कॉफी शॉप के 'केविन' की कहानियाँ: जब परफेक्शनिस्ट ने सबका धैर्य तोड़ा
क्या आपने कभी ऐसे सहकर्मी के साथ काम किया है, जिसकी वजह से सारा ऑफिस या दुकान सिर पकड़ ले? अगर नहीं किया तो मानिए, आप कितने भाग्यशाली हैं! मगर जो लोग रिटेल या किसी सर्विस सेक्टर में काम करते हैं, वे जानते हैं – ऐसे लोग हर जगह मिल जाते हैं। आज की कहानी है एक अमेरिकन कॉफी चेन की, जिसे हम-आप भारत में "ग्रीन सिरन वाली कॉफी शॉप" के नाम से पहचान सकते हैं।
हमारे नायक (या कहें, पीड़ित) हैं 20 साल के बारिस्ता, जो बाकी साथियों के साथ मज़े से काम कर रहे थे, जब तक उनकी दुकान में आया 'केविन' – एक ऐसा परफेक्शनिस्ट, जिसकी 'गुणवत्ता' ने सबकी सांसें फुला दीं!
केविन: परफेक्शन का भूत या टीम की आफ़त?
शुरुआत में तो सब ठीक-ठाक था। टीम के लोग मेहनती, आपसी समझदार और एक-दूसरे के लिए मददगार थे। लेकिन केविन का आना, जैसे किसी शादी-ब्याह में अचानक बिजली चले जाने जैसा था – सबकी मेहनत पर पानी फेर देना!
केविन का मानना था कि हर काम बिलकुल परफेक्ट होना चाहिए। चाहे लट्टे में दूध के बुलबुले हों या एस्प्रेसो को 10 बार हिलाना हो – अगर एक बार भी गिनती गड़बड़, तो पूरा ड्रिंक फेंककर दोबारा! आप सोच रहे होंगे, इसमें बुरा क्या है? अरे भई, जब ग्राहक लाइन में खड़े-खड़े ऑफिस के लिए लेट हो रहे हों, और केविन दूध के बुलबुले गिन रहा हो, तो समझिए क्या हाल होगा!
एक बार, केविन ने सिर्फ एक लट्टे बनाने में पूरे 2 मिनट लगा दिए, जबकि आम तौर पर 30-45 सेकंड काफी होते हैं। यही नहीं, दूध के एक जग को 40 सेकंड तक टैप करता रहा – जबकि 3 सेकंड ही काफी थे! साथी बारिस्ता से रहा नहीं गया – "केविन, अब बस करो, ग्राहक को जाना है!" ग्राहक भी बोल पड़ा – "भैया, जल्दी करिए, देर हो रही है!" मगर केविन का जवाब – "क्वालिटी ओवर क्वांटिटी!"
टीम वर्क की धज्जियाँ और 'अनस्किपेबल कटसीन' के किस्से
अब सोचिए, जब दुकान में भीड़ हो और टीम का एक सदस्य बस एक ही ग्राहक को 'परफेक्ट' सेवा देने में लगा हो, बाकी सबका क्या हाल होगा? एक कमेंट में किसी ने बढ़िया नाम दिया – "अनस्किपेबल कटसीन" यानी वो सीन जो आप चाहकर भी जल्दी नहीं कर सकते! केविन रजिस्टर पर होता तो उसकी बातचीत खत्म ही नहीं होती – "क्या आप हमारे नए रोस्ट ट्राई करेंगे? कौल्ड फोम लेंगे? ऐप डाउनलोड करेंगे?"
एक बार तो हाल ये हो गया कि लाइन दरवाजे तक पहुँच गई, बाकी स्टाफ को दो-दो ड्यूटी करनी पड़ी। केविन अब भी एक दादीजी से 'कनेक्शन' बना रहा था, जबकि दादीजी के चेहरे पर भी झुंझलाहट साफ दिख रही थी।
टीम लीडर जैकब (जो खुद भी 19 साल का है) से रहा नहीं गया – "भैया, एक ग्राहक के पीछे सबकी वाट लगा दी! बाकी लोगों को भी जल्दी जाना है।" मगर केविन – "हम तो कनेक्शन बना रहे हैं!" जैकब – "कनेक्शन एक से नहीं, पूरी टीम और सारे ग्राहकों से बनाना है!"
क्या केविन 'स्पेशल' था या बस खुद में मस्त?
बहुत से लोगों ने अंदाज़ा लगाया कि शायद केविन को कोई मानसिक समस्या हो, जैसे ऑटिज़्म या ADHD। मगर खुद लेखक (जो खुद ऑटिस्टिक हैं) ने साफ कहा – "भाई, ये तो बस खुद को भगवान मानता है। आलोचना बर्दाश्त नहीं, अपनी गलती मानेगा नहीं।"
कमेंट्स में भी लोगों की राय बंटी थी – कोई बोला, "ऐसे लोग हर जगह होते हैं, बस काम के हिसाब से खुद को ढालना आना चाहिए।" एक अन्य ने मज़ेदार अंदाज में कहा, "ऐसा लगता है जैसे केविन को शब्दों के हिसाब से तन्ख्वाह मिलती है – जितना बोले, उतना पैसा!"
ग्राहक का नजरिया: 'बार्फ' नाम की कहानी
जहाँ एक तरफ केविन जैसी 'परफेक्शन' टीम का सिरदर्द थी, वहीं एक ग्राहक ने कमेंट में अपना अनुभव साझा किया – "मैं तो बस सादा कॉफी पीने जाता था, नाम पूछा तो 'मार्क' बताया। लेकिन कप पर केविन ने लिख दिया 'BARF' (मतलब उल्टी)! उसके बाद मैं उस दुकान में कभी नहीं गया।"
ये कहानी बताती है कि एक कर्मचारी की छोटी सी गलती भी बिज़नेस को कितना बड़ा नुकसान पहुँचा सकती है। ग्राहक खुश, तो दुकान खुश – वरना सबका मूड ऑफ!
आखिर में: टीम वर्क या सिर्फ 'क्वालिटी'?
इस कहानी का सबसे बड़ा सबक – चाहे ऑफिस हो या दुकान, टीम वर्क सबसे ज़रूरी है। एक की 'परफेक्शन' अगर बाकी सबको परेशान कर दे, तो उसका कोई फायदा नहीं। हमारे यहाँ भी कई बार ऐसे लोग मिल जाते हैं जो 'गुणवत्ता' के नाम पर टीम का टाइम और एनर्जी खा जाते हैं।
मजेदार बात ये कि ऐसे केविन हर देश, हर दफ्तर, हर दुकान में मिल जाते हैं – बस नाम और जगह बदल जाती है!
आपकी राय?
क्या आपके ऑफिस या कॉलेज में कभी 'केविन' जैसा कोई साथी रहा है? कैसी रही आपकी टीम वर्क की कहानी? नीचे कमेंट में ज़रूर शेयर करें – और हाँ, अगली बार कॉफी ऑर्डर करते वक्त बारिस्ता को थोड़ा झलकाना न भूलें कि 'क्वालिटी' भी जरूरी है, पर 'क्वांटिटी' यानी गति भी उतनी ही अहम!
मूल रेडिट पोस्ट: Coffee Shop Kevin: Part 1