॉल तो हमारी भारतीय कॉल सेंटर संस्कृति की तरह है—‘आपकी कॉल हमारी गुणवत्ता जांच व प्रशिक्षण के लिए रिकॉर्ड की जा सकती है!’”
सोचिए, अगर यही घटना भारत में होती, तो डिलीवरी बॉय को घर लौटकर माँ से डांट सुननी पड़ती—“बेटा, थोड़ा दिमाग भी लगाया कर, ग्राहक तो हमेशा अपनी गलती मानने से रहा!” वैसे, हमारे यहाँ भी ऐसे ‘बॉसगिरी’ वाले ग्राहक खूब मिलते हैं, जो गलती खुद करें, और दोष दूसरों को दें।
किसी ने सही लिखा—“ग्राहक को उसकी ही ज़ुबान में जवाब देना चाहिए, लेकिन शांति से, ताकि सामने वाला खुद शर्मिंदा हो जाए।”
सीख – ग्राहक भगवान है, लेकिन गलती का फल तो वही भोगेगा!
इस कहानी से यही समझ आता है—चाहे आप ग्राहक हों या दुकानदार, थोड़ा विनम्र और समझदार बनिए। गुस्से में दिए गए आदेश कभी-कभी आपके ही खिलाफ़ जा सकते हैं। और हाँ, डिलीवरी बॉय हो या कोई भी, हर किसी की इज़्ज़त करना सीखिए।
अगली बार जब आप कोई सामान ऑर्डर करें, तो दो बार एड्रेस ज़रूर चेक करें। वरना ऐसा न हो कि आपकी लकड़ी किसी और के घर की बालकनी सजाए!
आपको ये कहानी कैसी लगी? क्या आपके साथ भी कभी कोई ऐसी मज़ेदार या अजीब डिलीवरी या ग्राहक सेवा की घटना हुई है? नीचे कमेंट में ज़रूर बताइए!
धन्यवाद, और अगले ब्लॉग में फिर मिलेंगे एक और अनोखी कहानी के साथ!
मूल रेडिट पोस्ट: The customer is always right about the delivery address even when he is wrong