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क्या ‘हनी’, ‘डियर’ और ‘भाईसाहब’ कहना गलत है? होटल रिसेप्शन की दिलचस्प दुविधा

दोस्ताना कार्टून-3D चित्र एक दक्षिणी होटल का, जहाँ स्वागत करने वाला स्टाफ और दीर्घकालिक मेहमान अपने ठहराव का आनंद ले रहे हैं।
यह जीवंत कार्टून-3D छवि एक दक्षिणी होटल की गर्मजोशी से भरी मेहमाननवाज़ी को दर्शाती है, जो हमारे दीर्घकालिक मेहमानों के लिए हम जो मित्रवत माहौल बनाना चाहते हैं, उसकी झलक है। जैसे मेरे छोटे शहर केंटकी की जड़ें, हम मानते हैं कि हर किसी को घर जैसा महसूस कराना चाहिए!

हम भारतीयों के लिए तो ‘भैया’, ‘दीदी’, ‘बेटा’, ‘मम्मीजी’ जैसे संबोधन रोज़मर्रा की बात है। मोहल्ले में दूधवाले से लेकर ऑफिस के चपरासी तक, सबको कोई न कोई अपनापन भरा नाम मिल ही जाता है। लेकिन सोचिए, अगर आप होटल के रिसेप्शन पर खड़े हों और रिसेप्शनिस्ट आपको ‘हनी’ या ‘डियर’ कह बैठे, तो आपको कैसा लगेगा? दिल खुश हो जाएगा या अजीब लगेगा?

आज की कहानी कुछ ऐसी ही है, जो एक अमेरिकी होटल रिसेप्शनिस्ट की दुविधा और Reddit कम्युनिटी की गजब की प्रतिक्रियाओं के इर्द-गिर्द घूमती है। वहाँ ‘हुन’ (Hun) कहना उतना सामान्य नहीं, जितना हमारे यहाँ ‘भैया’ या ‘बेटा’ बोलना। लेकिन इस छोटे से शब्द ने एक बड़ी बहस खड़ी कर दी!

‘हुन’—मासूमियत या बेमतलब की नज़ाकत?

कहानी की नायिका एक छोटे से दक्षिण अमेरिकी शहर Kentucky में पली-बढ़ी हैं जहाँ लोग बहुत ही अपनापन दिखाते हैं। वहाँ, जैसे हमारे देश के गाँवों में हर किसी को ‘भैया’ या ‘बिटिया’ कह देना आम है, वैसे ही वह रिसेप्शनिस्ट आदतन हर किसी को ‘हुन’ कहती हैं—चाहे बच्चा हो, बुज़ुर्ग हो या कोई नया मेहमान। उनके लिए यह बस प्यार से बोलना है, कोई बेइज़्ज़ती या ताना नहीं।

लेकिन एक दिन, एक महिला ने फोन पर कमरा बुक करते समय ‘हुन’ सुनते ही गुस्से का बम फोड़ दिया। “ये अपमानजनक है! मुझे बूढ़ा समझती हो क्या?” ऐसी फटकार सुनकर रिसेप्शनिस्ट हैरान रह गईं। Reddit पर अपनी दुविधा साझा करते हुए उन्होंने पूछा—“क्या सच में ये शब्द अपमानजनक है? मेरा इरादा तो सिर्फ दोस्ती और अपनापन जताने का है।”

अपनापन बनाम औपचारिकता: संस्कृति का फर्क

यह सवाल सुनकर Reddit की जनता भी दो धड़ों में बँट गई—कुछ बोले, “अरे ये तो बस दोस्ताना तरीका है, बुरा मानने की क्या बात!” तो कईयों ने कहा, “अगर कोई हमें जानता नहीं, तो इतनी जल्दी घुलना-मिलना अजीब लगता है।”

एक कमेंट में किसी ने लिखा, “मुझे जब कोई महिला ‘हुन’ कहती है तो अच्छा लगता है, लेकिन अगर मर्द बोले तो अजीब सा महसूस होता है।” भारतीय संदर्भ में भी देखेंगे तो ‘बेटा’ या ‘दीदी’ बोलना कई बार उम्र या रिश्ते को लेकर असहज कर सकता है।

