क्रिसमस ईव पर दुकानदार भी इंसान हैं, रोबोट नहीं!
जब भी साल का आखिरी महीना आता है, बाजारों में रौनक बढ़ जाती है। हर तरफ रोशनी, क्रिसमस के पेड़ों की सजावट, और दुकानों में बजती ‘जिंगल बेल्स’ की धुनें। लेकिन इन सबके बीच दुकानदारों और कर्मचारियों की असली कहानी कम ही लोग समझ पाते हैं। क्रिसमस ईव का दिन उनके लिए जश्न का नहीं, बल्कि एक परीक्षा का दिन बन जाता है।
त्यौहार की भीड़ और दुकानदारों की मुश्किलें
जैसे हमारे यहाँ दिवाली की खरीदारी में भीड़ का ठिकाना नहीं होता, वैसे ही पश्चिमी देशों में क्रिसमस ईव पर दुकानों में पैर रखने की जगह नहीं मिलती। दुकानदारों के लिए यह समय सबसे ज्यादा थकाऊ और तनावपूर्ण होता है। एक Reddit यूज़र ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि वे क्रिसमस ईव के दिन गार्डन सेंटर में काम कर रहे थे – सुबह 8 से शाम 4 बजे तक। सोचिए, जिस दिन सब लोग अपने परिवार के साथ समय बिताना चाहते हैं, उस दिन भी ये कर्मचारी मुस्कुराकर ग्राहकों को ‘मेरी क्रिसमस’ बोलते रहते हैं।
लेकिन, ये ‘मेरी क्रिसमस’ कहना भी आसान कहाँ! कभी किसी को बुरा लग गया कि उसे क्रिसमस विश क्यों किया (बाद में पता चला, वही ग्राहक खुद क्रिसमस मना रहा था), तो कभी किसी को बैग देने में देर हो गई तो गुस्सा।
जब ग्राहक को याद नहीं रहा कि दुकानदार भी इंसान हैं
सबसे मजेदार और दुखद बात तब हुई जब दुकान बंद होने में बस 5 मिनट बचे थे। कई बार माइक से घोषणा हो चुकी थी – “दुकान बंद होने वाली है, कृपया अपना सामान लेकर काउंटर पर आएं।” लेकिन कुछ ग्राहक हैं कि सुनना ही नहीं चाहते। एक महिला तो मानो कसम खा कर आई थी कि वो आखिरी मिनट तक खरीदारी करेगी। जब मैनेजर ने विनम्रता से कहा, “मैडम, अब दुकान बंद हो रही है, कृपया काउंटर पर आइए,” तो महिला बोली, “आप लोग दुकान मेरे रहते कैसे बंद कर सकते हैं?”
यहाँ मैनेजर ने बड़ा दिलचस्प जवाब दिया, “हमारे स्टाफ को भी अपने परिवार के साथ समय बिताना है, और अभी आप ही वजह हैं कि वो घर नहीं जा पा रहे हैं।” आखिरकार, लंबा बहस-मुबाहिसा हुआ और वो महिला 4:07 पर सामान लेकर गई। लेकिन जाते-जाते आरोप भी लगा गई कि उसे सबके सामने जानबूझकर शर्मिंदा किया गया!
ग्राहक हमेशा सही... या फिर?
यहाँ एक कमेंट पढ़कर दिल को बड़ी तसल्ली मिली – “ग्राहक सोचते हैं कि उनका काम ही दुनिया का सबसे जरूरी काम है, बाकी सब रोबोट हैं।” एक अन्य ने लिखा, “आपके खराब प्लानिंग की सजा हमें क्यों मिले?” एक यूज़र की कहानी तो और भी मजेदार थी – “मेरे पिताजी हर साल क्रिसमस ईव को ही खरीदारी करते हैं, और जब दुकानें बंद मिलती हैं तो दुकानदार को दोष देते हैं, जैसे उनकी फैमिली नहीं है!”
इसी तरह, एक कमेंट में लिखा था – “पिछले साल एक महिला दुकान बंद होने के वक्त आई कि मेरे लिए स्टॉकिंग्स पर कढ़ाई कर दो। मना किया तो गुस्से में आकर डिस्प्ले केस गिराने लगी!” सोचिए, दुकानदारों को कितनी अजीब-अजीब बातें सुननी पड़ती हैं।
सांस्कृतिक संदर्भ और हमारी सोच
हमारे यहाँ भी कुछ कम फर्क नहीं है। दिवाली या होली पर जब दुकानें समय से पहले बंद होने लगती हैं, तो ग्राहक नाराज़ हो जाते हैं – “अरे भाई, त्योहार तो हमारा भी है!” लेकिन क्या कभी किसी ने सोचा कि दुकानदार, सेल्समैन, कैशियर – ये सब भी किसी के बेटे, बेटी, माँ, पिता हैं?
पश्चिमी देशों की तरह हमारे यहाँ भी अक्सर ‘ग्राहक भगवान है’ वाली मानसिकता हावी रहती है। लेकिन भगवान होने का मतलब यह तो नहीं कि हम इंसानियत भूल जाएँ!
एक टिप्पणी में किसी ने बढ़िया लिखा – “हर साल 364 दिन हैं खरीदारी के लिए, क्रिसमस या त्योहार अचानक नहीं आता, इसकी तैयारी पहले से होनी चाहिए।” ये बात हमारे यहाँ भी लागू होती है – चाहे त्योहार कोई भी हो, आखिर दुकानदार भी इंसान हैं।
अंत में – इंसानियत की अहमियत
तो अगली बार जब आप किसी त्योहार की शाम को दुकान में घुसें और कर्मचारी आपसे विनती करे कि अब दुकान बंद हो रही है, तो जरा उनके परिवार और उनके समय का भी ख्याल कीजिए। उनके चेहरे की मुस्कान के पीछे भी थकान और घर जाने की जल्दी छुपी होती है।
क्या आपके साथ भी कभी ऐसा अनुभव हुआ है – कि आपने देर रात या त्योहार के दिन किसी दुकान में आखिरी ग्राहक बनकर खरीदारी की हो? या खुद रिटेल में काम किया हो? नीचे कमेंट में अपने अनुभव जरूर साझा करें। आखिरकार, थोड़ी सी समझदारी और इंसानियत हर त्यौहार को और खास बना सकती है!
मूल रेडिट पोस्ट: Customer forgot we were human beings and had families