कॉल ट्रांसफर का झोल: मोबाइल नंबर ब्लॉक और ऑफिस की पहेली
ऑफिस की ज़िंदगी में टेक्नोलॉजी जितनी सुविधा देती है, उतनी ही बार सिरदर्द भी बन जाती है। कुछ समस्याएँ इतनी सीधी होती हैं कि हल ढूंढते-ढूंढते हम सारा सिस्टम उलट-पलट देते हैं, लेकिन असली वजह सामने आकर हंसा देती है। आज की कहानी भी ऐसी ही एक ऑफिस कॉल ट्रांसफर की उलझन और उसके अनोखे हल की है, जो हर उस शख्स की आंखें खोल देगी जो अपने मोबाइल में मनमाने नंबर ब्लॉक करता है।
call transfer का चक्कर: समस्या कहाँ थी?
कहानी शुरू होती है एक ऑफिस कर्मचारी से, जो हमेशा अपनी लैंडलाइन की सारी कॉल्स अपने मोबाइल पर ट्रांसफर कर देता था। कई सालों से ये तरीका उसका रोज़ का नियम था और सबकुछ बढ़िया चल रहा था। लेकिन एक दिन साहब का मोबाइल कॉल ट्रांसफर का नोटिफिकेशन तो दिखा रहा था, पर फोन बज ही नहीं रहा था! सोचिए, ऑफिस में काम का सारा मजा किरकिरा।
अब आईटी डिपार्टमेंट वाले भाई साहब (जिन्हें हम सब 'टेक सपोर्ट' कहते हैं) को बुलाया गया। उन्होंने TOIP पोर्टल चेक किया, कॉल ट्रांसफर सेटिंग्स में कोई बदलाव नहीं था। जब दूसरे नंबर पर ट्रांसफर किया तो सब सही चलता रहा। SIM निकालकर दोबारा डाला, फिर भी समस्या जस की तस। यहां तक कि SIM कार्ड को किसी और मोबाइल में डाला तो कॉल ट्रांसफर बिल्कुल दुरुस्त!
अब तो साफ लग रहा था कि असली गड़बड़ मोबाइल फोन में है। नेटवर्क सेटिंग्स रीसेट की, APN सेटिंग्स देखीं, लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात। नया मोबाइल देने की नौबत आ गई, लेकिन दिक्कत ये थी कि साहब अपने ऑफिस के मोबाइल को ही पर्सनल भी बना बैठे थे—डाटा से ठसाठस भरा हुआ।
जब असली खलनायक निकला 'ब्लॉक लिस्ट'
अब टेक सपोर्ट वाले ने सोचा, 'चलो एक बार ब्लॉक लिस्ट भी देख लें'। देखा तो वहाँ 100 से ज्यादा नंबर ब्लॉक थे—ज्यादातर स्कैमर्स और अनजान नंबर। एक सहकर्मी ने सलाह दी, “सर, ज़रा अपने लैंडलाइन नंबर को कॉन्टैक्ट में सेव करके देखिए।”
अरे! क्या निकला? लैंडलाइन नंबर भी ब्लॉक लिस्ट में घुसा बैठा था! बस, उसे अनब्लॉक किया और कॉल ट्रांसफर फिर से चालू!
यहाँ वो कहावत याद आती है—“अंधेर नगरी चौपट राजा, टेक्नोलॉजी के हाथों सब हलाकान।”
टेक्नोलॉजी की गुत्थियाँ और हमारी जुगाड़ू सोच
इस कहानी में छुपा है एक बड़ा सबक। हम भारतीय अक्सर टेक्नोलॉजी की छोटी-छोटी दिक्कतों को हल करने के लिए बड़े-बड़े जुगाड़ लगाते हैं—कभी सेटिंग्स बदलते हैं, कभी फोन बदलने का सोचते हैं, कभी-कभी तो नया नंबर ही ले लेते हैं।
Reddit पर एक कमेंट, जिसका तर्जुमा कुछ यूँ है—“एक बार DNS सेटिंग्स में ऐसा ही हुआ, यूज़र ने खुद अपने ISP के DNS को मालवेयर समझकर ब्लॉक कर दिया। फिर पूरा इंटरनेट ठप!” बिल्कुल वही बात—कभी-कभी हम जिन नंबरों या सेवाओं को परेशानी समझकर ब्लॉक कर देते हैं, वही असली काम के निकल जाते हैं।
एक और मज़ेदार टिप्पणी—“कई बार लोग गुस्से में अपना ही नंबर ब्लॉक कर देते हैं, फिर कस्टमर केयर को धमकाने लगते हैं!” बिल्कुल ऑफिस की चाय वाली गपशप जैसा माहौल हो जाता है।
'महत्वपूर्ण काम' और नंबर ब्लॉक करने की भारतीय आदत
सोचिए, जब घर में कोई जरूरी काम करना हो या ऑफिस में बॉस से बचना हो, हम मोबाइल में DND (Do Not Disturb) या ब्लॉक लिस्ट का बटन दबा देते हैं। एक कमेंट में यही बात कही गई—“जरूरी काम के दौरान किसी का फोन न आए, इसलिए नंबर ब्लॉक कर दिया, और फिर खुद ही परेशानी में फंस गए!”
हमारे यहाँ तो मोबाइल में 'ब्लॉक' बटन दबाना आम है—कमबख्त कॉल सेंटर वाले, स्कैमर्स, या कभी-कभी तो घर के रिश्तेदार भी। मगर कभी-कभी ये नंबर वही निकल जाता है जिसकी सबसे ज्यादा जरूरत पड़ती है।
निष्कर्ष: टेक्नोलॉजी से दोस्ती, पर समझदारी से
कुल मिलाकर, कहने का मतलब ये है कि टेक्नोलॉजी कितनी भी स्मार्ट हो, असली चालाकी तो यूज़र की चौकसी में है। अगली बार जब कोई कॉल या ईमेल न मिले, तो एक बार अपनी ब्लॉक लिस्ट जरूर देख लीजिए।
क्या आपके साथ भी कभी ऐसी कोई टेक्निकल गड़बड़ हुई है, जिसका हल बहुत आसान था, पर आप सिर पकड़कर बैठ गए? कमेंट में जरूर बताइए! और हाँ, अपने दोस्तों के साथ ये किस्सा शेयर करना मत भूलिए—शायद उनकी भी कोई छुपी ब्लॉक लिस्ट खुल जाए!
मूल रेडिट पोस्ट: Call transfer issue