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क्या सचमुच पूर्णिमा थी? होटल रिसेप्शन की एक अजब-गजब रात

पूर्ण चाँद के नीचे एक जादुई रात के दृश्य का एनीमे चित्रण, रहस्य और आश्चर्य का अनुभव कराता है।
उस जंगली रात में गोताखोरी करें जहाँ कुछ भी हो सकता है! यह मंत्रमुग्ध कर देने वाला एनीमे-शैली का चित्र पूर्ण चाँद के नीचे होने वाले अजीब मुठभेड़ों और आश्चर्यों को दर्शाता है। उन देर रात के घंटों में आपने कौन से अप्रत्याशित क्षणों का अनुभव किया?

कभी-कभी तो लगता है जैसे होटल की रिसेप्शन डेस्क कोई सीरियल का सेट बन जाती है, जहाँ रोज़ कुछ न कुछ नया और चौंकाने वाला होता है। सोचिए, आप आधी रात को होटल में अपनी ड्यूटी कर रहे हैं और एक के बाद एक ऐसी घटनाएँ घटें कि दिमाग भन्ना जाए! क्या ये सब असली है या आस-पास के लोग मिलकर आपको बेवकूफ बना रहे हैं?

आधी रात के मेहमान: मोमबत्ती चाहिए... या मज़ाक?

रात के करीब 11:45 बजे एक महिला का फोन आया। मैंने बड़े शिष्टाचार से अपना परिचय दिया, लेकिन उन्होंने मुझे 'एलिज़ाबेथ' कह दिया! अब भई, मेरा नाम उससे बिल्कुल अलग है, न उच्चारण मिलता, न अक्षर। फिर उन्होंने पूछा – "क्या आपके पास बर्थडे कैंडल्स (जन्मदिन की मोमबत्तियाँ) हैं?"

मेरे मन में तो सबसे पहला ख्याल यही आया – अरे, ये कोई मज़ाक तो नहीं? होटल में कौन जन्मदिन की मोमबत्तियाँ ढूँढ़ता है! मैंने झुंझलाकर फोन काट दिया। लेकिन कुछ ही मिनटों में वही महिला डेस्क पर आ पहुँची और वही सवाल दोहराया। अब मैं खुद को कोसने लगा – ये तो वाकई सीरियस थीं! दरअसल, होटल रिसेप्शनिस्ट के साथ अक्सर ऐसा होता है, फोन पर अजीब सवाल आते हैं, कभी-कभी सच, कभी सिर्फ मज़ाक...

फिर उन्होंने पूछा, "यहाँ वेंडिंग मशीन है क्या?" अब मुझे समझ नहीं आया – क्या उन्हें सच में उम्मीद थी कि वेंडिंग मशीन से बर्थडे कैंडल्स मिल जाएँगी? या ये दोनों सवाल अलग-अलग थे? भारतीय होटलों में भी कई बार लोग रिसेप्शन से ऐसी-वैसी चीज़ें माँग लेते हैं – जैसे प्रेस, चप्पल, या यहाँ तक कि झाड़ू तक!

रिसेप्शनिस्ट की रात: बार कहाँ है, नींद आ रही थी क्या?

अब जरा सोचिए, होटल में केवल 105 कमरे, कोई बड़ा फाइव स्टार नहीं, साफ-सुथरा और सीधा-सादा सा होटल। इतनी जगह में कोई बार कहाँ बनेगा? लेकिन एक बहुत नशे में धुत्त साहब आकर पूछ बैठते हैं – "यहाँ बार है क्या?" मन तो किया पूछूँ – "भाईसाहब, ये लिविंग रूम से छोटी लॉबी में बार कहाँ फिट कर दूँ?" मगर जैसे हर भारतीय रिसेप्शनिस्ट करता, मैंने हँसते हुए मना कर दिया।

इतना ही नहीं, एक मेहमान देर रात आए और चुपचाप खड़े रहे। जब मैंने दरवाज़ा खोला तो पूछ बैठे – "क्या आप ऑफिस में सो रहे थे?" अब भाई, रात की शिफ्ट में नींद आना भले स्वाभाविक हो, मगर काम के वक्त ऐसी बात सुनना थोड़ा चुभता है। एक Reddit यूज़र का मज़ेदार कमेंट था – “क्या दिन में काम करने वालों से कोई पूछता है – ‘सो रहे थे क्या?’” सच है, हमारी संस्कृति में भी लोग जरा सा सुस्त दिखें तो ताना मारना नहीं छोड़ते!

