ग्रुप प्रोजेक्ट की 'छोटी सी बदला' कहानी: जब सबकी मेहनत एक ही पर पड़ गई भारी
स्कूल के दिनों में ग्रुप प्रोजेक्ट का नाम सुनते ही कई लोगों की सांस फूल जाती है। कुछ दोस्त हैं, जो बस नाम के लिए टीम में होते हैं—बाकी सारा काम किसी एक बेचारे के सिर! क्या आपके साथ भी कभी ऐसा हुआ है कि आपने पूरा प्रोजेक्ट अकेले किया और बाकी बस मलाई मार गए? आज की कहानी है एक ऐसे ही छात्र की, जिसने अपने ही अंदाज में 'छोटी सी बदला' लिया।
जब ग्रुप प्रोजेक्ट बना सिरदर्द
हमारे नायक की कहानी बिल्कुल आम से स्कूल की है, लेकिन ट्विस्ट बड़ा मज़ेदार है। स्कूल की एक टीचर हर कुछ महीनों में ग्रुप प्रोजेक्ट देती थीं—और इस बार तो कमाल ही कर दिया। प्रोजेक्ट था न्यूज़ एंकर बनकर क्लास में एक सनसनीखेज़ खबर सुनाना, जो असल में उस यूनिट की पढ़ाई से जुड़ी थी।
अब टीम में 3-4 लोग, लेकिन असली मेहनत? बस एक छात्र की! बाकी लोगों ने तो जैसे कसम खा रखी थी कि कुछ नहीं करना। स्क्रिप्ट से लेकर संवाद बांटना, सब कुछ नायक ने अकेले किया। हमारे यहां कहावत है—"नाच ना जाने आंगन टेढ़ा!"—बाकी टीम बस नाम की थी, असल में तो सारा नाच इन्हीं का था।
'छोटी सी बदला'—कम बोलो, चैन से रहो
इतनी मेहनत के बाद भी, जब हर बार यही हाल हो, तो गुस्सा तो आएगा ही। लेकिन इस छात्र ने गुस्से को समझदारी से बदले में बदल दिया। स्क्रिप्ट लिखते समय, खुद के लिए सबसे कम लाइनें रखीं। पाँच वाक्य बोले, बाकी सबको लंबा-चौड़ा संवाद दे दिया। हमारे यहां कहते हैं—"किसी को उसकी औकात दिखाना हो, तो उसे आईना दिखा दो।" यहां आईना था—कम बोलना!
इसका फायदा? प्रेजेंटेशन में नायक को स्टेज पर बोलने की टेंशन भी नहीं हुई (जो वैसे भी पसंद नहीं थी), और मेहनत की असली कदर भी हो गई। बाकी तो जैसे सोच रहे थे—"हम तो राजा, बाकी सब प्रजा!" लेकिन असल में राजा भी वही था जिसने महल बनाया।
शिकायत और टीचर का न्याय
अब असली मज़ा तो यहां आया। प्रोजेक्ट के बाद टीम के बाकी सदस्य टीचर के पास शिकायत लेकर पहुँच गए—"मैम, इन्होंने तो कुछ बोला ही नहीं!" लेकिन टीचर तो दूरदर्शी निकलीं। उन्होंने गूगल डॉक्स में सबकी मेहनत देखी—कौन क्या लिखा, किसने कितना योगदान दिया। जैसे ही देखा कि पूरा स्क्रिप्ट इसी छात्र का लिखा है, बाकी सबकी शिकायत हवा हो गई।
एक कमेंट में एक यूज़र ने लिखा—"शुक्र है टीचर समझदार थीं, वरना लाइनें कम देखकर वे भी यही सोचतीं कि आपने भाग नहीं लिया।" और खुद कहानीकार ने बताया, "इससे पहले भी मैंने अकेले प्रोजेक्ट किया था, इसलिए टीचर को पता था कि कौन मेहनती है।"
ग्रुप प्रोजेक्ट का भारतीय तड़का
भारत में स्कूल-कॉलेज के ग्रुप प्रोजेक्ट्स में अक्सर यही होता है—एक मेहनती, बाकी 'फ्री की रोटी' खाने वाले। एक कमेंट पढ़ कर तो हंसी छूट गई: "अगर मैं होता, तो बाकी सबको गलत जानकारी दे देता, ताकि मेरा ग्रेड खराब न हो और उनकी भी पोल खुल जाए!" लेकिन हमारे नायक ने ग्रुप की भलाई के लिए ऐसा नहीं किया, क्योंकि नंबर सबके एक जैसे थे।
एक और यूज़र ने बढ़िया बात कही—"असल ज़िंदगी में भी तो कैमरे के पीछे और आगे के लोग होते हैं। किसी को बोलना पसंद है, किसी को लिखना।" यही संतुलन रखना असली कला है। लेकिन अफ़सोस, यहां तो संतुलन बस एक के भरोसे था!
टेक्नोलॉजी का जमाना और स्कूल का बदलता चेहरा
आजकल गूगल डॉक्स, गूगल शीट जैसी तकनीकें आ गई हैं, जिससे सबकी मेहनत दिख जाती है। एक कमेंट में किसी ने लिखा—"काश, हमारे जमाने में भी ये होता, तो मेहनती बच्चों को अपना हक़ मिल जाता।" अब तो स्कूल भी स्मार्ट हो गए हैं—कौन क्या कर रहा है, सब रिकॉर्ड में रहता है।
निष्कर्ष: आपकी 'पेटी रिवेंज' कहानी क्या है?
तो दोस्तों, इस कहानी से एक बात साफ है—कभी-कभी चुपचाप बदला लेना भी बड़ा मीठा होता है। मेहनत करने वाले को उसका हक़ ज़रूर मिलना चाहिए, और स्मार्ट तरीके से अपनी बात रखना भी एक कला है।
क्या आपके साथ भी कभी ऐसा हुआ है? अपनी ग्रुप प्रोजेक्ट की मज़ेदार या पेटी रिवेंज वाली कहानी नीचे कमेंट में ज़रूर साझा करें। और हां, अगली बार ऐसा हो, तो थोड़ा अक्ल लगाकर—कम बोलो, काम ज्यादा करो!
मूल रेडिट पोस्ट: Didn't talk that much in a group project