केविन को टाइम ज़ोन पर भरोसा नहीं: क्या एयरलाइंस हमें उल्लू बना रही हैं?
कभी-कभी जीवन में ऐसे लोग मिल जाते हैं, जो अपनी अजीब सोच से हमें हँसाने और हैरान करने दोनों का काम करते हैं। ऐसा ही एक किस्सा है केविन का, जो मानते ही नहीं कि टाइम ज़ोन जैसी कोई चीज़ असली है! अब सोचिए, अगर आपके आस-पास कोई कहे कि दुनिया में समय एक जैसा चलता है, बाकी सब तो बस एयरलाइंस की चाल है, तो आप क्या करेंगे? यही हुआ हमारे कहानीकार के साथ, और आगे जो हुआ वो आपको भी मुस्कुराने पर मजबूर कर देगा।
केविन और टाइम ज़ोन: एक अनोखी बहस
केविन और कहानीकार एक साथ यात्रा की योजना बना रहे थे, और जब फ्लाइट की टिकट देखने बैठे, तो केविन ने स्क्रीन पर घूरते हुए सवाल दाग दिया – "भाई, यहाँ लिखा है 9 बजे उड़ान, 11 बजे लैंडिंग, लेकिन उड़ान तो 5 घंटे की है! बाकी के 3 घंटे कहाँ गए?"
कहानीकार ने बड़े प्यार से टाइम ज़ोन समझाने की कोशिश की – जैसे माँ अपने छोटे बच्चे को दिन-रात का फर्क समझाती है। लेकिन केविन का जवाब था, "हाँ-हाँ, बताने को तो सब कहते हैं टाइम ज़ोन है, पर असल में ये सब दिखावे की बातें हैं।"
उनका मानना था कि एयरलाइंस टाइम ज़ोन का बहाना बनाकर फ्लाइट का समय कम दिखाती हैं, ताकि लोग लंबी यात्रा से डरें नहीं। यानी, 'फेक मैथ' – नकली गणित! केविन बहुत विश्वास के साथ बोले जा रहे थे, जैसे कोई गुप्त षड्यंत्र उजागर कर रहे हों।
"लोग अपनी मर्ज़ी से सोते हैं!" – केविन के तर्क
कहानीकार ने पूछा – "अगर टाइम ज़ोन नहीं होते, तो दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में लोग अलग-अलग समय पर क्यों सोते-जागते हैं?" केविन का जवाब था, "क्योंकि वो अपनी मर्ज़ी से सोते हैं!"
यहाँ तक कि उन्हें लगता था कि पूरी दुनिया ने एक साथ मिलकर तय कर लिया है कि अलग-अलग जगहों पर समय अलग दिखाया जाएगा – और एयरलाइंस इस झूठ की सबसे बड़ी फायदेमंद हैं।
एक प्रतिक्रिया में किसी ने लिखा – "ये तो वैसा ही है जैसे कोई बच्चा ये माने कि जब उसके यहाँ धूप है, तो पूरी धरती पर धूप होगी!" कुछ लोग तो यहाँ तक बोले कि केविन शायद फ्लैट अर्थ (समतल पृथ्वी) वाले ग्रुप के सदस्य भी हो सकते हैं।
'कॉन्फिडेंस' का खेल: विज्ञान बनाम विश्वास
केविन की सबसे दिलचस्प बात यह थी कि वो बिल्कुल निश्चिंत, बेफिक्र अंदाज़ में अपनी बात कह रहे थे – जैसे कोई 'बड़ा सच' बता रहे हों।
एक पाठक ने लिखा, "कई बार लोगों का आत्मविश्वास ही उन्हें सही साबित कर देता है, भले ही तर्क में दम न हो।" एक और मज़ेदार टिप्पणी थी – "भाई, केविन ने तो टाइम ट्रैवल ही खोज लिया लगता है!"
कुछ ने तो यह भी जोड़ा कि टाइम ज़ोन असल में इंसानों की बनाई व्यवस्था है – जैसे हमारे देश में अलग-अलग राज्यों में त्योहार, स्कूल के टाइम, या ऑफिस का वक्त अलग-अलग हो सकता है। चीन का उदाहरण भी आया, जहाँ पूरे देश में एक ही समय चलता है, जबकि भारत में हम IST (इंडियन स्टैंडर्ड टाइम) मानते हैं, चाहे कोलकाता हो या अहमदाबाद।
जब मोबाइल ने केविन की 'साजिश' को निभाया
एक मज़ेदार प्रतिक्रिया में किसी ने लिखा – "शायद केविन का मोबाइल लैंडिंग के बाद अपने-आप लोकल टाइम पर सेट हो गया होगा, जिससे उसकी 'भ्रम' की दुनिया और मज़बूत हो गई!"
कुछ ने सुझाया, "भैया, अगर केविन को एक ग्लोब और टॉर्च से समझाया जाए कि सूरज की रोशनी किस तरह घूमती है, तो शायद बात समझ आ जाए!" लेकिन साथ ही यह भी माना कि कुछ लोग चाहे कुछ भी देख लें, मानेंगे नहीं – 'भैंस के आगे बीन बजाने' वाली कहावत याद आ गई।
पैसे का टाइम भी 'फेक' है!
यात्रा की योजना बनाते समय जब पैसे की बात आई, तो केविन ने यहाँ भी कह दिया – "पैसा भी तो फेक है, टाइम की तरह!" कहानीकार ने MoneyGPT नाम की ऐप का सुझाव दिया, जो पैसों के लेन-देन का हिसाब रखती है, लेकिन केविन को तो सब कुछ 'फेक' ही लग रहा था।
निष्कर्ष: टाइम ज़ोन – सुझाव या हकीकत?
आखिरकार, कहानीकार ने तय कर लिया कि अब कभी केविन के साथ यात्रा की योजना नहीं बनाएंगे – सिर्फ टाइम ज़ोन की वजह से नहीं, बल्कि इसलिए कि इतनी बहस के लिए अब उनके पास 'इमोशनल एनर्जी' नहीं बची।
तो दोस्तो, आपके आस-पास भी कभी कोई 'केविन' मिलता है क्या? क्या आपने कभी ऐसे लोगों से बहस की है, जिन्हें लगता है कि दुनिया की सारी व्यवस्थाएँ सिर्फ दिखावा हैं?
आपका क्या ख्याल है – टाइम ज़ोन असली हैं या सब मिलकर 'साजिश' कर रहे हैं? नीचे कमेंट में जरूर बताइए, और अगर आपको यह किस्सा मज़ेदार लगा हो तो अपने दोस्तों के साथ शेयर कीजिए।
समय बड़ा बलवान है – और शायद केविन भी!
मूल रेडिट पोस्ट: Kevin doesn’t believe time zones are real and thinks airlines are just gaslighting us