विषय पर बढ़ें

कोयले की धूल, पानी की बाल्टी और बचपन की दुश्मनी: एक मज़ेदार बदले की कहानी

कोयला से चलने वाले विद्युत संयंत्र में गंदे ग्रेट्स का सिनेमाई दृश्य, गर्मियों की मेहनत की यादों का प्रतीक।
कोयला से चलने वाले विद्युत संयंत्र की कठिनाइयों में एक सिनेमाई झलक, जहाँ गर्मी की नौकरियों ने अविस्मरणीय अनुभव और कठिन पाठ सिखाए। मेरी चुनौतीपूर्ण गर्मी की कहानी में शामिल हों, जहाँ मैंने गंदे ग्रेट्स और अन्य मुश्किलों का सामना किया।

कहते हैं कि बचपन की शरारतें कभी पुरानी नहीं होतीं, और दफ्तर में की गई छोटी-मोटी बदमाशियां तो ज़िंदगी भर दिल को गुदगुदाती रहती हैं। आज हम आपको सुनाने जा रहे हैं एक ऐसी ही कहानी, जिसमें कोयले की धूल, पानी की बाल्टी और बचपन के एक पुराने ‘दुश्मन’ ने मिलकर ऐसा तमाशा रच दिया कि तीन दशक बाद भी हंसी रुकती नहीं!

कोयले की फैक्ट्री और गर्मियों की छुट्टियां

हमारे कहानीकार (जिन्हें आगे ‘मैं’ कहेंगे) की उम्र उस वक्त 20 साल थी, जब उनकी माँ ने उन्हें अपनी कंपनी के कोयला संयंत्र में गर्मियों की नौकरी दिला दी। अब आप सोचिए, कॉलेज के बच्चों को जो काम दिए जाते हैं, वो अक्सर वही होते हैं जिन्हें करने से बाकी कर्मचारी कन्नी काटते हैं। मतलब – जमकर मेहनत, धूल-धक्कड़ और सफाई-पुताई!

फैक्ट्री में कोयले की धूल, तेल, चिकनाई और ऊपर से बारिश का भी डर, यानी सफाई के नाम पर आफत ही आफत। railing साफ करते-करते दो हफ्ते यूं ही निकल गए। अगले महीने उन्हें उन्हीं railing को रंगना था। सोचिए, साल में दो बार भी साफ करो तो भी गंदगी अपनी जगह कायम रहती है।

बचपन का ‘जॉन’ और उसकी टोली

अब कहानी में आता है जॉन – वही लड़का जिसे ‘मैं’ बचपन से जानता था, दो साल सीनियर और स्काउट ट्रूप का सदस्य। लेकिन मिज़ाज थोड़ा ‘खुराफाती’। जॉन की टीम का काम ही था फैक्ट्री में शरारतें करना, और ‘मैं’ के साथ उनका छेड़छाड़ का सिलसिला शुरू हो गया। कभी पानी फेंकना, कभी छोटे-मोटे मज़ाक… यानी रोज़ का नया तमाशा।

आखिरी दिन, जॉन ने ऊपर वाली मंज़िल से ‘मैं’ पर पानी फेंक दिया। बस फिर क्या था, दिल में घंटी बजी – अब तो बदला लेना ही है! बाल्टी में पानी भरा, तीन मंज़िल ऊपर चढ़ा, लेकिन वहां पहुंचते-पहुंचते जॉन और उसकी टोली नौ-दो-ग्यारह हो चुकी थी।

बदले की बरसात – गंदगी के साथ

अब किस्मत का खेल देखिए, जैसे ऊपरवाले ने खुद मौका दिया! जैसे ही ‘मैं’ बाल्टी लेकर चौथी मंज़िल पहुंचा, नीचे से लिफ्ट का दरवाज़ा खुला और जॉन की आवाज़ गूंज गई। बिना देर किए, बाल्टी का सारा पानी तीन मंज़िल नीचे जालीदार (ग्रेटेड) फर्शों से होते हुए उड़ेल दिया।

पर ये तो बस पानी था, ऐसा ‘मैं’ को लगा। लेकिन असल में, उन जालीदार फर्शों पर बरसों की कोयले की धूल, ग्रीस और गंदगी जमी थी – जैसे ही पानी गिरा, सारी गंदगी बारिश की तरह जॉन और उसकी टोली पर आ गिरी! जैसे गांव के मेले में रंग-गुलाल उड़ता है, वैसे ही यहां गंदगी की बरसात हो गई। जॉन और उसके साथी चीखने लगे, और ‘मैं’ हंसते-हंसते वहां से निकल गया।

ब्रेकरूम में जब जॉन सिर से पांव तक कीचड़ में लिपटा आया, वहां के पुराने कर्मचारी भी ठहाके लगाने लगे। जॉन ने गुस्से में कहा – “अब देखना, मैं तुझे छोड़ूंगा नहीं!” लेकिन ‘मैं’ तो पांच मिनट में हमेशा के लिए वहां से जाने वाला था, और जॉन को पता भी नहीं था कि ये उसका आखिरी दिन है।

कम्युनिटी की प्रतिक्रियाएं – हंसी के फव्वारे

रेडिट पर इस किस्से पर लोगों ने जमकर ठहाके लगाए। एक टिप्पणीकार ने लिखा, “तुम्हारा कोयले की धूल वाला दिल आज भी इस कहानी को याद करके गर्म रहता है – शानदार बदला!” एक और ने मज़ाकिया अंदाज़ में कहा, “लगता है जॉन को भी बदला लेना था, पर वो धूल में ही रह गया।”

कुछ पाठकों ने तो मज़ाक में अपनी ‘कीमती जिंदगी के मिनट’ भी एक-दूसरे को देने लगे – जैसे भारत में लोग कहते हैं, ‘समय ही धन है’। एक कमेंट ने तो जॉन की हालत का ऐसा चित्रण किया, “फैक्ट्री से ज़्यादा गंदी तो जॉन की इज्ज़त हो गई थी उस दिन!”

और जैसा हमारे यहां कहा जाता है – जैसी करनी, वैसी भरनी। जॉन ने भी ‘मैं’ को फंसाने की कोशिश की, लेकिन उसका साथी ही पानी-पानी हो गया। आखिरी दिन, दोनों दोस्त ठहाके लगाते हुए विदा हुए, और बदले की ये कहानी बन गई एक ज़िंदगी भर की याद।

नतीजा – बचपन की शरारतें, उम्रभर की मुस्कान

तीस साल हो गए, लेकिन न तो ‘मैं’ दोबारा जॉन से मिला, न उसके साथी से। मगर इस मज़ेदार बदले की यादें आज भी चेहरे पर मुस्कान ले आती हैं। ऐसे किस्से हमारे ऑफिस, कॉलेज या मोहल्ले में भी खूब होते हैं – जहां शरारतें, बदले और ठहाकों में दिन बीत जाते हैं।

तो अगली बार जब आपके साथ कोई शरारत करे, तो याद रखिए – कभी-कभी छोटा सा ‘पेटी’ बदला भी ज़िंदगी भर हंसने का बहाना दे जाता है। और हां, अगर आपके पास भी ऐसी कोई मज़ेदार कहानी है, तो कमेंट में ज़रूर लिखिए – क्योंकि हंसी बांटने से ही बढ़ती है!


मूल रेडिट पोस्ट: Water + Dirty Grates