एक और मज़ेदार कमेंट आया—“अरे बहन, आपने ‘हुन’ बुलाया, मतलब अटिला हन (मंगोल सम्राट) कह दिया?” इस पर तो खुद रिसेप्शनिस्ट भी हँसी रोक नहीं पाईं! वैसे ही जैसे हमारे यहाँ कोई ‘राजा बाबू’ या ‘शहज़ादा’ कह दे, तो मामला हल्का-फुल्का हो जाता है।

भाषा का जादू और उसकी सीमाएँ

अनेक लोगों ने बताया कि दक्षिणी अमेरिका में ‘हुन’, ‘डार्लिन’, ‘शुगर’ कह देना रोज़मर्रा है, बिल्कुल वैसे ही जैसे पंजाब या बिहार में ‘भैया’ या महाराष्ट्र में ‘अरे दादा’ बोलना। लेकिन कई जगहों पर, खासकर बड़े शहरों या प्रोफेशनल माहौल में, लोग औपचारिकता पसंद करते हैं—‘सर’, ‘मैडम’, ‘मिस्टर’। ऐसे में कोई अचानक अपनापन दिखा दे तो लोग असहज हो सकते हैं।

एक कमेंट ने बड़ा अच्छा कहा—“कुछ लोग तो किसी भी बात से बुरा मान सकते हैं, इसलिए अगर 99 लोग खुश हैं और 1 को बुरा लगा, तो अपनी आदत क्यों बदलना?” सच है, हमारे यहाँ भी कई बार लोग ‘जी’ लगाए बिना नाम लें तो बुरा मान जाते हैं, और कई बार ‘जी’ लगाना ही उन्हें औपचारिक और दूर-दूर सा लगता है।

होटल, ग्राहक और ‘मेहमान नवाज़ी’ की असली परिभाषा

इस पूरी चर्चा से यह साफ है कि हर क्षेत्र, हर संस्कृति की अपनी भाषा और अपनापन जताने का तरीका है। हमारे यहाँ होटल, दफ्तर या दुकानों में भी ‘भैया, पानी लाना’, ‘बिटिया, ज़रा देखना’—ऐसे संबोधन आम हैं। लेकिन जैसे-जैसे देश/दुनिया शहरी और पेशेवर होती जा रही है, वैसे-वैसे लोगों की पसंद बदल रही है—कुछ को अपनापन अच्छा लगता है, तो कुछ औपचारिकता में ही तसल्ली महसूस करते हैं।

Reddit की कहानी में भी यही निकला—अगर सामने वाला व्यक्ति बुरा मान जाए तो विनम्रता से माफ़ी मांग लें, अपनापन जताना छोड़ना ज़रूरी नहीं। एक कमेंट ने बिलकुल सही कहा—“कभी-कभी लोग सिर्फ गुस्सा निकालने के बहाने ढूंढते हैं, इसलिए अपने आप को लेकर मत घबराओ, बस विनम्र रहो।”

हमारे देश में भी यही फंडा है—कभी ‘भैया’ से प्यार दिखाओ, कभी ‘सर’ से इज्ज़त। आखिरकार, मेहमान नवाज़ी का असली मतलब है—सामने वाले को अच्छा महसूस कराना, चाहे भाषा कोई भी हो!

निष्कर्ष: आपकी राय क्या है?

तो, अब बारी आपकी—अगर आपको होटल में या ऑफिस में कोई ‘हनी’, ‘डियर’, ‘भैया’, ‘बेटा’, ‘दीदी’ जैसे शब्दों से पुकारे, तो आपको कैसा लगेगा? क्या आप अपनापन महसूस करेंगे या औपचारिकता ही पसंद करेंगे? नीचे कमेंट में जरूर बताइए—क्योंकि भाषा का असली मज़ा तो संवाद में है!

चलते-चलते, जैसा कि Reddit की बहस से निकला—“किसी का दिल तोड़ना मत, और किसी का अपनापन छोटा मत समझो। सबकी अपनी-अपनी पसंद है।” वैसे भी, जैसा हमारे यहाँ कहा जाता है—‘मेहमान भगवान होता है’, तो उसे ज्यादा प्यार या इज्ज़त देने में क्या हर्ज!

आपकी टिप्पणियों का इंतजार रहेगा—क्या आप ‘हनी’ के फैन हैं या ‘सर/मैडम’ के?


मूल रेडिट पोस्ट: Let’s start this off by saying a grew up in a very southern setting…