स्विमिंग पूल की चोरी-छुपे पार्टी: मास्टर की की मिस्ट्री

अब असली धमाका तो तब हुआ जब कुछ मेहमान रात 12 बजे के बाद स्विमिंग पूल की ओर बढ़ गए। होटल में नियम है कि 11 बजे के बाद पूल बंद हो जाता है और कार्ड लॉक काम नहीं करता। मैंने भागकर उन्हें रोका, खासकर क्योंकि एक आदमी पूरी तरह नशे में था और उसके साथ दो किशोर बच्चे भी थे – बच्चों की सुरक्षा सबसे महत्वपूर्ण!

मगर हैरानी की बात ये रही कि उनका की-कार्ड पूल का दरवाज़ा खोल कैसे गया? मैंने खुद चेक किया, बाकी किसी और कार्ड से दरवाज़ा नहीं खुला। शक हुआ कहीं किसी ने मास्टर की तो नहीं पा ली? या कहीं तीसरी मंज़िल के रेनोवेशन के वक्त कोई की कमरे में छूट तो नहीं गई? Reddit पर एक अनुभवी होटल कर्मचारी ने सलाह दी – "आपकी की-कार्ड सिस्टम की प्रोग्रामिंग ज़रूर चेक करवा लें, कई बार तकनीकी गड़बड़ी से भी ऐसा हो सकता है।" दूसरे ने तो ये भी कहा – "हो सकता है पिछला कोई मेहमान दरवाज़ा ठीक से बंद ना करे और बाकी लोग अंदर घुस जाएँ।"

कुछ ने तो मज़ाक में लिखा – "22 साल से होटल लाइन में हूँ, अब कुछ अजीब नहीं लगता!" और एक ने तो अपने होटल का किस्सा सुनाया – "रेन फेस्ट के दौरान मेहमानों ने स्विमिंग पूल की पूरी दरवाज़ा ही खोल दी थी, स्क्रू समेत!" सोचिए, हमारे यहाँ तो लोग कभी-कभी होटल के तौलिये चुरा लेते हैं, लेकिन दरवाज़ा खोलकर ले जाना – वाह!

ये रात हैरान करती रही... और होटल वाले संभालते रहे

रात भर ऐसी-ऐसी फरमाइशें – कोई पेपर प्लेट माँग रहा, कोई तौलिया, किसी को अच्छी वाई-फाई चाहिए, किसी का की-कार्ड काम नहीं कर रहा। एक Reddit यूज़र ने कमेंट किया – "शांत सीजन में भी अगर अचानक होटल फुल हो जाए, तो हर चीज़ टूटने लगती है – हर कोई कुछ न कुछ माँगता ही रहता है।" यही हाल अपने यहाँ शादी-ब्याह वाले सीजन में होता है – होटलवाले बस भगवान से यही दुआ करते हैं कि रात जल्दी कट जाए!

निष्कर्ष: होटल रिसेप्शन – हर रात एक नई कहानी

तो दोस्तो, होटल रिसेप्शन पर काम करना किसी रोलर कोस्टर राइड से कम नहीं। कोई दिन शांति से बीतता है, तो कोई रात ऐसी होती है कि लगता है पूरी दुनिया साजिश कर रही है। कभी-कभी लगता है – क्या आसमान में सचमुच पूर्णिमा है? या फिर ये सब इंसानों की अपनी-अपनी लीला है!

अगर आपके साथ भी कभी होटल या ऑफिस में ऐसी कोई अजीब घटना घटी हो, तो कमेंट में ज़रूर शेयर कीजिए। आखिरकार, जिंदगी वही है – कभी हँसी, कभी परेशानी, और हर दिन एक नई कहानी!


मूल रेडिट पोस्ट: is there a full moon???